शेखर गुप्ता का कॉलम:भाजपा-कांग्रेस का भविष्य एक-दूसरे से जुड़ा, कांग्रेस की कोशिशों के बिना भाजपा को चुनौती नहीं मिलेगी

6 महीने पहले
  • कॉपी लिंक
शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ - Dainik Bhaskar
शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल के दो साल पूरे हो रहे हैं। वहीं राजीव गांधी की हत्या के 30 साल पूरे हो रहे हैं। ये दो मौके ऐसे हैं जब देश की दो सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टियों, भाजपा और कांग्रेस के 2024 की गर्मियों तक के भविष्य पर विचार कर सकते हैं। इन दो प्रतिद्वंद्वियों का भविष्य एक-दूसरे से जुड़ा है।

राजीव गांधी की हत्या के बाद तीसरे दशक में राष्ट्रीय राजनीति में उनकी पार्टी की हैसियत दौड़ में सिर्फ भाग लेने वाले फिसड्डी प्रतियोगी जैसी रह गई है। कांग्रेस के भविष्य की बात करने की वजह यह है कि देश में किसी और दल को दहाई अंकों में वोट नहीं मिले। इसके अलावा, अगर आप सभी गैर-कांग्रेस विपक्षी दलों के वोट जोड़ दें तो वह कांग्रेस को हासिल 20% वोट के बराबर नहीं पहुंचता। इसकी तुलना में, भाजपा विरोधी प्रायः हर पार्टी ने अपने कुछ वफादार वोटरों को गंवाया।

कांग्रेस भले फिसड्डी साबित हुई हो, देश की सत्ता की दौड़ में केवल वही दूसरे नंबर पर है, भले ही बहुत पीछे हो। मोदी और शाह पर गौर कीजिए, वे अच्छी तरह जानते हैं कि कांग्रेस को वे हल्के में नहीं ले सकते। यही वजह है कि जिन राज्यों (बंगाल) में कांग्रेस का कोई दम नहीं है या जहां (केरल, तमिलनाडु) भाजपा का कोई वजूद नहीं है वहां भी वे कांग्रेस और गांधी परिवार पर सीधा हमला करते हैं।

मोदी और शाह तीन बातें जानते हैं- पहली, राष्ट्रीय स्तर पर केवल कांग्रेस चुनौती दे सकती है। दूसरी, कांग्रेस का वोट प्रतिशत भाजपा से ऊपर नहीं जाना चाहिए। अगर यह बढ़ा तो भाजपा-एनडीए की सरकार तो रहेगी लेकिन गठबंधन की सरकार ज्यादा होगी। और तब संवैधानिक संस्थाएं भी इतनी कमजोर नहीं होंगी। तीसरी, गांधी परिवार ही मुख्य है। वह कांग्रेस को एकजुट रख सकता है। इसलिए उसके ऊपर बेरहमी से हमला करते रहने की जरूरत है।

कांग्रेस या गांधी परिवार मोदी-शाह की भाजपा को हल्के में शायद इसलिए लेते हैं कि वे उसके प्रति तिरस्कार का भाव रखते हैं। कांग्रेस की सोच में तीन मुख्य खामियां हैं। पहली, नरेंद्र मोदी का उत्कर्ष एक अस्थायी भटकाव है। वोटरों का विवेक जल्द लौटेगा। महामारी और आर्थिक गिरावट भाजपा को ले डूबेगी। दूसरी, भाजपा की सबसे दुखती रग RSS और उसकी विचारधारा है।

विचारधारा तो अमूर्त है, वास्तविक चीज तो हैं व्यक्ति। कांग्रेस अपने सीमित हथियार RSS, सावरकर-गोलवलकर पर हमले में बर्बाद करती रही है। भाजपा नेहरू-गांधी वंश पर हमले करती रही है, मगर कांग्रेस के पूर्व और कुछ वर्तमान नेताओं के बारे में अच्छी बातें करती रही है।

