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  • The Farmers Of The Country Move Towards The Solution Ahead Of The Movement, A Year Has Passed Since The Ordinance Of Agricultural Laws Was Issued, 200 Days Of The Farmers' Movement Were Also Completed.

अमृत सागर मित्तल का कॉलम:आंदोलन से आगे समाधान की ओर बढ़ें देश के किसान, कृषि कानूनों का अध्यादेश जारी हुए सालभर बीता, किसान आंदोलन के भी 200 दिन पूरे

4 महीने पहले
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अमृत सागर मित्तल, पंजाब राज्य योजना बोर्ड के वाइस चेयरमैन, सोनालीका ग्रुप के वाइस चेयरमैन - Dainik Bhaskar
अमृत सागर मित्तल, पंजाब राज्य योजना बोर्ड के वाइस चेयरमैन, सोनालीका ग्रुप के वाइस चेयरमैन

केंद्र के तीन कृषि कानूनों का अध्यादेश जारी हुए पूरा एक साल हो गया। सालभर से किसानों का विरोध जारी है। किसानों का स्वयं अनुशासित आंदोलन एक अदृश्य जीत है। पर अन्नदाता को सकारात्मक समाधान की दरकार है जिसके लिए वह अपने खेत-खलिहान, घर-बार छोड़ सड़कों पर है।

कृषि कानून के विरोध में आंदोलनरत 500 से अधिक किसानों की शहादत व्यर्थ न जाए, इसके लिए अब किसान नेताओं को भी आंदोलन से आगे बढ़कर ऐसे सकारात्मक समाधान की ओर बढ़ना चाहिए जो क्रांतिकारी बदलाव ला सके और कृषि की दशा-दिशा बदले।

देश के 80 फीसदी किसान आज भी दयनीय हालात में हैं। हरित क्रांति के पांच दशक बाद भी 1675 रुपए से कम मासिक आमदनी वाले देश के 17 राज्यों के छोटे किसान के आर्थिक हालात सुधरेंगे? समस्या फसलों पर उनके हक का दाम न मिलने की है। हालांकि केंद्र सरकार हर साल 23 फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी)का एलान करती है पर एमएसपी को कानूनी मान्यता ना होने से इन मूल्यों पर खरीद की गारंटी नहीं है। फसल बंपर होने पर किसान को मिले दाम से खेत से मंडी के बीच के ढुलाई भाड़े का खर्च भी पूरा नहीं होता। ओईसीडी-आईसीआरआईईआर की रिपोर्ट मुताबिक किसानों को उनके हक का दाम न मिलने से 2000-01 से 2016-17 के बीच 45 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है।

देश में 100 से अधिक फसलें हैं पर केंद्र की एमएसपी सूची में 23 फसलों में से भी सिर्फ तीन-चार राज्यों की दो-तीन फसलों को छोड़ बाकी तमाम राज्यों में एमएसपी पर सरकारी खरीद सुनिश्चत नहीं है। देश के मात्र 6% किसानों को ही तीन-चार फसलों पर एमएसपी मिलता है जिनमें से 85% पंजाब व हरियाणा के किसान हैं जिनसें सरकारी एजेंसियां गेहूं व धान एमएसपी पर खरीदती हैं। इन दो राज्याें से गेहूं व धान की एमएसपी पर सरकारी खरीद के मॉडल को कानूनी मान्यता से देशभर में तमाम फसलों की सरकारी खरीद जब तक तय नहीं होगी, तब तक खेती संकट से नहीं उबर सकती।

सुप्रीम कोर्ट के स्थगनादेश तहत विचाराधीन तीन कृषि कानूनों में पहले कानून फार्मर्स प्रोड्यूस ट्रेड एंड कॉमर् स(प्रमोशन एंड फैसिलिटेशन)बिल, 2020 को लेकर दावा किया जा रहा है कि यह एपीएमसी मंडियों के बाहर किसानों को खुले बाजार में बेहतर दाम पर फसल बेचने का रास्ता खोलेगा। जबकि किसान आशंकित है कि इस कृषि कानून से केंद्र सरकार की जुगत फसलों के एमएसपी पर खरीद से बचने की है।

कृषि के उत्थान के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2017 में कहा था कि केंद्र द्वारा ऐसे कदम उठाए जा रहे हैं, जिससे 2022 तक किसानों की आय दोगुनी हो जाएगी। यह सही मौका है कि किसान केंद्र के साथ होने वाली अगले दौर की वार्ता में सरकार से यह जानें कि खेती में आय दोगुनी करने के लिए अभी तक क्या कदम उठाए गए हैं? किसान भी सरकार को सुझाएं कि ऐसे कौन से उपाय किए जाएं जिससे खेती घाटे का सौदा न रहे।

सरकार और किसानों को ही अब मिल बैठकर ऐसे उपाय लागू करने है जिससे खेती में आय बढ़ाने का पक्का समाधान हो। आंदोलन के बदले केंद्र सरकार तीन कृषि कानूनों में संशोधन को तैयार है तो इन कानूनों को रद्द करने की रट से हट कर किसान एमएसपी को कानूनी मान्यता और इस पर फसलों की खरीद की लिखित गारंटी के सकारात्मक विकल्प पर विचार करें। यही खेती-किसानी की जीवन रेखा है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)