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रीतिका खेड़ा का कॉलम:प्रवासी मजदूरों पर उच्चतम न्यायालय का आदेश निराशाजनक है, आदेश से मजदूरों को नहीं मिलेगी असल राहत

21 दिन पहले
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रीतिका खेड़ा, अर्थशास्त्री - Dainik Bhaskar
रीतिका खेड़ा, अर्थशास्त्री

कोविड की दूसरी लहर से जूझते लोगों की यादों से पिछले साल नौकरी और खाने के बिना फंसे प्रवासी कामगारों का दर्द धुंधला पड़ गया था। एक साल बाद, 29 जून को सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने उस दर्दनाक दौर की याद दिला दी। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की ‘अकर्मण्यता’ की निंदा की है और इसे ‘अक्षम्य’ बताया है। लेकिन मजदूरों को असल राहत देने के संदर्भ में अदालत का आदेश निराशाजनक है।

अदालत ने 7 निर्देश दिए: महामारी तक सामुदायिक रसोई जारी रहें, असंगठित कामगारों का राष्ट्रीय डेटाबेस (एनडीयूडब्ल्यू) बनाया जाए, राज्य प्रवासी मजदूरों के लिए योजना बनाएं और केंद्र ऐसी योजनाओं के लिए अनाज दे, ‘एक राष्ट्र, एक राशन’ लागू हो, ठेकेदारों का पंजीकरण हो, ताकि वे कामगारों के प्रति दायित्व पूरे करें।

अदालत ने केंद्र सरकार को यह निर्देश भी दिया कि वह राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) के तहत आने वाले लोगों की संख्या का पुनर्निर्धारण करे। एनएफएसए की धारा 9 में जनवितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत 50% शहरी और 75% ग्रामीण आबादी को शामिल करना जरूरी है। इसलिए एनएफएसए में 135 करोड़ की आबादी में से 80 करोड़ लोग आते हैं। आदेश की न्यूनतम व्याख्या के लिए जरूरी है कि ग्रामीण-शहरी कवरेज अनुपात 2021 की अनुमानित आबादी (जनगणना 2021 बाकी है) पर लागू किया जाए। इससे कुल 90 करोड़ लोगों की पहुंच इस तक हो जाएगी।

पिछले कुछ वर्षों में हुए शोध बताते हैं कि एनएफएसए के कवरेज के अनुपात अपर्याप्त हैं। इससे बड़ी संख्या में लोगों का बाहर रहना सार्वभौमिक पीडीएस की मांग का आधार रहा है (कम से कम ग्रामीण इलाकों और शहरी झुग्गी-झोपड़ियों में)। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के लिए जरूरी है कि केंद्र एनएफएसए का कवरेज अनुपात बढ़ाए और उन्हें 2021 की अनुमानित आबादी पर लागू करे।

फिर बात आती है ‘वन नेशन, वन राशन’ कार्ड की। सैद्धांतिक रूप से इसका अर्थ है कि जिसके पास राशन कार्ड है, वह देश में कहीं भी, किसी भी पीडीएस डीलर से राशन ले सकता है। योजना की सराहना के शोर में एक स्वाभाविक बिंदु दब गई कि यह पोर्टेबिलिटी सिर्फ उसी प्रवासी कामगार की ‘मदद’ करेगी, जिसके पास राशन कार्ड हो। पोर्टेबिलिटी आधार प्लेटफॉर्म और ई-पीओएस मशीनों के जरिए चलेगी।

लोकनीति सर्वे बताता है कि 28% लोगों को आधार के कारण ही राशन नहीं दिया गया। आधार लिंक न होना, सर्वर व नेटवर्क की समस्याएं, बायोमेट्रिक सत्यापन फेल होना, आधार ऐसी खामियों से भरा है। इसके अलावा भी कई समस्याएं हैं। मसलन, तमिलनाडु में पीडीएस में मुफ्त चावल के साथ दाल और तेल दिया जाता है। क्या तमिलनाडु में किसी बिहारी मजदूर को ये चीजें दी जाएंगी? ऐसी स्थिति में सामाजिक सहायता की इस प्रणाली के पटरी से उतरने का जोखिम है।

पीडीएस और सामुदायिक रसोइयों के विस्तार पर कोर्ट के आदेश व्यवहार्य हैं। कुछ राज्य सरकारों द्वारा दिए गए साप्ताहिक सूखा राशन किट (जिसमें अनाज, तेल, दाल, मसाले आदि शामिल हैं), जिन्हें शहरी कामगारों ने पसंद किया, ये कोर्ट के निर्देशों में शामिल नहीं है। अदालत ने आजीविका वापस पाने पर कुछ नहीं कहा। उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (नरेगा) के शहरी अवतार के जरिए कमाई के अवसरों के सृजन के प्रस्ताव पर सरकार की प्रतिक्रिया मांग सकते थे। अदालत ने एनडीयूडब्ल्यू को पूरा करने पर जोर दिया, जिससे लगता है कि वह कामगारों के पंजीकरण (मौजूदा लेकिन कमजोर तरीके से लागू अधिकार) और केंद्रीकृत डेटाबेस बनाने के बीच भ्रमित है। चूंकि हमारे नीति निर्माण पर तकनीक विशेषज्ञों का अधिकार हो गया है और हमारी कल्पना डेटाबेसिंग की गुलाम बन गई है। सरकार ने एनडीयूडब्ल्यू पर 45 करोड़ रुपए खर्च किए हैं, जबकि मौजूदा श्रम कानूनों के तहत ही मजदूरों को बमुश्किल सुरक्षा मिल पा रही है।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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