तीसरी, कांग्रेस का भविष्य धुर वामपंथ में है। इसीलिए वह वाम मोर्चा से हाथ मिला रही है, और केरल विधानसभा चुनाव में उसे सिफर हासिल हुआ, जबकि उसे यहां जीतना था। वहीं प. बंगाल में कुछ सीटें शून्य से तो बेहतर ही होतीं। लेकिन यह कांग्रेस और खासकर इसके युवा नेता कम्युनिस्टों पर फिदा हैं।

अभी तो मौसम ममता बनर्जी का है। लेकिन राजनीति में जीत की उम्र हार के मुक़ाबले छोटी होती है। राजनीति उनकी कहानी को जल्दी ही भुला देगी। मेरे बुद्धिमान सहयोगी, ‘द प्रिंट’ के राजनीतिक संपादक डी.के. सिंह बताते हैं कि 2024 के बड़े चुनाव से पहले 16 राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव होंगे।

इनमें उत्तर प्रदेश छोड़कर बाकी सभी राज्यों में कांग्रेस ही भाजपा की मुख्य प्रतिद्वंद्वी होगी। इनमें थोड़ी कामयाबी भी पार्टी में जान डाल सकती है और तब वह 2024 में अधिक भरोसेमंद प्रतिद्वंद्वी के रूप उभर सकती है। लेकिन हारी तो इसमें टूट आ सकती है।

यह कहना बेमानी है कि काश, गांधी परिवार अलग हो जाए और पार्टी को नए नेता के हाथ में सौंप दे या राहुल तो हट ही जाएं। यह नहीं होगा। कांग्रेस हकीकत को मोदी-शाह समझ गए मगर उसके कई समर्थक नहीं कबूल कर पाते कि गांधी परिवार के बिना कांग्रेस रहेगी नहीं।

आज वह 20% से ज्यादा वोट नहीं हासिल कर पा रहा है लेकिन पार्टी को एकजुट रखे है। भाजपा का गुरुत्वाकर्षण केंद्र RSS है। कांग्रेस एक ही खंभे पर खड़ी है, जिसका नाम है गांधी परिवार। क्या तीसरी बार सत्ता हासिल करने की मोदी की कोशिश को ज्यादा चुनौतीपूर्ण बना सकते हैं? अगर हां तो कौन, कैसे बनाएगा?

तीसरा, चौथा, सेकुलर, प्रगतिशील… तरह-तरह के मोर्चे आजमाए जा चुके हैं। वे नाकाम रहे। क्षेत्रीय नेता 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी सरीखे दिग्गज नेता को हराने में मददगार बनते हैं। वे विपक्ष को अतिरिक्त वोट दिला सकते हैं। कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों की जमात को अगर हम ‘मोदी पीड़ित समाज’ कहें, तो उसके लिए एक और विकल्प है।

एक ऐसी कंपनी की कल्पना करें जिसके ब्रांड की पुरानी पहचान और वफादार ग्राहकों की जमात भी हो मगर वह नए प्रतिद्वंद्वियों से मात खा रही हो। तो वह क्या करेगी? वह कहीं से एक नया CEO ले आएगी। कांग्रेस में तो ऐसा नहीं हो सकता। क्या बड़े विपक्षी गठबंधन में, जिसकी धुरी कांग्रेस हो, ऐसा हो सकता है? कांग्रेस अपने नेताओं के करिश्मे में तो योगदान नहीं दे सकती मगर वफादार ग्राहकों के 20% के आधार का लाभ तो दे ही सकती है।

अगर ऐसा कोई विचार उभरता है, तो ममता बनर्जी और उनके सरीखे दूसरे नेता मुक़ाबले में आ सकते हैं। इसका अर्थ यह भी होगा कि कांग्रेस को राज करने वाली पार्टी होने का अपना मोह छोड़ना पड़ेगा। यह कष्टप्रद होगा मगर यह नामुमकिन नहीं है। न ही यह उन लोगों की एक कपोलकल्पना है, जो चाहते हैं कि गांधी परिवार मंच से दूर रहे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)