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तन्वी मदान का कॉलम:युद्ध जितना लम्बा खिंचेगा, भारत के लिए संतुलन बनाना और मुश्किल होता जाएगा

13 दिन पहले
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तन्वी मदान, लेखिका और इतिहासकार - Dainik Bhaskar
तन्वी मदान, लेखिका और इतिहासकार

यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद से ही भारत के रुख को मॉस्को-समर्थक माना जाता रहा है। नई दिल्ली ने स्पष्ट शब्दों में रूस की निंदा नहीं की है और संयुक्त राष्ट्र में इस विषय पर हुई अनेक वोटिंग्स में हिस्सा भी नहीं लिया है। न ही उसने रूस से हथियार या तेल खरीद पर रोक लगाने की बात कही है। रूस के विदेश मंत्री सेर्गेई लव्रोव भारत आए और प्रधानमंत्री मोदी से मिले।

इतना ही नहीं, चीन और रूस दोनों ने ये संकेत दिए हैं कि मौजूदा संकट में भारत उनके नजरिए का समर्थन करता है। लेकिन इसके बावजूद भारत रूस के कैम्प में नहीं है। वो अगर रूसी आक्रमण की निंदा नहीं करता तो उसका समर्थन भी नहीं करता है। उलटे रूस की इस हरकत से भारत के हितों को नुकसान ही पहुंचा है। इससे यूक्रेन में बसे 20 हजार से ज्यादा भारतीय नागरिकों के जीवन पर संकट आ गया था।

दुनिया का ध्यान यूरोप पर केंद्रित होने का लाभ कहीं चीन उसकी सीमारेखाओं पर न उठा ले, यह चिंता भी सता रही है। भारतीय फौजें जिन हथियारों की सप्लाई पर आश्रित हैं, वह भी इस युद्ध से प्रभावित हुई है। आर्थिक मुश्किलें बढ़ी हैं सो अलग। अगर कूटनीतिक दृष्टिकोण से बात करें तो रूस-यूक्रेन युद्ध ने चीन और रूस को एक-दूसरे से अलग-थलग करने के भारत के दीर्घकालीन लक्ष्य को क्षति पहुंचाई है। 1960 और 70 के दशक में भारत-सोवियत संबंधों का एक आधार चीन के प्रति दोनों की साझा चिंताएं भी थीं।

भारत यूरेशिया में मॉस्को को बीजिंग के शक्ति-संतुलन की तरह देखना चाहता है। लेकिन अब रूस चीन पर और ज्यादा निर्भर हो गया है। इसके क्या नतीजे होंगे, इस पर भारत में पहले ही चर्चाएं शुरू हो चुकी हैं। जैसे कि अगर भविष्य में चीन भारत के विरुद्ध कोई कदम उठाता है तो क्या रूस उस पर अंकुश लगाने की स्थिति में होगा? युद्ध से भारत के अमेरिका, यूरोप, जापान से संबंधों पर प्रश्नचिह्न लगा है। ये सभी भारत के लिए रूस से ज्यादा महत्व रखते हैं। फिर भी भारत ने रूस की निंदा क्यों नहीं की?

वास्तव में भारत चाहता है कि रूस उसके पक्ष में रहे, जबकि उसे डर है कि शायद ऐसा हो न सकेगा। भारत को यह भी अंदेशा है कि अगर भारत-चीन सीमा पर तनाव बढ़ता है तो रूस उसे हथियारों की सप्लाई से हाथ खींच सकता है और चीन से जा मिल सकता है। चीन और पाकिस्तान के परिप्रेक्ष्य में और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में रूस भारत के हितों के प्रतिकूल कदम भी उठा सकता है। भारत की सरकार सामान्यतया अपने सहयोगियों की सीधे शब्दों में निंदा करने से कतराती है।

युद्ध के शुरुआती दिनों में वह रूस के साथ बातचीत की गुंजाइश इसलिए भी कायम रखना चाहती थी, ताकि वहां फंसे अपने नागरिकों को सुरक्षित निकाल सके। लेकिन बीते कुछ सप्ताह में दिल्ली का रुख कड़ा हुआ है। भारत ने ‘सभी पक्षों के वैधानिक सुरक्षा हितों’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया है और युद्ध को रूस और नाटो के बीच चल रहे टकराव की तरह देखना बंद कर दिया है।

भारत के विदेश मंत्री ने यूएन और संसद में पहले से अधिक आलोचनात्मक रवैया अपनाया और कहा कि भारत इस युद्ध के सख्त खिलाफ है। साथ ही भारत ने अंतरराष्ट्रीय कानून, राष्ट्रों की सम्प्रभुता, यूएन चार्टर आदि के प्रति सम्मान भी प्रदर्शित किया है। विवादों के हल के लिए सेना के उपयोग का उसने समर्थन नहीं किया, साथ ही बूचा में हुई हत्याओं की निंदा भी की है। इस तरह से उसने स्वयं को चीन की पोजिशन से अलग कर लिया है।

एक पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने कहा है कि भारतीय नीति-निर्माताओं ने निजी वार्ताओं में युद्ध का और स्पष्ट शब्दों में विरोध किया होगा। भारत ने यूक्रेन को मानवीय सहायता पहुंचाई है और मध्यस्थता का प्रस्ताव रखा है। पश्चिमी देशों की तुलना में रूस से भारत के आर्थिक संबंध इतने गहरे नहीं हैं। भारत जिस बहुध्रुवीय विश्व की कामना करता है, उसमें रूस अब एक महत्वपूर्ण प्लेयर नहीं बना रह सकता है, न ही वह चीन को काउंटर-बैलेंस करेगा और शायद भारत को हथियारों की सप्लाई भी पहले की तरह नहीं कर पाए।

यूरोप और अमेरिका को समझ लेना चाहिए कि जहां भारत रूस से वार्ता करता रहेगा, वहीं वह रूस-चीन कैम्प से बाहर भी बना रहेगा। भारत को पता है कि रूस की हरकत से उसके हितों को कितना नुकसान पहुंचा है।

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