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नवनीत गुर्जर का कॉलम:असह्य पीड़ा भोग चुकी इस दुनिया रूपी दाई अरज कर रही है कि रात कभी भी बांझ न हो

2 महीने पहले
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नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर - Dainik Bhaskar
नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर

जीवन की देखी, सुनी और बीती घटनाएं, कब और किस तरह मन-मस्तिष्क में समा जाती हैं, चेतन तौर पर भी और घोर अचेतन की स्थिति में भी, यह किसी हिसाब की पकड़ में नहीं आती। कोविड का एक और डरावना दौर धीरे-धीरे जाता हुआ प्रतीत हो रहा है। कहते हैं हर रात की सुबह ज़रूर होती है। लग रहा है- पूरब ने एक पालना बिछाया है। सुना है सूरज रात की कोख में है। असह्य पीड़ा भोग चुकी इस दुनिया रूपी दाई अरज कर रही है कि रात कभी भी बांझ न हो।

सब जानते हैं कोरोना का दूसरा दौर हमें कितना भीतर तक हिला गया है। हम यानी वो आम भारतीय जिन्होंने बरसों-बरस सूरज जलाए। बरसों चांद को चमकाया। आकाश तक जाकर चांदी रंग के तारे मांग लाए। लेकिन इस दौर में किसी ने हमारे मन में दीया नहीं जलाया (ख़ासकर सरकारों ने)।

घोर कालख प्राणों से लिपटी रही, जैसे बरसों से बाती रोशनी से बिछड़ी रही। यह वक्त हम कभी भूल नहीं सकते। भूलना भी नहीं चाहिए वरना फिर कोई नया किन्तु इससे भी भयानक दौर आ जाएगा। …और फिर टूटने लगेंगे तारे। फिर बुझने लगेंगे सूरज। फिर उड़ने लगेंगी काली चीलें।

खैर, ये सब कल्पनाएं हैं। लेकिन सच यह है कि कल्पना के शिखर पर पैर रखकर कोई बहुत देर खड़ा नहीं रह सकता। पैरों पर खड़ा होने के लिए ज़मीन का टुकड़ा चाहिए। इसलिए हक़ीक़त से मुंह चुराना इस दौर में सबसे ख़तरनाक है। बाज़ार खुलते ही वही भीड़-भड़क्का, शादी- ब्याह, समारोह, पार्टियां हमें भूलनी होंगी। दोनों वैक्सीन लग जाने के बावजूद। क्योंकि हमें नहीं पता कि किसने वैक्सीन लगवाई और किसने नहीं।

मोटे तौर पर कहा जाए तो इस कोरोना काल के दो ही सबक़ हैं - देरी नहीं करना और दूरी बनाए रखना। हालांकि ज़्यादातर लोगों ने इसे अच्छी तरह समझ लिया है। गांव, मोहल्ले, शहर, कॉलोनियों और अपने घरों में जिन्होंने जानलेवा हादसे देखे हैं वे तो इन दोनों सबक़ को अच्छी तरह याद कर रहे हैं। अमल भी कर रहे हैं, लेकिन बाक़ी कुछ लोग जो समझना नहीं चाहते, वे भी अब समझ लें कि यह दौर किसी का सगा नहीं है। किसी का भी नहीं। जहां तक सरकारों का सवाल है, वे भी अब प्रयास कर रही हैं। हो सकता है लोगों की नाराज़गी के डर से, पर कारण जो भी हो, धीरे- धीरे चेतना आ रही है। ये बात और है कि दूसरे दौर में इन सरकारों के सिर पर रखा चेतना का घड़ा फूट गया था, सारी चेतना धूल- धूसरित हो गई थी। जैसे मुम्बई का समंदर हर रोज़ एक सूरज निगल जाता है, वैसे ही ये सरकारें दया, करुणा, ममत्व, यहां तक कि अपने कर्तव्यों को भी घोलकर पी गई थीं, लेकिन सब कुछ वापस आ रहा है। चेतना भी। करुणा भी। ममत्व भी और कर्तव्य भी।अच्छा है चेतना आनी ही चाहिए। अब भी नहीं आई, तो चुनाव आ जाएंगे।