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शमिका रवि का कॉलम:देश में अतिरिक्त मौतों की गणना की मौजूदा व्यवस्था कमजोर है, इसके लिए मृत्यु पंजीकरण व्यवस्था काफी नहीं

10 दिन पहले
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शमिका रवि, प्रधानमंत्री की इकोनॉमिक एडवाइजरी काउंसिल की पूर्व सदस्य - Dainik Bhaskar
शमिका रवि, प्रधानमंत्री की इकोनॉमिक एडवाइजरी काउंसिल की पूर्व सदस्य

हमारे संविधान में जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम 1969 के तहत यह अनिवार्य है कि सभी की मृत्यु पर पंजीकरण हो। लेकिन अब तक यह पूरी तरह हो नहीं पाया है। कहने को अब देश में पंजीकरण 92% लेकिन इसमें अलग-अलग राज्यों में बहुत विविधता दिखती है। कोरोना से कई जिंदगियां गईं और इसमें मृतकों की संख्या पर सवाल उठते रहते हैं, खासतौर पर अतिरिक्त मौतों को लेकर।

आमतौर पर भारत के सिविल रजिस्ट्री सिस्टम (सीआरएस) के आधार पर अतिरिक्त मौतों का अनुमान लगाते हैं। लेकिन इस पर आधारित विश्लेषण भ्रामक हो सकते हैं क्योंकि वास्तविकता यह है कि देश के डेटा सिस्टम में सभी मौतें अब भी दर्ज नहीं होतीं। उनका अनुमान जनसांख्यिकीय अनुमानों के आधार पर लगाते हैं।

इसमें दो मुद्दे जरूरी हैं। पहला, ऐतिहासिक रूप से सीआरएस मौतों के अनुमान का स्रोत नहीं रहा है। इसके तीन कारण हैं। पहला, भारत में सभी मौतों का पंजीकरण नहीं होता (खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं का)। दूसरा, जरूरी नहीं कि निवास वाले शहर में ही मृत्यु पंजीकृत हो। यानी व्यक्ति का जन्म एक शहर में और मृत्यु का पंजीकरण किसी और शहर में हो सकता है।

मृत्यु की वार्षिक गणनाओं का मुख्य स्रोत सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) है। यह भारत के महारजिस्ट्रार कार्यालय द्वारा हर साल बड़े स्तर पर होने वाला जनसाख्यिकीय सर्वेक्षण है। इसके सैंपल में कुलमिलाकर देशभर से 81 लाख लोग शामिल होते हैं।

एसआरएस और सीआरएस में राष्ट्रीय स्तर और राज्य स्तर की मौतों के अनुमानों और अतिरिक्त मौतों के अनुमानों में बहुत अंतर होता है। उदाहरण के लिए 2019 में सीआरएस के तहत पंजीकृत मौतों की संख्या 76,41,076 थी, जबकि चार साल (2015-18) में पंजीकृत मौतों का औसत 65,07,832 था।

इसके आधार पर यह निष्कर्ष निकल सकता है कि 2019 में भारत में 11 लाख अतिरिक्त मृत्यु हुईं। (यह कोरोना से हुई मौतों के आधिकारिक आंकड़े से 3 गुना ज्यादा है) यह नतीजा गलत होगा क्योंकि इसी अवधि का एसआरएस डेटा बताता है कि अनुमानित मौतें 83,17,732 से थोड़ी घटकर 82,93,368 हुई हैं।

राज्य स्तर पर तो यह अंतर और खुलकर सामने आता है। उदाहरण के लिए मध्य प्रदेश (करीब 8 करोड़ आबादी) में सीआरएस के आधार पर 2019 में पंजीकृत मृत्यु 4,93,328 थीं। हालांकि चार वर्षों (2015-18) में पंजीकृत मौतों की औसत संख्या 3,61,198 थी।

यहां भी कोई यही अनुमान लगाएगा कि मप्र में 2019 में 1,30,000 अतिरिक्त मौतें हुईं। (यह कोविड मौतों के मप्र के आधिकारिक आंकड़े से 12 गुना है) इसी अवधि में एसआरएस की गणनाओं में मृत्यु की संख्या कम होना बताया गया। यानी आमतौर पर इस्तेमाल होने वाला सीआरएस भारत में कोविड-19 से हुई मौतों का अनुमान लगाने के लिए भरोसेमंद स्रोत नहीं है।

दूसरा, देशभर में पंजीकरण स्तर समान नहीं है, जो सीआरएस के तहत पंजीकृत मौतों और एसआरएस सेे मौतों के अनुमानों का अनुपात है। जैसे 2019 में मणिपुर में यह 21%, तो चंडीगढ़ में 463% था। इसके पीछे कई कारण हैं। जैसे लोग कमजोर स्वास्थ्य सुविधाओं वाले राज्यों से बेहतर सुविधाओं वाले शहरी इलाकों में आते हैं।

कुछ मामलों में मृत्यु हो जाती है तो वहीं मृत्यु पंजीकरण हो जाता है, न कि निवास वाले शहर में। इस तरह सीआरएस में एक क्षेत्र में ज्यादा, तो दूसरे में कम मृत्यु दर्ज हो सकती हैं। कोविड-19 के दौर में यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि कोविड पीड़ित कई लोग बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए जिन जगहों पर गए, वहां ज्यादा मृत्यु पंजीकृत हुईं। इस तरह सीआरएस अतिरिक्त मौतों की गणना के लिए सही नहीं है।

हमारे लिए बड़े स्तर पर जनसांख्यिकीय सर्वेक्षण ही सही तरीका है। अंतरराष्ट्रीय अनुभव हमें बताते हैं कि घर-घर जाकर हुए सर्वे ही अतिरिक्त मौतों का सही अनुमान बताते हैं। उदाहरण के लिए 2017 में पोर्टो रिको में मारिया तूफान के बाद हुए सर्वे में पता चला कि वहां आधिकारिक गिनती से 70 गुना ज्यादा मौतें हुई हैं। भारत में भी महामारी के इस दौर में डेटा आर्किटेक्चर पर भारी निवेश की जरूरत है। न सिर्फ नीति निर्माण के लिए, बल्कि मृतकों के सम्मान के लिए भी।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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