• Hindi News
  • Opinion
  • The Color Of The Skin May Be Different, But The Person Is The Same From Inside

रश्मि बंसल का कॉलम:प्यार और सत्कार से लोगों का दिल जीतिए, चमड़ी का रंग अलग हो सकता है, पर अंदर से इंसान एक ही है

5 महीने पहले
  • कॉपी लिंक
रश्मि बंसल, लेखिका और स्पीकर - Dainik Bhaskar
रश्मि बंसल, लेखिका और स्पीकर

आज हर नौजवान विदेश जाने का सपना देख रहा है। कुछ भ्रमण से खुश हैं, मगर काफी मात्रा में ‘फॉरेन’ में सैटल होना भी चाहते हैं। वे मानते हैं कि भारत सुधर नहीं सकता। सड़क से लेकर सरकार तक हर चीज में उन्हें कमियां दिखती हैं। मगर क्या बाहर के देश परफैक्ट हैं?

चलिए सुनते हैं कहानी नवदीप भाटिया की। 1984 में दिल्ली में दंगे हुए तो नवदीप ने बड़ा फैसला लिया। वे पत्नी के साथ कनाडा माइग्रेट हो गए। खाते-पीते बिजनेस परिवार में पले नवदीप को पहली बार नौकरी के लिए भटकना पड़ा। तब उन्हें कड़वा सच महसूस हुआ। डेढ़ सौ अर्जियों के बाद उन्हें सफलता नहीं मिली, क्यों? सिर पर पगड़ी की वजह से। लोगों ने सलाह दी, केश काट लो। लेकिन नवदीप ने बचपन में मां को वादा किया था कि वह न कभी पगड़ी उतारेंगे, न शराब छुएंगे।

इंजीनियर होते हुए, नवदीप को छोटे-मोटे काम पकड़ने पड़े, लेकिन वे निराश नहीं हुए। वे कहते थे कि बाथरूम साफ करने से आदमी छोटा नहीं होता। बल्कि श्रम में ही गरिमा है, ऐसा सिख समुदाय मानता है। इसी पॉजिटिव एडीट्‌यूड के कारण उन्हें एक कार डीलरशिप में नौकरी मिल गई।

मगर यहां भी उन्हें ‘डायपरहेड’, ‘टॉवेलहेड’ और ‘पाकी’ जैसे भद्दे नामों से कुछ लोग अपमानित करते। मगर नवदीप ने दिल पर बात नहीं ली। उन्होंने ऊर्जा काम में डाली। मिलनसार स्वभाव से उन्होंने 3 महीनों में 127 कार बेचकर सबको चौंका दिया। उन्हें प्रमोशन मिला और एक चैलेंज भी। हुंडई की एक डीलरशिप से गाड़ियां बिक नहीं रही थीं। उन्हें कहा गया, अपना जादू दिखाइए! मगर पहले ही दिन वहां बगावत हो गई। 10 सेल्समैन में से 9 ने इस्तीफा दे दिया। तब भी नवदीप ने कमाल कर दिखाया।

दो साल बाद वे डीलरशिप के मालिक बन गए। अब उनके पास थे बढ़िया कपड़े, गाड़ी और मकान। लेकिन एक दिन वे कुछ काम से निकले, तो उन्हें देख एक गोरे ने मोबाइल पर पत्नी से कहा, ‘हनी, मुझे जाना है। मेरी टैक्सी आ गई।’

नवदीप को तब एहसास हुआ कि लोगों के दिमाग में हमारे बारे में स्टीरियोटाइप बना है। हां, सिख टैक्सी चलाते हैं मगर डॉक्टर-इंजीनियर भी हैं। बिजनेस में सफल हैं। पर आम कनाडावासियों तक यह बात कैसे पहुंचाएं?

तभी क्रिकेटप्रेमी नवदीप पहली बार बास्केटबॉल गेम देखने गए। उसमें ऐसे खोए कि ठान ली, मैं टोरंटो रैप्टर्स का हर गेम अटेंड करूंगा। सफेद पगड़ीवाला सरदार जब स्टैंड में बल्ले-बल्ले करेगा, तो लोगों की नजर पड़ेगी ही। टोरंटो रैपटर्स टीम के कोच ने नवदीप का उत्साह देखकर उन्हें ‘सुपरफैन’ का खिताब दिया।

अगले 24 साल जब भी टीम टोरंटो में खेली, सुपरफैन नव भाटिया वहां मौजूद थे। लेकिन इस कहानी का एक और खूबसूरत पहलू भी है। हर साल नवदीप हजारों टिकट खरीदकर बांटते हैं। जिससे हर धर्म, समुदाय के बच्चे टोरंटो रैप्टर्स गेम अटेंड कर पाएं और घुलें-मिलें। कनाडावासियों को भी संदेश मिला कि समय बदल गया है। अब सोच बदलनी है।

हाल ही में नव भाटिया को ‘बास्केटबॉल हॉल ऑफ फेम’ में शामिल किया गया। वो पगड़ी जिसे उन्होंने उतारने से इनकार किया था, आज उसे इतना बड़ा सम्मान मिला है। नवदीप की कहानी से मिसाल मिलती है कि पराये देश को अपना बनाने के लिए अपनी पहचान खोना जरूरी नहीं। प्यार और सत्कार से लोगों का दिल जीतिए, उनकी आंखें खोलिए। चमड़ी का रंग अलग हो सकता है, पर अंदर से इंसान एक ही है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)