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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:गीतकार का आनंद और दर्द, स्वयं को कलम के द्वारा बेहतर ढंग से अभिव्यक्त कर सकते हैं

5 दिन पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

फिल्म गीतकार आनंद बख्शी के पुत्र राकेश आनंद बख्शी ने अपने पिता के जीवन से प्रेरित एक किताब जारी की है, जिसे पेंगुइन प्रकाशन ने जारी किया है। पुस्तक का नाम ही उसका परिचय देता है, ‘नगमे, किस्से, बातें, यादें।’ आनंद बख्शी का चयन सेना के लिए हो रहा था। उन्हें महसूस हुआ था कि वे स्वयं को कलम के द्वारा बेहतर ढंग से अभिव्यक्त कर सकते हैं।

अधिकारी ने उन्हें इजाजत दे दी और आनंद बख्शी कुछ कपड़ों तथा कागज और कलम के साथ मुंबई पहुंचे। उनका कोई परिचित उस महानगर में नहीं था। समुद्र के किनारे बसे महानगर में मनुष्यों की लहरें किनारों से टकराती हुईं कहीं ना कहीं अपना ठिकाना खोज लेती हैं। इस्पात, पत्थरों, सीमेंट से बने महानगरों में भी मानवीय करुणा किसी सतह पर लगातार प्रवाहित रहती है। अभाव, साधनहीन व्यक्ति को बड़े प्यार से पालता है, फुटपाथ पर जीवन बसर करने वालों की रात, तारों से गीत गाते हुए गुजर जाती है।

आनंद बख्शी की मुलाकात संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल से हुई। प्रतिभा का चुंबक लोगों को जोड़ता है। इस टीम ने अनेक गीत बनाए। राहुल देव बर्मन के साथ भी आनंद बख्शी ने काम किया। आनंद बख्शी के माता-पिता की मृत्यु कोमा में रहते हुए हुई। क्या कोमा में रहते हुए उन्होंने कभी अपने पुत्र को कुछ कहने का प्रयास किया होगा? अलविदा भी नहीं कह सके, यह कैसा जाना हुआ। अगर आंख खुली हो तो कुछ संकेत किया जा सकता है। कोमा में उनकी आंखें भी बंद थीं।

ग़ालिब के एक शेर का आशय यह है कि शरीर की यात्रा के अंतिम पड़ाव पर जो भी आता है वह आंख बंद किए ही आता है। गौरतलब है कि आनंद बख्शी, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल अपने काम के लिए एक-दूसरे के साथ लंबे समय तक बैठते थे। आनंद बख्शी बातचीत को शामिल करके गीत के बोल लिख लेते थे। मसलन, आनंद बख्शी ने कहा ‘अच्छा तो हम चलते हैं।’, तो लक्ष्मीकांत ने पूछा ‘फिर कब मिलोगे’ आनंद बख्शी ने इस बातचीत को ही गीत का मुखड़ा बना लिया।

आनंद बख्शी का कहना था कि फिल्म गीत की लोकप्रियता में संगीतकार, गीतकार, गायक से अधिक महत्व फिल्मकार और कलाकार का है, जिस पर गीत फिल्माया जाता है। फिल्म ‘बॉबी’ के लिए राज कपूर, लक्ष्मीकांत के बंगले आते थे। उसमें अनेक कमरे थे। राज कपूर ने कहा कि ‘इतने कमरे वाले बंगले में कोई किसी कमरे में बंद हो जाए…’ आनंद बख्शी ने जोड़ा कि और चाबी खो जाए इस तरह एक गीत की रचना हो गई। दुख की बात है कि आम आदमी की बातचीत से गीत बन जाते हैं, परंतु यही बात सत्ता के गुंबद में बैठे लोगों तक नहीं पहुंचती। हो सकता है वे सुनकर भी नहीं सुनते।

राकेश बख्शी का कहना है कि फिल्मी गीतों पर टिप्पणियां की जाती हैं। सोशल मीडिया पर टांग खींची जाती है परंतु आनंद बख्शी के गीत इससे बचे हुए हैं। संभवत: आम आदमी की बातचीत के उपयोग के कारण उनके गीतों को विषय नहीं बनाया है। इस किताब के प्रकाशन के लिए उस फिल्मकार ने कोई आर्थिक मदद नहीं की जिसके लिए आनंद बख्शी ने बहुत काम किया था।

यह बात राकेश ने खाकसार को बताई थी। आनंद बख्शी के इलाज के लिए उन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया था। दर्द की सेज पर प्यार के नगमे गुनगुनाते हुए उन्होंने एक रचना की थी। ‘मैं कोई बर्फ नहीं कि पिघल जाऊंगा, कोई हर्फ नहीं कि मिट जाऊंगा, मैं तो एक लम्हा हूं फिजाओं में बिखर जाऊंगा।’

आनंद बख्शी को मलाल था कि कोमा में गए उनके माता-पिता ने अलविदा तक नहीं कहा। राकेश बख्शी ने अपने पिता की अनकही को भी सुन लिया और इस पुस्तक में अवाम के लिए अभिव्यक्त कर दिया। ‘हीरो’ के गीत में आनंद बख्शी ने ‘बदमाश हवाएं’ लिखा है। वर्तमान की हवा निर्मम भी है।