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रीतिका खेड़ा का कॉलम:आधार की सीमाओं काे भुलाया जा रहा है, वोटर कार्ड को आधार से जोड़ने पर फायदा होगा या नुकसान

2 महीने पहले
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रीतिका खेड़ा, अर्थशास्त्री, दिल्ली आईआईटी में पढ़ाती हैं - Dainik Bhaskar
रीतिका खेड़ा, अर्थशास्त्री, दिल्ली आईआईटी में पढ़ाती हैं

चार साल पहले 24 अगस्त 2017 को और फिर 26 सितंबर 2018 को सर्वोच्च न्यायालय की 9 और 5 न्यायाधीशों की पीठ ने ऐतिहासिक निर्णय दिए। 2017 का निर्णय निजता के अधिकार पर था, जिस पर सवाल उठा था आधार के संदर्भ में। पांच जजों में से एक ने आधार को असंवैधानिक बताया, लेकिन बाकियों ने इसके इस्तेमाल की सीमाएं रेखांकित कीं। पिछले 3 सालों का अनुभव यह है कि इन सीमाओं को भुलाया जा रहा है।

दूसरी यूपीए सरकार (2009-2014) में कांग्रेस ने हर व्यक्ति को विशिष्ट पहचान देने के मकसद से आधार पहचान पत्र / नंबर की शुरुआत की। शुरुआत से ही इसपर अनेक सवाल उठे : जब पहले से इतने पहचान पत्र हैं, तो एक और की जरूरत क्यों? यहां तक कि बैंक में खाता खोलने के लिए रिज़र्व बैंक ने नरेगा के जॉब कार्ड को भी पहचान पत्र के रूप में मान लिया था। जवाब देने की बजाय, कांग्रेस सरकार ने आधार को कई सरकारी कामों में अनिवार्य बना दिया, बावजूद इसके कि संसदीय कमेटी ने ड्राफ्ट एक्ट को रद्द कर दिया और सर्वोच्च न्यायालय ने अनिवार्य करने पर रोक लगाई थी।

यह कहा गया कि इससे गरीबों को उनका राशन और अन्य अधिकार मिलने में सहायता होगी। हुआ यह है कि तब आधार ने हज़ारों को राशन से वंचित कर दिया। जिस भी योजना में आधार को अनिवार्य किया गया है, वहां लोग अपवर्जन और भ्रष्टाचार के शिकार हुए हैं। जब राशन लेने जाते हैं, तो कभी सिग्नल नहीं आते, कभी उंगलियों के निशान नहीं मिलते और कभी 20 किलो पर मशीन में अंगूठा लगवाने के बाद, कोटेदार 10 किलो ही देते हैं।

आधार अभी कई मामलों में आम लोगों को परेशान कर रहा है। कहीं अस्पताल में भर्ती होने के लिए आधार मांगा जाता है। बच्चों के स्कूली एडमिशन में यह बाधा बना है। हाल ही में सुकमा ज़िला के किसी गांव के लोगों को कहा गया कि आधार दिखाओ तब मानेंगे कि नक्सली नहीं हो। सिर पर राशन-बर्तन उठाए आदिवासी समुदाय को 100 किमी चलकर बस्तर जाने पर मजबूर किया गया।

ई-मित्र या प्रज्ञा केंद्र से पैसे निकालने में भी आधार का उपयोग किया जाता है। इसमें भी लोग धोखे का शिकार हुए हैं। बार-बार अंगूठा लगवाकर उनका पैसा ऐंठ लिया गया। झारखंड और अन्य राज्यों में स्कॉलरशिप घोटाले में आधार की भूमिका थी।

आधार से जुड़ी हमारी जानकारी/डेटा के व्यापार के मामले भी आए हैं। पिछले दशक में आधार को कई ऐसे पहलुओं से जोड़ा गया है जिसका शुरुआत में ज़िक्र नही था, जैसे आयकर, फोन नंबर, स्वास्थ्य। दायरा बढ़ने से मुनाफ़े के लिए डेटा माइनिंग की आशंका बढ़ती है।

जब आधार के कारण अपने अधिकारों से वंचित होते हैं तब देश का लोकतंत्र कमज़ोर होता है। अब एक नया प्रस्ताव आ रहा है- आधार को वोटर कार्ड से जोड़ा जाए। तर्क वही पुराना है कि वोटर लिस्ट में फर्जी नाम हटाने में मदद होगी। जन वितरण प्रणाली की राशन कार्ड की सूची में भी, बिना किसी विश्वसनीय आंकड़ों के यही तर्क दिया गया था। बाद में पता चला कि डुप्लीकेट और फर्जी नाम न के बराबर थे। जिन्हे फर्जी कहकर काटा गया, वास्तव में वे ऐसे लोग थे जिन्हें जानकारी ही नहीं मिली कि राशन कार्ड को आधार से जोड़ना है, या ऐसा करने में वे असफल रहे।

चुनाव में वोट डालने के समय यही होने का ख़तरा हो सकता है। यदि किसी का आधार नहीं बन पाया या खो गया या जिसकी उंगलियों के निशान नहीं चलते, वह सब वोट से वंचित हो सकते हैं। जो राशन कार्ड धारकों के साथ हुआ है वही वोटर के साथ होने की आशंका है। आधार को वोटर कार्ड से न जोड़ पाए, तो उसे ‘फर्जी’ घोषित कर दिया जाएगा।

अभी तक के अनुभव पर चलें तो ग़रीब तबके को ऐसी परेशानी झेलनी पड़ सकती है। आधार बनवाने, जोड़ने, सुधारने में घूस देने की नौबत आ सकती है। आधार न होना, आधार में दर्ज जानकारी में त्रुटि, बायोमेट्रिक्स फेल होना - इन सब के चलते आधार की वजह से देश के लाखों ग़रीब अधिकारहीन हुए हैं। इसे वोट से जोड़ना लोकतंत्र पर सीधा प्रहार साबित होगा।।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)