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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:फिल्म ‘भूलन द मेज’ संजीव बख्शी की रचना की प्रेरणा छत्तीसगढ़ की एक कथा है

13 दिन पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

छत्तीसगढ़ की सरकार ने फिल्म उद्योग को बहुत सारी रियायतें देने की घोषणा की है। मुख्यमंत्री और उनके साथियों को बधाई। प्राय: इस उद्योग पर विविध कर लगाकर इसका शोषण भी किया जाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मल्टीप्लेक्स के साथ ही एकल सिनेमाघरों के निर्माण करने पर भी ढेर सारी राशि देने की घोषणा की गई है। इसके साथ ही किसी भी फिल्मकार द्वारा छत्तीसगढ़ में शूटिंग करने की सहूलियतों के साथ नगद राशि भी दी जाएगी।

पूरी फिल्म या उसके अधिकांश भाग की शूटिंग करने पर एक करोड़ पचास लाख तक रुपए दिए जाएंगे। ज्ञातव्य है कि बस्तर के सौंदर्य की कल्पना करना कठिन है। केशकाल की पहाड़ी और उसके आसपास का सौंदर्य किसी भी फिल्म का अनोखा आकर्षण हो सकता है। आदिवासी क्षेत्र में सामाजिक रीतियां ऐसी है कि महिला का समुचित आदर किया जाता है।

वहां वर ही अपनी मनपसंद कन्या से विवाह करने के लिए कन्या के माता-पिता को उनका मुंह मांगा धन देता है। धन की कमी को वर कन्या के माता-पिता के घर चाकरी करके भी अदा कर सकता है। विवाह के क्रम में पुरुष को अपनी भावी पत्नी को पीठ पर लादकर कुछ दूर दौड़ना होता है और महिला की सहेलियां उसे गुदगुदाती हैं कि वह महिला को गिरा दे। ऐसा होने पर विवाह रोक दिया जाता है। इस तरह फिटनेस का परीक्षण किया जाता है।

सभी प्रांतों में समय-समय पर राजनीति करवट लेती है और शासन विभिन्न राजनीतिक दलों के हाथ लगता है परंतु छत्तीसगढ़ के आला अफसर अपने प्रांत की सांस्कृतिक संपदा की रक्षा का कार्य करते रहते हैं। सरकारी घोषणा के अनुसार छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा दी गई रकम से पूरी फिल्म बनाई जा सकती है। ज्ञातव्य है कि संजीव बख्शी की कथा से प्रेरित फिल्म ‘भूलन कांदा’ को राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

फिल्म को ‘भूलन द मेज’ नाम दिया गया है। संजीव बख्शी की रचना की प्रेरणा छत्तीसगढ़ की एक कथा है। छत्तीसगढ़ के जंगल में राही का पैर एक विशेष टहनी या जल पर पढ़ते ही वह सब कुछ भूल जाता है और स्थिर खड़ा रहता है किसी अन्य व्यक्ति के स्पर्श से वह फिर से चलते फिरते हुए सामान्य हो जाता है। क्या पल दो पल के लिए ही सही, सब कुछ भूल जाना एक आध्यात्मिक अनुभव नहीं माना जा सकता? उस अवस्था में व्यक्ति स्वयं के साथ शू्न्य के फासले पर खड़ा रहता है। अब वह बिना किसी आईने के स्वयं को देख सकता है। तमाम आवरण और परदे हट गए हैं।

सरकार ने घोषणा की है कि देश के किसी भी भाग में बनाई गई फिल्म के यूनिट में 20% सदस्यों का जन्म छत्तीसगढ़ में हुआ है तो उस फिल्म को भी सरकार कुछ सहायता देगी तथा प्रांत में उसे मनोरंजन कर से मुक्त कर दिया जाएगा। छत्तीसगढ़ के कांकेर क्षेत्र में बसे आदिवासी लोगों का रंग गोरा है। वहां के लोगों को केवल नमक की आवश्यकता होती है।

सरकार आधी रात को उस बस्ती की सरहद पर नमक की बोरियां रख देती है। उन आदिवासियों के आत्मसम्मान की भावना इतनी प्रबल है कि वे नमक के बदले शहद इत्यादि सरहद पर रख देते हैं। सरहद पर कटीले तार लगे हैं। सरकार इस विचित्र प्रजाति को सुरक्षित बनाए रखना चाहती है। ज्ञातव्य है कि किसी एक प्रजाति का संपूर्ण विनाश पूरे मानव समाज के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। विविधता का यह खुला तकाजा होगा कि महाप्रलय की संभावना होने पर संकीर्णता के हामी एक जोड़े को भी सुरक्षित ले जाना है।

मनुष्य, देवता और दानव के चक्र पर ही विश्व घूमता है। वर्तमान में जाने क्यों कभी-कभी भ्रम होता है की व्यवस्था का पैर भूलन कांदा पर पड़ गया है और उन्हें यथार्थ भी स्पर्श नहीं कर रहा है। सब कुछ स्थगित सा लगता है। कभी-कभी जाने यह आभास होता है कि घोटुल आदिवासी यूथ डॉरमेट्री उन्मुक्त व्यवस्था सारे विश्व में फैल रही है या विश्व ही छोटे से घोटुल में सिमट रहा है।