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अभय कुमार दुबे का कॉलम:किसान महापंचायतों ने आंदोलन को ऐसी ताकत में बदल दिया, जो भविष्य में चुनावों पर असर डाल सकती है

11 दिन पहले
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अभय कुमार दुबे, सीएसडीएस, दिल्ली में प्रोफेसर और भारतीय भाषा कार्यक्रम के निदेशक - Dainik Bhaskar
अभय कुमार दुबे, सीएसडीएस, दिल्ली में प्रोफेसर और भारतीय भाषा कार्यक्रम के निदेशक

दिल्ली की सीमाओं पर 80 से ज्यादा दिन गुजार लेने के बाद किसान आंदोलन अब साफ तौर पर छोटी या मंझोली अवधि का न रहकर छह महीने से साल भर का हो गया है। इसकी गतिशीलता में तरह-तरह के परिवर्तन होने स्वाभाविक ही हैं। आज यह एक ऐसे नाजुक मुकाम पर पहुंच चुका है कि जब हर नए घटनाक्रम से इसकी संरचना प्रभावित हो रही है।

मसलन, इसने अपनी शुरुआत गैर-पार्टी गोलबंदी के तौर पर की थी। लेकिन, उसके भीतर अब राजनीतिक दलों से जुड़ने का रुझान भी दिखाई दे रहा है। संभवत: यह गाजीपुर बॉर्डर पर 28 जनवरी को हुई घटना का परिणाम है। एक दूसरा परिवर्तन इसके सामाजिक आधार का विस्तार है।

देश के अन्य क्षेत्रों के किसान इसके साथ जुड़ने की शुरुआत कर चुके हैं, जिसका नतीजा इसके भागीदारों की विविधता में निकलेगा। पूर्व सैनिकों और छात्रों की सक्रिय हमदर्दी आंदोलन को मिल चुकी है। इस लिहाज से कहा जा सकता है कि आंदोलन अपने दूसरे चरण में प्रवेश कर चुका है।

28 जनवरी को राकेश टिकैत के आंसुओं ने, बल्कि एक के बाद एक विशाल किसान महापंचायतों के जरिए आंदोलन को एक ऐसी ताकत में बदल दिया जो निकट भविष्य में होने वाले चुनावों पर भी असर डाल सकती है। पश्चिमी उत्तरप्रदेश, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान में होने वाली इन महापंचायतों के मंच विपक्षी दलों के नेताओं के लिए खुले हुए हैं।

कहीं-कहीं तो महापंचायत आयोजित करने में भी राजनीतिक पार्टियों का हाथ है। स्वयं किसान नेताओं की भाषा में अब उत्तरोत्तर प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार की खुली आलोचना सुनाई देने लगी है। लेकिन, अभी तक ऐसा कोई प्रमाण नहीं दिखाई पड़ा है कि नेतृत्वकारी किसान यूनियनों ने इन दलों के रणनीतिकारों से कोई सलाह-मशविरा किया हो।

कुल मिलाकर मुख्य रूप से यह आज भी गैर-पार्टी संरचना ही है, क्योंकि इसका नेतृत्व कर रहे चालीस किसान यूनियनें स्वतंत्र संगठन हैं। वे किसी चुनाव लड़ने वाली पार्टी के मोर्चा-संगठनों की तरह काम नहीं करतीं। किसान नेताओं में से एक-दो ऐसे जरूर हैं जिनमें संसद या विधानसभा पहुंचने की महत्वाकांक्षा रही है, पर ज्यादातर ने अपना सारा जीवन किसान संघर्षों में ही गुजारा है।

एक-एक किसान नेता चालीस-पचास बार जेल जा चुका है। इनकी वामपंथी से लेकर दक्षिणपंथी तक अलग-अलग विचारधाराएं हैं। एक बड़ा नेता तो कई साल तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भारतीय किसान संघ की मध्यप्रदेश शाखा का नेतृत्व करने के बाद वहां से निष्कासित किया जा चुका है।

क्या राजनीतिक दलों से जुड़ने का मतलब यह निकाला जा सकता है कि यह आंदोलन आसानी से चुनावी राजनीति के दायरे में खींच लिया जाएगा। दरअसल, चुनाव की पार्टी-पॉलिटिक्स के प्रति आंदोलन की घोर अरुचि का प्रत्यक्ष प्रमाण पंजाब में 14 फरवरी को खत्म हुए स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान मिला।

प्रदर्शनकारी किसानों ने चुनाव की पूरी अवधि में भाजपा के नेताओं को उनके घरों के सामने लगातार धरना देकर चुनाव प्रचार नहीं करने दिया। उन्होंने अपना समर्थन कर रहे अकाली दल को भी नहीं बख्शा। किसान कांग्रेस सरकार की भी इसलिए आलोचना कर रहे हैं कि जब किसानों का प्रदर्शन चल रहा था, तो इन चुनावों को घोषित करने की जरूरत ही क्या थी।

इस घटनाक्रम से जाहिर है कि जब विधानसभा या लोकसभा चुनाव होंगे तो किसान यूनियनें राजनीतिक दलों के सामने अपनी शर्तें रखेंगी। जो पार्टी उनकी मांगों के चार्टर को समर्थन देगी, उसे किसानों के नए मूड का लाभ मिल सकता है। लेकिन, वह घड़ी अभी दूर है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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