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राजदीप सरदेसाई का कॉलम:खाकी-खादी की पूरी पीढ़ी विश्वसनीयता के गहरे संकट में, महाराष्ट्र के घटनाक्रम से सांठगांठ सामने आई

4 महीने पहले
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राजदीप सरदेसाई, वरिष्ठ पत्रकार - Dainik Bhaskar
राजदीप सरदेसाई, वरिष्ठ पत्रकार

‘मिनिस्टर लोग मेरे पीछे और पुलिस लोग मेरे जेब में रहते हैं।’ हिन्दी फिल्में कभी-कभी अपने वक्त से आगे चलती हैं। यह डायलॉग 2011 की फिल्म ‘सिंघम’ का है। इसमें विलेन के खिलाफ ईमानदार इंस्पेक्टर बाजीराव सिंघम खड़ा होता है, जो गुस्सा आने पर मराठी में कहता है, ‘अता माझी सटकली।’ (अब मुझे गुस्सा आ रहा है) महाराष्ट्र के राजनीतिक घटनाक्रम देखकर किसी भी समझदार नागरिक की इंस्पेक्टर सिंघम की तरह गुस्से में यही संवाद बोलने की इच्छा होगी।

आखिरकार, जब राजनीतिक और पुलिस नेतृत्व, दोनों झूठ, धोखे और संभावित अपराधों के जाल में फंसे हों, तो कोई भी सोचेगा कि क्या कानून बनाने वालों और उसे लागू करने वालों ने जनसेवा की धारणा त्याग दी है और ‘पैसा दो, माल लो’ वाले निजी उपक्रम में साझेदार बन गए हैं।

वरना महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख और मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह के जुबानी जंग के क्या मायने निकालें? जैसे ही कमिश्नर का ट्रांसफर हुआ, उन्होंने अचानक मंत्री पर उस अधिकारी सचिन वझे से 100 करोड़ रुपए प्रतिमाह ‘वसूली’ का आरोप लगा दिया, जिसे अंबानी बॉम्ब केस में गिरफ्तार किया गया है। जवाब में गृहमंत्री ने दावा किया कि पुलिस कमिश्नर खुद को उस केस में फंसने से बचाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसमें मनसुख हिरेन मृत पाया गया।

आरोप-प्रत्यारोप के बीच असहज सच यह है कि महाराष्ट्र ही क्या, भारत की राजनेता-पुलिस सांठगांठ की पोल खुल गई है। कुछ साल पहले, महाराष्ट्र के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी संजय पांडे ने आमिर खान के शो ‘सत्यमेव जयते’ में जिक्र किया था कि एक ‘सुनियोजित, संस्थागत व्यवस्था’ है, जिसके तहत मुंबई में डांस बार और रेस्त्रां को स्थानीय पुलिस और उनके अधिकारियों को हर महीने ‘हफ्ता’ देना पड़ता है।

ऐसा ही कुछ मुंबई के पूर्व कमिश्नर परमबीर सिंह ने अपनी चिट्‌ठी में गृहमंत्री अनिल देशमुख पर आरोप लगाते हुए कहा है। परमबीर फरवरी 2020 में मुंबई कमिश्नर बने थे और 13 महीने बाद उनका तबादला होम गार्ड विभाग में होने पर ही उन्होंने व्हिसल ब्लोअर बनने का फैसला लिया। और मंत्री को भी लगता है कि पिछले एक साल में कई बड़ी जांचों में खुलकर समर्थन करने के बाद, अब मुंबई के शीर्ष पुलिस अधिकारी की ईमानदारी पर सवाल उठाना सही है।

इसीलिए न देशमुख और न ही परमबीर के शब्दों पर भरोसा कर सकते हैं। समय आ गया है कि आत्मतुष्ट रोष का झूठा दिखावा खत्म हो, जो महाराष्ट्र में सत्ताधारी उच्चवर्ग कर रहा है। अगर पुलिस कमिश्नर का तबादला न हुआ होता, तो शायद वे कुछ न कहते। अगर मनसुख हिरेन की लाश न मिलती तो शायद अंबानी बॉम्ब केस खत्म हो जाता और नियंत्रण वझे के हाथ में होता।

