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  • The Latest Figures Of Industrial Growth And Inflation Are Showing A Worrying Picture Of The Recovery Of The Economy.

मदन सबनवीस का कॉलम:औद्योगिक वृद्धि और महंगाई के ताजा आंकड़े अर्थव्यवस्था की रिकवरी की चिंताजनक तस्वीर दिखा रहे

6 महीने पहले
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मदन सबनवीस, चीफ इकोनॉमिस्ट, केयर रेटिंग्स - Dainik Bhaskar
मदन सबनवीस, चीफ इकोनॉमिस्ट, केयर रेटिंग्स

हाल ही में आए औद्योगिक वृद्धि और महंगाई के आंकड़े चिंताजनक हैं क्योंकि जहां औद्योगिक वृद्धि में गिरावट है, वहीं महंगाई बढ़ी है। यह रिकवरी की उस कहानी के विपरीत है, जो पिछले दो महीनों से सुनाई जा रही है। ऐसा लगा था कि नवंबर के बाद से अर्थव्यवस्था में थोड़ी बढ़ोतरी होगी क्योंकि दबी हुई मांग का असर दिखेगा। यह भी माना गया था कि चूंकि खाद्य महंगाई कम हो रही है, इसलिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आंकड़े कम होंगे, जिससे आरबीआई उद्योगों के दृष्टिकोण से दरें और कम कर सकेगा।

हालांकि दोनों ही अनुमानों में व्यवधान आ गए। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) में जनवरी के लिए -1.6% वृद्धि दर्ज की गई है। चिंता यह है कि पूंजीगत वस्तुएं और उपभोक्ता वस्तुएं, दोनों के उत्पादन में नकारात्मक वृद्धि दर देखी गई है। पूंजीगत वस्तुओं का मामला उतना चिंताजनक नहीं है क्योंकि निवेश शुरू न होने के कारण यह पूरे साल नकारात्मक रहा है। बैंक भी उधार देने में सावधानी बरत रहे हैं क्योंकि वित्तीय वर्ष 2020-21 उतार-चढ़ाव भरा रहा।

लेकिन उपभोक्ता वस्तुओं का पक्ष चौंकाने वाला है क्योंकि कई कंपनियों ने साल की तीसरी तिमाही में बिक्री में थोड़ी बढ़ोतरी बताई थी, जिससे लगा था कि खपत पटरी पर आ गई है। यह भी लगा था कि भले ही लोग दुकानों पर जाकर कम खरीदारी कर रहे हों, लेकिन ऑनलाइन बिक्री बढ़ी थी। लेकिन यहां टिकाऊ और गैर-टिकाऊ वस्तुओं के लिए नकारात्मक रही वृद्धि दरों की अस्थिर प्रकृति दबी हुई मांग की अवधारणा पर सवाल उठा रही है।

ऐसा लग रहा है कि स्थिति बदलने के लिए अर्थव्यवस्था को और इंतजार करना पड़ेगा। इसके पीछे कम नौकरियां व वेतन कटौती के कारण कम खपत शक्ति को वजह मान सकते हैं, जिसने परिवारों की क्रय शक्ति को प्रभावित किया है। दूसरी चिंता महंगाई है क्योंकि 5% पर सीपीआई महंगाई पलट चुकी है और अगले महीने और बढ़ेगी। अब तक खाद्य सामग्रियों की ज्यादा कीमतों के कारण महंगाई ज्यादा रही लेकिन खाद्य कीमतें कम हो रही हैं और इस तरह महंगाई दर भी नीचे आई है, लेकिन साथ में दालों, मांस व तेल से जुड़ी समस्याएं हैं (वैश्विक कीमतें बढ़ रही हैं और भारत अपनी जरूरतों का 55-60% आयात करता है)।

लेकिन गैर-खाद्य वस्तुओं के मामले में बदलाव हुआ है, जो ईंधन और अन्य वस्तुओं व सेवाओं से जुड़ी हैं। इनमें महंगाई ज्यादा चिंताजनक है। समस्या यह है कि इस वर्ग में संस्थागत कारकों से ज्यादातर कीमतें बढ़ी हैं। उदाहरण के लिए कच्चे तेल की वैश्विक कीमतें कम होने के बावजूद ईंधन उत्पादों पर उच्च टैक्स में बदलाव नहीं हुआ। इसकी सीपीआई में छोटी हिस्सेदारी है लेकिन इससे परिवहन लागत बढ़ती है, जो उत्पादों की कीमत बढ़ाती है क्योंकि कई वस्तुओं का परिवहन सड़क से होता है। यह समस्या बनी रहेगी।

फिर आती हैं निजी उत्पादों, स्वास्थ्य संबंधी उत्पादों और कपड़ों आदि की कीमतें। यहां महंगाई बढ़कर 4-8.65% के बीच रही है। महंगाई जल्द कम नहीं होगी क्योंकि ये उत्पाद-सेवाएं एमआरपी पर होती हैं। अगर टैक्स संरचना नहीं बदलती है, तो एमआरपी एक बार बढ़ाने के बाद कम नहीं की जाती। वास्तव में इलेक्ट्रॉनिक जैसी कुछ वस्तुओं के दाम वित्तीय वर्ष 2021-22 में और बढ़ेंगे क्योंकि कुछ उत्पादों पर इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ी हैं।

इस तरह यह बड़ी चिंता है, खासतौर पर यह देखते हुए कि जो अर्थव्यवस्था रिकवरी की ओर बढ़ती लग रही थी, उसमें अब बाधा आ सकती है। टीकाकरण अभियान की प्रगति मिश्रित है और कोरोना की दूसरी लहर की आशंका जताई जा रही है। इसकी वजह से कई शहरों, जिनमें बिजनेस हब भी शामिल हैं, में स्थानीय लॉकडाउनों ने बिजनेस योजनाएं बिगाड़ दी हैं। यह बाधा आगे भी अर्थव्यवस्था की रिकवरी के रास्ते में आएगी।

इसीलिए, भले ही ऐसा लगता था कि अर्थव्यवस्था अनुमान से बेहतर प्रदर्शन करेगी, (सीएसओ का इस साल के लिए -8% का अनुमान था और विशेषज्ञ मानते हैं कि यह -6 से -6.5% के बीच रहेगी), लेकिन अब लगता है कि इस वृद्धि या अधोगति दर में बढ़त नहीं होगी। देश की नजर अगले महीने आने वाली आरबीआई की नीति पर होगी और इसकी व्याख्या महत्वपूर्ण होगी क्योंकि यह आज की समस्याओं के हल के लिए माहौल बनाएगी। बिजनेस इस घोषणा का बेसब्री से इंतजार करेंगे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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