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अनुपमा चोपड़ा का कॉलम:दर्शक अब महिलाओं के हर तरह के किरदार को स्वीकार करते हैं, सामाजिक ताने-बाने के स्तर पर यह अच्छी बात

एक वर्ष पहले
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अनुपमा चोपड़ा, संपादक, FilmCompanion.in - Dainik Bhaskar
अनुपमा चोपड़ा, संपादक, FilmCompanion.in

हाल ही में महिला दिवस था। लिहाजा मैं इस बार बदलते महिला किरदारों और कहानियों में उनके नैरेटिव के बारे में कुछ बात करना चाहती हूं। अब स्क्रीन और ओटीटी पर औरतों के किरदार बड़े रोचक हो चुके हैं। अब औरतें एकदम सीधी-सादी या फिर खलनायिका नहीं दिखाई जातीं।

उनके किरदार पेचीदा होते हैं। इसे तकनीकी तौर पर ग्रे शेड कहते हैं। इसमें बदलाव धीरे-धीरे आया है। 60 और 80 के दशक तक की औरतों के किरदार बिल्कुल ब्लैक या व्हाइट होते थे। फिर आईं वो, जो बड़ी पावरफुल होती थीं। कुछ भी कर सकने वाली। जैसे खून भरी मांग में दिखाया गया।

मगर अब ऑडिएंस बदल चुकी हैं। दिखाया जाने लगा है कि औरतें भी परफेक्ट नहीं होतीं। उनमें भी खूबियां और खामियां होती हैं। वे भी उतनी जटिल होती हैं, जितने मर्द। जैसे नेटफ्लिक्स की सीरीज आ रही है ‘बॉम्बे बेगम्स’। उसमें 5 औरतों की कहानी हैं। सब क्लास, उम्र और परिस्थिति में अलग हैं। मेड इन हेवेन वेब सीरीज में तारा खन्ना का किरदार बड़ा दिलचस्प था। ये सब मदर इंडिया या देवी ही हों, यह जरूरी नहीं। वैसी छवि दिखाना अब गुजरे जमाने की बातें हो चुकी हैं।

‘शकुंतला देवी’ और ‘द डर्टी पिक्चर’ में अगर विद्या बालन का किरदार देखें तो बदलाव की झलक दिखती है। शकुंतला का किरदार रोचक था। वे सफल थीं, मशहूर थीं, मगर त्याग करने वाली मां बिल्कुल नहीं थीं। पुराने जमाने के हिंदी सिनेमा में तो मां बच्चों के लिए जान देने तैयार रहती थी। यानी अगर तब की फिल्मों में खामी होती थी तो अंत में औरत का किरदार ही मारा जाता था। अब मगर ऐसा कम है। देखा जाए तो अब तो खूनी की भूमिका में भी औरतों को स्वीकार किया गया। तभी अंधाधुन और बदला जैसी फिल्मों की नायिकाओं को लोगों ने स्वीकार किया।

पूजा भट्ट 49 साल की हो चुकी हैं। मगर उन्हें बॉम्बे बेगम्स में स्ट्रॉन्ग विमेन का रोल मिला है। ओटीटी पर खासकर उस तरह के काफी किरदार रचे जा रहे हैं। यह सवाल बार-बार आता रहा है कि अगर महत्वाकांक्षी औरतों को पोट्रे करना हो तो अक्सर उन्हें चरित्रहीन दिखाया जाता रहा है। ऐसा अब तक होता रहा है। इसकी वजह समाज और परिवार की पितृसत्तात्मकता है।

औरत अगर महत्वाकांक्षी निकले और पावर अपने हाथों में लेने की कोशिश करने लगे तो वह मर्दों को पचता नहीं। लिहाजा औरतों पर दोषारोपण होने लगता है। यह चीज बरसों से होती रही है, अब थोड़ी कम हुई है। अब जज करने वाली बात कम हुई है। अब मेकर्स दर्शकों पर यह नहीं थोपते कि भई वह तो खलनायक वाला किरदार है। उसे मत देखो।

एक और पहलू है। टीवी पर मैंने सुना है कि वहां जो महत्वाकांक्षी नायिकाएं हैं, उन्हें पुराने अवतार में दिखाया जाता है। जैसे 70 और 80 के दशक की हमारी फिल्मों में होता था। इसकी वजह शायद टीवी की टारगेट ऑडिएंस हो सकती है। यकीनन हमारी फिल्मों और वेब सीरिज में यह जरूर बदल गया है।

अब फोर मोर शॉट्स, अंधाधुन, बदला की महिला किरदारों को प्रगतिवादी कहना सही नहीं होगा।

वो सब ग्रे शेड की हैं। क्योंकि जरूरी नहीं कि जो व्यवहार में प्रगतिवादी हो, वह नैतिक रूप से भी सही हो। प्रकृति से प्रगतिशील हैं तो वो अच्छे ही काम करे, यह जरूरी नहीं। फोर मोर शॉट्स में महिलाओं के जीवन में उथल-पुथल है। किसी की शादी टूट रही है। किसी का अफेयर हो रहा है। फिर भी लोगों ने उन्हें स्वीकार किया। यानी अब हमारे दर्शकों में राय बनाने की, आलोचनात्मक होने की प्रवृत्ति कम हुई है। रचनात्मकता के स्तर पर, सामाजिक ताने-बाने के स्तर पर यह अच्छी बात है।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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