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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:महाराजा का नया महल बन रहा है, इसी बहाने कुछ बेरोजगारी कम होगी, सीमेंट फैक्ट्रियांं ताले बंदी से बच जाएंगी

13 दिन पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

आदित्य चोपड़ा ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है कि फिल्म उद्योग के कर्मचारियों को वैक्सीन लगाने का खर्च उनकी फिल्म निर्माण संस्था वहन करेगी। ज्ञातव्य है कि अकेले मुंबई में ही काम करने वाले कर्मचारियों के साथ-साथ देश के अन्य भागों में बने सिनेमाघरों में प्रोजेक्शन रूम से लेकर साफ-सफाई करने वाले कर्मचारियों का जमा-जोड़ बहुत अधिक लोगों का हो जाता है। अगर आदित्य चोपड़ा की तरह अन्य उद्योगों में भी इस तरह की पहल की जा सके तो महामारी के खिलाफ संघर्ष में मनुष्य जीत सकता है।

हमें लुंज पड़ी व्यवस्था पर निर्भर नहीं रहते हुए स्वयं सहकारिता के आदर्श पर चलना होगा। ज्ञातव्य है कि श्याम बेनेगल की स्मिता पाटिल अभिनीत फिल्म ‘मंथन’ भी सहकारिता को प्रेरित करने वाली फिल्म थी, जिसका निर्माण व्यय भी दुग्ध सहकारिता संगठन के सदस्यों ने वहन किया था। इस तरह हर सदस्य का धन फिल्म निर्माण में लगा था। इन्हीं सदस्यों ने ‘मंथन’ फिल्म के टिकट खरीदकर फिल्म देखी थी। निर्माता ही दर्शक बना और घी खिचड़ी में ही काम आया था। यह एक अभिनव प्रयोग रहा।

हर उद्योग और कारखाने के कर्मचारी के वेतन से थोड़ी सी रकम काटकर, कारखाने के परिसर में ही एक अस्पताल बनाया जा सकता है। कारखानों और कपड़े की मिलों में अस्पताल बनाए गए हैं परंतु लुंज पड़ी व्यवस्था ने इन्हें मखौल मात्र बना दिया है।

तमाशा क्रिकेट के ऑस्ट्रेलिया से आए खिलाड़ियों को वापस बुलाने का विचार किया गया परंतु हवाई सेवाएं निरस्त हैं। तमाशा क्रिकेट के पहले इंग्लैंड की टीम ने लंबा दौरा किया था। यह सब निरस्त किए जा सकते थे। कुंभ में नदी में स्नान भी रोका जा सकता था। इस तरह के निर्णय लेने से महामारी से जाने वाले प्राण बचाए जा सकते थे। तमाम, मेले-तमाशे और चुनाव स्थगित किए जा सकते थे। महामारी की नई लहरें सामने आ रही हैं। कोई नहीं जानता कि महामारी के तरकस में अभी कितने तीर बाकी हैं?

वैश्विक आर्थिक मंदी ने दरवाजे पर दस्तक दे दी है। इस हकीकत को जानकर अनदेखा किया जा रहा है। महाराजा के लिए नया महल बनाया जा रहा है। इसी बहाने कुछ बेरोजगारी कम होगी। मजदूरों को काम मिलेगा। सीमेंट फैक्ट्रियांं ताले बंदी से बच जाएंगी। मीन-मेख निकालने वाले नहीं जानते कि जहांपनाह का हर कदम सही है। क्या नए महल में एक तलघर भी बनेगा? क्या उस तलघर में छुपाए कंकाल कभी इतिहास की इजलास में संविधान की कसम खाकर गवाही देंगे?

आदित्य की पत्नी रानी मुखर्जी परिवार के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करते हुए कभी-कभी अभिनय भी करती हैं। रानी मुखर्जी अभिनीत ‘मर्दानी’ सफल रही। कुछ दिनों बाद वे एक और फिल्म करने जा रही हैं। एक तरह से उनका अभिनय का कार्य हिचकी लेते हुए चलता है। आदित्य चोपड़ा प्राय: अपने दफ्तर के बाहर कुर्सी लगाकर बैठते हैं। इस तरह वे मालिक भी हैं और चोबदार भी। उनकी रियासत में किसी तरह की सियासत नहीं चलती।

इस समय यह गौरतलब है कि जया बच्चन बंगाल में तीसरी बार ममता बनर्जी के शपथ समारोह में भाग लेने के बाद मुंबई वापस आएंगी। यह भी संभव है कि वे प्रचार के आखिरी दौर के बाद ही मुंबई आ गई होंगी या शपथ समारोह में भाग लेने जा सकती हैं। बंगाल में प्रचार के बाद जया बच्चन की बहू ऐश्वर्या राय बच्चन ने उनकी आरती उतारी होगी। ‘हजार चौरासी की मां’ की आरती उतारी भी जानी चाहिए। क्या उस विराट परिसर में कहीं कोई कोप भवन में बैठा होगा?

यह सब अनुमान मात्र है। क्या पता यह भी सोचा-समझा कदम हो कि हर घटक में उनका कोई अपना मौजूद है? रवींद्र जैन ने मुखड़ा लिखा था जिसका इस्तेमाल किसी फिल्म में नहीं हुआ, ‘तुझको यह निर्मूल डर भय कैसा, जाहिर हो भीतर तू है जैसा।’ यह रचना कबीर की शैली की है।

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