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रुक्मिणी बनर्जी का कॉलम:हमारी महिला हॉकी टीम से मिलीं सीख हमारी शिक्षा प्रणाली को नई दिशा दिखा सकती हैं, हिन्दुस्तान की महिला हॉकी टीम के नाम एक चिट्‌ठी...

एक महीने पहले
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रुक्मिणी बनर्जी, ‘प्रथम’ एजुकेशन फाउंडेशन से संबद्ध - Dainik Bhaskar
रुक्मिणी बनर्जी, ‘प्रथम’ एजुकेशन फाउंडेशन से संबद्ध

पिछले दो सप्ताह तक पूरे देश ने आपको गौर से देखा है। उनमें से कुछ खिलाड़ी हैं या खेलप्रेमी। पर करोड़ों दर्शक ऐसे भी हैं जो इस अद्भुत सफ़र में आपके साथ-साथ चले। मैं उनमें से एक हूं। शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ी हूं। बार-बार लगा कि हम सिर्फ प्रशंसक बनकर रुके रहे तो काम अधूरा रह जाएगा। हमारा फ़र्ज़ है कि जो रास्ता आपने दिखाया है उसपर आगे बढ़ें। शिक्षा के क्षेत्र में आपसे सीखी हर सीख आज की स्थिति के लिए उपयुक्त और जरूरी है। इनमें से पांच मुख्य बिंदुओं का उल्लेख यहां कर रही हूं।

पहली: घर की परेशानियां हमें अक्सर रोक देती हैं। आज की मजबूरियां कल के अवसर नहीं देखने देतीं। कंधों पर दूसरों की अपेक्षाओं को संभालने में कई बार हम अपने सपने बिखेर देते हैं। पर आपने ऐसा नहीं किया। परिवार की कठिनाइयों में हाथ बंटाया, परिवार को मनाया, उनकी राय बदली। आने वाले दिनों में जब स्कूल खुलेंगे तो देश के कोने-कोने में बहुत सारे घरों में लड़कियों को यह संघर्ष करना होगा। उस वक़्त आपके चेहरे उनकी आंखों के सामने प्रेरणा व साहस का संदेश लेकर आएंगे।

दूसरी: जब ओलिंपिक्स शुरू हुआ, तो कई खेल आप जीत नहीं पाईं। पर हिम्मत नहीं हारी। इसी तरह देश भर में बहुत बच्चे हैं जो पढ़ाई में अपनी कक्षा के स्तर पर नहीं हैं। तीन चार साल विद्यालय में आने के बावजूद उन्हें अभी भी पढ़ने-लिखने में दिक्कत होती है। वे ज़्यादा बोलते नहीं हैं और कोई उनसे अपेक्षा भी नहीं करता कि वे सीखेंगे। धीरे-धीरे उनका स्कूल से रिश्ता टूट जाता है। हमारी हॉकी टीम का दृढ़निश्चय हमें रास्ता दिखाता है, पीछे रहने से निराश मत हो। खुद पर भरोसा रखो। एक दूसरे के सहारे सभी आगे आ सकते हैं। कोविड के पहले भी ग्रामीण भारत के 5वीं कक्षा में पढ़ने वाले 50% बच्चे छोटी कहानी या आसान पाठ पढ़ नहीं पाते थे। पिछले डेढ़ साल में पढ़ाई का स्तर और नीचे गया होगा। पर हॉकी टीम की तरह हमारे बच्चे भी पीछे से आकर बहुत आगे तक जा सकते हैं।

तीसरी: हर खिलाड़ी के पीछे कई लोगों की भूमिका रहती है, माता-पिता, भाई-बहन, परिवार और कोच या टीचर का साथ। आज राष्ट्रीय स्तर पर हॉकी टीम की लड़कियों को वर्ल्ड क्लास जो प्रशिक्षण मिला है। पर यहां तक उन्हें पहुंचाने का श्रेय कई मार्गदर्शकों को जाता है। गांव, कस्बे और ज़िले में किसी ने किसी लड़की को खेलते देखा और समझ लिया कि इसमें प्रतिभा हैै। एक-एक शिक्षक के हाथों से निखरकर छात्र ऊंचाई तक पहुंचता है। इसी तरह हम याद रखें कि स्कूल में, पहली से लेकर हाई स्कूल तक, हर शिक्षक की ज़िम्मेदारी है कि हर शिक्षार्थी की प्रतिभा को समझकर उसका मार्गदर्शन करे।

चौथी: जब तक पूरी टीम बेहतर प्रदर्शन नहीं करती, मैच नहीं जीत सकते। हमारी महिला टीम ने यह बात बखूबी साबित की। एक दूसरे की ताक़त समझकर रणनीति बनाना, उसे मैदान पर उताकर सफल बनाना, हमारी टीम ने हर बार यह कर दिखाया। स्कूल व कक्षा के संदर्भ में भी हमें ऐसा करना है। हमारी शिक्षा व्यवस्था में व्यक्तिगत उत्कृष्टता को प्राथमिकता देते हैं न कि टीम वर्क को। पर जीवन व जीविका में ‘टीम वर्क’ ही सफलता दिलाता है।

पांचवी: आखिरी क्षण तक दिलो-जान से खेलते रहो। हिम्मत न हारो। मेडल नहीं जीता, पर टीम ने दुनिया को दिखा दिया कि चैंपियन किसे कहते हैं। आप के साहस को सलाम! हमें प्रेरणा देनेे के लिए तहे-दिल से शुक्रिया। जैसा कि आपके कोच ने आखिरी मैच के बाद ट्वीट किया, ‘कड़ी मेहनत व विश्वास सेे सपने सच हो सकते हैं।’ सपना होना जरूरी है। लक्ष्य के बग़ैर निशाना लगाना संभव नहीं। आप सभी को हमारी ओर से बहुत-बहुत धन्यवाद। पूरी शिक्षा प्रणाली को आपने दिशा दिखाई है।
आपके करोड़ों प्रशंसकों में से एक
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)