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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:जमीन पर मदद की रकम की घोषणा की जाती है, जिस पर अमल नहीं किया जाता

5 महीने पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

एक बार लातिन अमेरिका के एक शहर में बाढ़ आ जाती है। सड़कें नहरों की तरह बन जाती हैं। बाढ़ की निकासी के लिए बांध के द्वार खोलने से शहर को बचाया जा सकता है। नगर-निगम के अध्यक्ष से प्रार्थना की जाती है कि वह बांध के द्वार खोल दे। उसे लगता है कि शहर के बर्बाद हो जाने पर केंद्र के हुक्मरान सहायता राशि भेजेंगे, जिसका घपला किया जा सकता है। अन्य शहरों और संस्थाओं द्वारा भी चंदा प्राप्त होगा। मदद डॉलर और पाउंड में आएगी, जिनका मुद्रा बाजार में भारी मूल्य होगा। बर्बादी भी कैश की जा सकती है।

ध्वंस का सौंदर्य भी पर्यटकों को लुभा सकता है। ज्ञातव्य है कि मुंबई में आतंकवादी हमले के बाद एक रेस्त्रां मालिक ने दीवार में फंसी गोलियों के निशान पर फोटो फ्रेम लगा दी। पर्यटक आकर देखते थे और खुश होते थे कि यह गोली उनके किसी मित्र या परिजन को नहीं लगी। विपत्तियां प्राकृतिक हों या मनुष्य निर्मित हों, मानवीय करुणा का प्रभाव देखते ही बनता है। हमारा श्रेष्ठ और गिरा हुआ दोनों सामने आ जाता है। हर मंथन में जहर और अमृत दोनों ही प्रकट हो जाते हैं। अमृत चुराने वाले भी जाने कहां से प्रकट हो जाते हैं। वे हमारे ही बीच की कहीं दुबके बैठे होते हैं।

दुष्यंत कुमार की रचना है, ‘ बाढ़ की संभावनाएं सामने हैं और नदियों के किनारे घर बने हैं। चीड़-वन में आंधियों की बात मत कर, इन दरख्तों के बहुत नाज़ुक तने हैं।’ ज्ञातव्य है कि उत्तराखंड में आई बाढ़ के पहले ही भास्कर के जयपुर संस्करण के संपादक श्री लक्ष्मी पंत ने आगाह किया था कि इस तरह की दुर्घटना हो सकती है। नदी के किनारे बने घरों की बालकनी के नीचे से नदी बहती देखी जा सकती है। ज्ञातव्य है कि सुशांत सिंह राजपूत अभिनीत फिल्म ‘केदारनाथ’ में इसी तरह की बाढ़ के सीन प्रस्तुत किए गए थे।

ज्ञातव्य है कि शांताराम की फिल्म ‘पड़ोसी’ में बाढ़ के समय का विवरण प्रस्तुत किया गया था। शांताराम जी ने धर्मनिरपेक्षता का निर्वाह किया था। बाढ़ से बचाव करने के समय व्यक्ति का धर्म पूछकर निर्णय नहीं किया जाना चाहिए। अब आप डूबते हुए व्यक्ति से आधार कार्ड मांगेंगे तो वह क्या करेगा? हमने अजीबोगरीब निजाम का निर्माण किया है कि तूफान से हुए विनाश के लिए सहायता भी मतदान के आधार पर की जा रही है।

बाढ़ नदी के किनारे लगे वृक्षों को भी बहा ले जाती है, कुछ तैराक उन वृक्षों को किनारे तक ले जाते हैं। बाढ़ के बाद इन्हें सुखाकर बेच दिया जाता है। कल्पना करें कि ऐसे ही लकड़ी से बने फर्नीचर पर वह हाकिम आराम कर रहा है, जिसने बाढ़ के बाद आए धन का घपला किया है। क्या ऐसी कुर्सी, बैठने वालों को प्रताड़ित करेगी? निदा फ़ाज़ली ने इस आशय की बात की है कि ‘चीखे घर के द्वार की लकड़ी हर बरसात, कटकर भी मरते नहीं, पेड़ों में दिन-रात।’

राज कपूर की ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ में नायिका पर बदचलनी का झूठा आरोप लगा है। बाढ़ का पानी ही इस आरोप से बरी करता है और नायक को सुंदरी का अर्थ समझ में आता है। मुंबई में आई बाढ़ के समय कुछ मकानों के फर्श से पानी का फव्वारा देखा गया। बाद में ज्ञात हुआ कि यह पूरा क्षेत्र मुठा नामक नदी के ऊपर बसाया गया था। कभी-कभी नदियां सतह के नीचे प्रवाहित होती हैं कुछ रहवासी क्षेत्र तो सूख गए कुएं के ऊपर बनाए गए हैं।

कभी-कभी रहवासियों को सूखे हुए कुएं से निकली ध्वनि भांय-भांय सुनाई देती है। बाढ़ के समय मंत्री जी हेलीकॉप्टर में बैठकर मुआयना करते हैं। खिड़की की फ्रेम ही उनकी सीमा है। कितना सुविधाजनक और लघु है यह सब कुछ। जमीन पर मदद की रकम की घोषणा की जाती है, जिस पर अमल नहीं किया जाता। प्यासी नदिया का यही भेद है गहरा और बात है जरा सी।