अगर पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता देवेंद्र फडणवीस के पास गोपनीय दस्तावेज न होते, तो शायद शिवसेना सरकार आसानी से मामला संभाल लेती। उद्धव ठाकरे और शरद पवार भी इस मामले से खुद को दूर नहीं रख पाए। आखिर, वझे, जिसे कभी ‘एनकाउंटर’ स्पेशलिस्ट कहते थे, फेक एनकाउंटर में निलंबित होने के बाद शिवसेना में शामिल हुआ था।

महाराष्ट्र विकास अगाड़ी सत्ता में आने के बाद उसे 2020 में बहाल करने की ऐसी क्या मजबूरी थी, जबकि वझे को ‘वर्दी में शिवसैनिक’ के रूप में देखा जाता था? और क्या महाराष्ट्र राजनीति के दिग्गज पवार दावा कर सकते हैं कि उन्हें पता ही नहीं था कि NCP के गृह मंत्री क्या कर रहे हैं? और भले ही फडणवीस दावा करें कि उन्होंने महाराष्ट्र सरकार को बैकफुट पर ला दिया है, वे यह न भूलें कि उनके समय में भी यही ‘सिस्टम’ था, जब वे शिवसेना की साझेदारी में 5 साल मुख्यमंत्री रहे।

क्या कोई यह मानेगा कि राजनेता-पुलिस की सांठगांठ नवंबर 2019 में MVA सरकार के आने के बाद उभरी? क्या कोई भी राज्य सरकार दावा कर सकती है कि उसने 2006 में प्रकाश सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुझाए गए पुलिस सुधारों को लागू करने का प्रयास किया है? इन सुधारों में पुलिस को राजनीतिक दबावों से बचाने पर जोर था।

लेकिन कोई भी सरकार उस हाथ को क्यों काटेगी, जो उसका पेट भरता है? सच यह है कि चाहे वह कथित वसूली का रैकेट हो या ‘ट्रांसफर पोस्टिंग’ का उद्योग, भ्रष्ट राजनेता-पुलिस संस्कृति लगातार बढ़ रही है, जिससे संस्थागत संरचनाएं उस हद तक कमजोर हो गई हैं कि सही-गलत के बीच की रेखा धुंधला चुकी है। यह सिर्फ रिश्वत लेने वाले सड़क के किसी सिपाही की बात नहीं है, लगता है कि यह शृंखला स्टेशन हाउस ऑफिसर से लेकर IPS अधिकारियों और उनके राजनीतिक आकाओं तक जाती है।

यही कारण है कि महाराष्ट्र में होने वाली कोई भी जांच, सामान्य राजनीतिक बदले से परे जानी चाहिए। दोषी को पहचान कर कठोर सजा देनी चाहिए। विश्वसनीय पुलिस अधिकारियों और सही राजनेताओं की सुरक्षा के लिए भी धोखेबाजी की कड़ी टूटनी चाहिए। वरना हर नाराज नागरिक चीखेगा: ‘अता माझी सटकली।’

पुनश्च: महाराष्ट्र का माहौल अभी गमजदा न होता, तो कुछ घटनाक्रम हास्यास्पद लगते। जैसे पवार का सुझाव कि आरोपों की जांच की जिम्मेदारी मुंबई के भूतपूर्व पुलिस कमिश्नर, 92 के साल के जूलियो रिबेरो को दी जाए। रिबेरो ने इसे अस्वीकार कर दिया। लेकिन 90 से ज्यादा उम्र वाले को इस काम के लिए सबसे सही व्यक्ति मानना ही बताता है कि खाकी और खादी वालों की पूरी पीढ़ी ही विश्वसनीयता के कितने गहरे संकट का सामना कर रही है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)