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गुरचरण दास का कॉलम:एयर इंडिया को वापस पाने वाले टाटा समूह के पास अवसरों के साथ चुनौतियां भी

5 दिन पहले
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गुरचरण दास, लेखक और एयर इंडिया के बोर्ड के पूर्व निदेशक - Dainik Bhaskar
गुरचरण दास, लेखक और एयर इंडिया के बोर्ड के पूर्व निदेशक

अच्छी खबर दुर्लभ होती है। बीते शुक्रवार एयर इंडिया की ‘घर वापसी’ टाटा, मोदी सरकार, करदाता भारतीय नागरिक, हवाई यात्रियों और भारत के सुधार कार्यक्रम के लिए ऐसी ही खबर थी। एयर इंडिया को वापस उसके संस्थापकों को बेच दिया गया, जिनसे 1953 में निर्ममता से समाजवाद के नामपर छीना गया था। यह एयरलाइन, लाइसेंस राज के पागलपन की निशानी बनकर रह गई थी।

आज, इसे रोजाना 20 करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है और कुल एक लाख करोड़ का नुकसान हो चुका है। एयर इंडिया उतनी बुरी स्थिति में नहीं है, जितना लोग सोचते हैं, न ही उतनी अच्छी स्थिति में है। टाटा के लिए यह जीवनभर का सबसे बहादुरी भरा कदम साबित हो सकता है या सबसे बड़ी त्रासदी।

वाजपेयी सरकार के कार्यकाल के बाद, 19 वर्षों के बाद एयर इंडिया भारत का पहला निजीकरण है। निजीकरण के लिए साहस की जरूरत होती है और आखिरकार मोदी सरकार ने वो साहस दिखाया। निजीकरण यह शक्तिशाली संदेश देता है कि सरकार समझदारी के साथ बिजनेस करने को तैयार है।

इससे पहले एयर इंडिया अव्यावहारिक उम्मीदों, परिस्थितियों के कारण लगातार निजीकरण में असफल हो रही थी। सरकार के लिए सबक है कि वह निजीकरण में खुलकर, लचीलेपन के साथ संभावित ग्राहकों को सुने। यह बिक्री सरकार की सफलता की बानगी बनेगी, जिससे कतार में खड़ी बड़ी संख्या में सार्वजनिक क्षेत्र की बीमार कंपनियों को बेचना आसान होगा।

जेआरडी टाटा द्वारा 1932 में स्थापित बीमार महाराजा का अभिवादन करते हुए रतन टाटा ने ट्वीट किया, ‘वेलकम होम।’ जब जवाहरलाल नेहरू को अहसास हुआ कि उन्होंने राष्ट्र को गौरवान्वित करने वाले, सफलतापूर्वक चल रहे बिजनेस का राष्ट्रीयकरण कर गलती की है तो उन्होंने जेआरडी टाटा को चेयरमैन नियुक्त कर इसका पश्चाताप किया।

इस तरह एयर इंडिया का दशकों तक उच्च स्तर बना रहा। मुझे उन क्षणों को याद करते हुए गर्व महसूस होता है, जब 60 के दशक की शुरुआत में मैंने अमेरिका पढ़ने जाते वक्त इसका सफर किया था। दशकों तक यह दुनिया की सर्वश्रेष्ठ एयरलाइन थी। आज सिंगापुर एयरलाइंस को यह गौरव हासिल है। इसका कुछ श्रेय एयर इंडिया को जाता है, जिसने शुरुआती दिनों में सिंगापुर एयरलाइंस के लोगों के प्रशिक्षण में मदद की थी।

एयर इंडिया टाटा में विरासत में कई चीजें ला रही है। इसमें भारत और दुनियाभर के एयरपोर्ट्स पर कई बहुमूल्य स्लॉट, (जैसे लंदन के हीथ्रो एयरपोर्ट), 130 से ज्यादा हवाईजहाजों का बेड़ा और हजारों प्रशिक्षित पायलट तथा क्रू शामिल हैं। भारत में दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता एयर ट्रैवल मार्केट है, जो खाड़ी और दक्षिणपूर्व एशिया के दो उच्च वृद्धि वाले केंद्रों के बीच स्थित है।

इस बाजार में अभी ज्यादा सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं और यह भविष्य में तेजी से बढ़ेगा। इसकी छिन्न-भिन्न भारतीय रेलवे से कोई गंभीर प्रतिस्पर्धा नहीं है, जो हाल ही में निजी ट्रेनें चलाने के लिए एक भी आंत्रप्रेन्योर को आकर्षित करने में नाकाम रही, जिनसे हवाई यात्री आकर्षित हो सकते थे।

हालांकि एयर इंडिया के कुछ नकारात्मक पक्ष भी हैं। इतने वर्षों से नुकसान उठा रही इस एयरलाइन की देरी और खराब सेवा को लेकर नकारात्मक छवि बनी है। भारत के हवाईयात्रा बाजार में कम लागत एयरलाइंस के कारण गलाकाट प्रतिस्पर्धा भी है, खासतौर पर अजेय इंडिगो से, जिसकी बाजर में 57% हिस्सेदारी है। एयर इंडिया को लागत कम करने, संचालन सुचारु करने और शुरुआती एकीकरण में भारी नुकसान को पचाने की क्षमताओं की जरूरत होगी। खुशकिस्मती से टाटा में टिके रहने व लंबी अवधि तक खेलने की क्षमता है।

