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डाॅ. अनिल प्रकाश जोशी का कॉलम:लग्जरी की चाह हमें आने वाले समय में बर्बाद कर देगी, त्याग करने से ही सभी कष्टों से मिलेगी मुक्ति

10 दिन पहले
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डाॅ. अनिल प्रकाश जोशी, सामाजिक कार्यकर्ता - Dainik Bhaskar
डाॅ. अनिल प्रकाश जोशी, सामाजिक कार्यकर्ता

वैज्ञानिकों की एक रिपोर्ट के अनुसार बारह हजार साल पहले मनुष्य की गतिविधियां ज्यादा नहीं थीं, पर मनुष्य ने पिछले दस हजार सालों में पृथ्वी को बहुत नुकसान पहुंचाया। बारह हजार साल पहले मात्र 27% ही पृथ्वी का वो हिस्सा था जो अनछुआ था, पर पिछले 10 हजार सालों में यह घटकर 19% प्रतिशत हो गया।

यह बड़ा उदाहरण है कि आज कैसे हमने पृथ्वी नष्ट करने की तैयारियां कर ली हैं। सबसे महत्वपूर्ण संसाधन जल का सबसे बड़ा आधार आज दुनिया में फिक्स डिपाॅजिट के रूप में हिमखंड हैं। यूरोपियन स्पेस एजेंसी के अनुसार अंटार्कटिका का बहुत बड़ा खंड टूटकर समुद्र में आ चुका है।

हमें पता होना चाहिए कि अंटार्कटिका सबसे बड़ा पानी का स्रोत है और दुनिया में 70% पानी की जरूरत हिमखंडों से पूरी होती है। फ्रांस के वैज्ञानिकों के अनुसार दुनिया में 2 लाख ऐसे ग्लेश्यिर हैं जिनके पिघलने की दर भयानक स्तर में पहुंच चुकी है। आने वाले समय में समुद्र तल अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाएगा और यह सबसे बड़ा खतरा उन देशों को होगा जो समुद्र किनारे बसे हैं। हम पानी के अपने सबसे बड़े फिक्स डिपाॅजिट को तेजी से खोने जा रहे हैं। यह गंभीर संकेत है।

अब समुद्र को देखिए। मनुष्य जनित कचरा इसे लगातार दूषित कर रहा है। 13 करोड़ मैट्रिक टन कचरा केवल 2019 में समुद्रों में हमने डाल दिया। इस वर्ष हमने जो भी प्लास्टिक का उत्पादन किया था, उसमें से 35% जला दिया, 31% लैंडफिल में डाला और 19% हिस्सा समुद्रों में बहा दिया। इससे मानसून पर प्रतिकूल प्रभाव तो पड़ेगा ही, साथ ही अन्य समुद्री जीवों का जीना भी दूभर हो जाएगा। वैज्ञानिकों के अनुसार समुद्र में 400 डार्क जोन बन गए हैं, यानी इन इलाकों में समुद्र के प्रदूषण के कारण कोई जीवन नहीं बचा है।

ताउते और यास जैसे नए नामों वाले तूफान हम पर रोज़ किसी न किसी रूप में हमला कर रहे हैं। वे एक बड़ा सवाल है। यह सब मनुष्य के अतिक्रमणों का परिणाम हैं। हम यह स्वीकारना नहीं चाहते या फिर हम अपने ठाठ-बाट में इतने डूबे हैं कि पृथ्वी पर होने वाले ऐसे संकेतों को लगातार नकारने में लगे हैं या हम मानकर चल रहे हैं कि हमने अपने अंत की शुरुआत कर दी है।

दुनिया में हमने एक-एक करके अनेक जीवों को खत्म कर दिया है। एक आंकड़े के अनुसार हमने जैव विविद्यता 25% खो दी है। शायद आने वाले समय में हम अपनी ही प्रजाति को नए संकट में डालने की तैयारी कर चुके हैं। खुद मनुष्य ने अपना ही जीवन संकट में डाल दिया हो तो फिर इसे कौन बचाएगा? तमाम वन्यजीवों के घरों को उजाड़ देना, उनकी भोजन शृंखला पर चोट करना, अब मनुष्य को भारी पड़ने वाला है। हमें समझना होना कि हर जीव की इस पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित करने में भूमिका है।

अंतराष्ट्रीय स्तर पर पारिस्थितिकी तंत्र को पुर्नस्थापित व पुर्नजीवित करने के लिए इस बार का पर्यावरण दिवस समर्पित है, लेकिन अंतराष्ट्रीय स्तर पर चलाए जा रहे तमाम अभियान शायद एक ही दिन तक सीमित रह पाते हैं। भारत में हमारे शास्त्रों के अनुसार अगर हम पृथ्वी बचाना चाहते हैं तो हमें इसी सूक्ति को संज्ञान में लेना होगा ‘त्यागो ही सर्वस्यः नानि हंते’ अर्थात् सभी कष्टों से मुक्ति हमें मात्र त्याग करने से ही मिल सकती है और इस त्याग में जरूरतों को नकारने वाला हिस्सा नहीं है, बल्कि उन विलासिताओं का है जो आने वाले समय में हमें खुद नीस्तनाबूद कर देंगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)