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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:जीवन को निर्भय होकर जीने का आनंद ही कुछ और है इसलिए अपने मन पर काम करते रहिए

6 महीने पहले
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पं. विजयशंकर मेहता - Dainik Bhaskar
पं. विजयशंकर मेहता

अच्छे से अच्छे भले मनुष्य को भी अमानुष बना देता है मन। हमारे संत-महात्माओं ने समय-समय पर अलग-अलग ढंग से यह बात कही है। भगवान भी जानते हैं कि मेरा भक्त जब भी मात खाएगा, मन के मारे खाएगा और यहां उसे मेरी जरूरत अवश्य पड़ेगी। इसीलिए जब अपनी सेना के वानर-भालुओं से विदाई का समय आ गया तो श्रीराम ने लगभग अंतिम संदेश देते हुए उनसे कहा- ‘निज निज गृह अब तुम्ह सब जाहू। सुमिरेहु मोहि डरपहु जनि काहू।

अर्थात अब तुम सब अपने-अपने घर जाओ। मेरा स्मरण करते रहना और कभी किसी से डरना नहीं। इस पूरे दृश्य में भगवान ने दो बातें कही हैं- एक, मेरा स्मरण करते रहना और दूसरी, किसी से डरना नहीं। मनुष्य को यदि सबसे अधिक कोई डराता है, तो वह है उसका मन। मन को, बातों को मल्टीपल करके दिखाने में बहुत मजा आता है और व्यक्ति भयभीत हो जाता है।

राम कहते हैं एक भक्त को कभी किसी से डरना नहीं चाहिए। उसकी पीठ पर सदैव मेरा हाथ रहता है। लेकिन, इस मन का क्या करें? मन को यदि नियंत्रित करना हो तो इसके लिए भगवान उपाय बताते हैं सतत मेरा स्मरण करते रहना। परमात्मा का निरंतर स्मरण ही मन का नियंत्रण है, और नियंत्रित मन भक्त को कभी भयभीत नहीं कर सकता। जीवन को निर्भय होकर जीने का आनंद ही कुछ और है। इसलिए अपने मन पर काम करते रहिए।

humarehanuman@gmail.com

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