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नवनीत गुर्जर का कॉलम:कोई रात ऐसी नहीं हो सकती जिसकी कोई सुबह न हो

9 दिन पहले
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नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर - Dainik Bhaskar
नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर

ये कुछ डरावने दिन हैं। कहने को बसंत आ गया है। ऋतुओं का राजा। लेकिन खेत और किसान परेशान हैं। बादल अंधेरों की तरह घिरते आ रहे हैं। उदासी यहां-वहां, बूंद-बूंद बरस रही है। पर बादल हैं कि खुलते नहीं। फसलों का यौवन उतार पर है। वे लहलहाते हुए कराह भी रही हैं।

सूखी फलियों और कहीं-कहीं कटी हुई फसलों पर बूंदें बरस रही हैं, तो लगता है किसानों के शरीरों में कोई सूइयां चुभा रहा हो! खेत में खड़े किसान को दूर कहीं बरसते पानी की गंध आ जाती है। यह गंध बहुत भीनी-सी, मीठी-सी और कई मायनों में अपनी-सी भी लगती है, लेकिन इस वक्त वह किसानों की छाती पर मूंग दलने जैसी लग रही है। मूंग इसलिए, क्योंकि गेहूं, चने के बाद ज़्यादातर क्षेत्रों में अब मूंग बोए जाने हैं।

जाहिर है किसानों के साथ हम सब के लिए बीता वर्ष, ज़िंदगी का सबसे उदास बरस था। ज़िंदगी के कैलेंडर से फटे हुए पृष्ठ की तरह। मन ने घर की दहलीज़ों के बाहर पांव तक नहीं रखा था क्योंकि आगे कोई रास्ता नहीं था। चांद-सूरज की सुंदरता, सवेरे की पहली किरणों का संगीत, गहरी रातों की खामोशी, पत्तों से छनती हुई मेह की बूंदें, घास पर फिसलती हुई ओस, यह सबकुछ हमारे लिए कड़वे हो गए थे। लेकिन हम उस उदासी से हटे। अनुभवों को समेटा। समेटना ही था क्योंकि अपने अनुभवों से इनकारी होना ऐसा है, जैसे अपनी ज़िंदगी के होंठों पर हमेशा के लिए कोई झूठ भर ले...। बहरहाल, किसान संकट में हैं। मौसम की वजह से। खेत में खड़े उसके चने उसका मुंह ताक रहे हैं। गेहूं आधे सूखे, आधे हरे हैं लेकिन चिंता की लकीरें उनके मुंह पर भी साफ़ देखी जा सकती हैं। अगली फसल कौन बोएगा? क्या बोएगा, इसका मलाल है। चाहे वह किसान खेत में हो, घर में हो या किसी बॉर्डर पर ठिठुर रहा हो! फिर भी किसान मज़े में है। वह खेतों में गीत गाता है। लोक गीत। भले ही उसे पता न हो पर इन दिनों उसके गीत कभी राग बसंत से, कभी राग बहार से तो कभी बसंत बहार से मेल खाते हैं। रागनियां छेड़ी जा रही हैं। तालें बज रही हैं। कभी तीन ताल, कभी रूपक। फिर भी ज़्यादातर लोकगीतों में ठेका चल रहा है। टप्पे से भी। ठप्पे से भी। गीतों के बीच कभी-कभी ठुमरी तो ऐसे निकलती है जैसे शब्दों से अर्थ निकल रहे हों। लेकिन इन बेमुरव्वत अर्थों का क्या? जिस तरह आज एक अर्थ निकला है, कल कोई नामुराद और अर्थ निकलेगा! पर बसंत इस जग पर सलामत रहे और बहार हर कोने में आती रहे, छाती रहे। किसानों की यही अरदास है। उनके लिए बाक़ी लोगों की भी यही प्रार्थना है। ख़ुशियों की फसल लहलहाएंगी। ख़ुशियों को आने से कोई नहीं रोक सकता। कोई नहीं हज़म कर सकता। वजह साफ़ है।

दिन कितने भी हवा हो जाएं और रातें भले ही काली चीलों की तरह उड़ती रहें, कोई रात ऐसी नहीं हो सकती जिसकी कोई सुबह न हो। जहां तक दिन का सवाल है, यह सच है कि दिन के ढलते ही हमारी उम्मीदें खर्च हो जाती हैं, लेकिन उसके चढ़ते ही उम्मीदों का आसमान बड़ा और चौड़ा हो जाता है।

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