मुख्य फैसला ब्रांड के बारे में होगा। टाटा के पास चार विकल्प होंगे। दो कम लागत कैरियर (एयर इंडिया एक्सप्रेस व एयर एशिया) और दो पूर्ण सेवा एयरलाइंस (एयर इंडिया व विस्तारा)। चारों का एक ही ब्रांड के तहत एकीकरण लुभावना लगेगा, लेकिन यह बड़ी गलती होगी। भारत में दो बजार हैं और प्रत्येक को जीतने की अलग रणनीति व संस्कृति है।

सबसे अच्छा समाधान दो ब्रांड्स, दो सीईओ बनाना है, जिसमें प्रत्येक खुद की जंग जीतने पर ध्यान दे। विस्तारा व एयर एशिया संयुक्त वेंचर हैं। साझेदारों को साथ लेकर चलना महत्वपूर्ण होगा, जो आसान नहीं है। जहां तक ब्रांड के नाम का सवाल है, मेरा सुझाव है कि इसे एयर इंडिया ही रहने दें, जिसे नकारात्मक छवि के बावजूद दुनियाभर में पहचाना जाता है। कम लागत कैरियर के लिए एयर इंडिया एक्सप्रेस बरकरार रखना चाहिए।

चूंकि एयर इंडिया के अधिकतर ऋण को सरकार ने अपने ऊपर ले लिया है, इसलिए इसका कायापलट आसान होगा। इसके 90% से ज्यादा नुकसान ब्याज तथा अवमूल्यन के कारण थे। हाल के वर्षों में इसने संचालन से लाभ कमाया था। टाटा को इसमें कुछ इक्विटी (करीब 1 अरब डॉलर) लगानी होगी।

इसकी सबसे बड़ी कमजोरी इसके लोग हैं। हाल के वर्षों में एयर इंडिया कर्मचारियों की संख्या 27,000 (2012 में) से घटकर 13,500 पर आ गई है, जिससे स्टाफ तथा एयरक्राफ्ट का अनुपात बेहतर होकर 221 से 95 पर आ गया। खुशकिस्मती से ज्यादातर स्टाफ 55 वर्ष से ज्यादा उम्र का है। वे एक वर्ष बाद रिटायरमेंट स्वीकार लेंगे। इसलिए उच्च प्रदर्शन वाले दो संगठन जल्द बनाना महत्वपूर्ण होगा।

इस कहानी में कई सबक हैं। सबसे स्वाभाविक सबक है कि सरकारों को बिजनेस नहीं चलाने चाहिए। हालांकि जेआरडी की मौजूदगी ने एयर इंडिया के पतन को रोके रखा था, लेकिन इसका कमजोर होना तय था। कंपनी लालफीताशाही संस्कृति का शिकार हो गई। पदोन्नति में योग्यता से ज्यादा सेवा के वर्ष मायने रखने लगे।

साधारणता फैलने लगी, कोई जोखिम लेना नहीं चाहता था। जब मैं एयर इंडिया का निदेशक था, तीन हवाईजहाज बेकार थे। बोर्ड ने प्रबंधन से इन्हें बेचने या लीज पर देने का कहा। तीन साल बाद भी वे वहीं थे। क्यों? क्योंकि केवल एक ही बोली लगाने वाला था। कैग, सीवीसी व सीबीआई के डर ने उनकी लीज रोक दी। किसी को देश के 400 करोड़ रुपए के राजस्व के नुकसान का दुख नहीं था।

एयर इंडिया की टाटा में वापसी भारत के आसमान में नई सुबह का उदय है। विश्वसनीय, उत्साही नियोजक द्वारा विश्वस्तरीय एयरलाइन चलाने की संभावना उन पेशेवरों के लिए अच्छी खबर है, जिन्होंने जेट व किंगफिशर के खत्म होने पर नौकरी खोई और भारत के उन युवाओं के लिए जो एविएशन में नौकरी की महत्वाकांक्षा रखते हैं। हालांकि हमारे जश्न पर इस अहसास की परछाई है कि अगर वाजपेयी सरकार एयर इंडिया को 20 वर्ष पहले बेचने में सफल हो गई होती, तो इसे बनाए रखने में खर्च हुए एक लाख करोड़ रुपए अच्छी स्कूलिंग के जरिए देश के कई बच्चों की जिंदगी बेहतर बनाने में खर्च हो सकते थे।

यह अच्छी खबर है
एयर इंडिया की ‘घर वापसी’ टाटा, मोदी सरकार, करदाता भारतीय नागरिक, हवाई यात्रियों और भारत के सुधार कार्यक्रम के लिए अच्छी खबर है। यह भारत के आसमानों में नई सुबह का उदय है। विश्वसनीय, उत्साही नियोजक द्वारा विश्वस्तरीय एयरलाइन चलाने की संभावना उन पेशेवरों के लिए अच्छी खबर है, जिन्होंने जेट व किंगफिशर के खत्म होने पर नौकरी खोई और भारत के उन युवाओं के लिए जो एविएशन में नौकरी की महत्वाकांक्षा रखते हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)