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विराग गुप्ता का कॉलम:पुलिस और अदालतों को ‘सब धान बाईस पसेरी’ वाली मानसिकता के न्याय से बचना चाहिए

एक महीने पहले
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विराग गुप्ता, सुप्रीम कोर्ट के वकील - Dainik Bhaskar
विराग गुप्ता, सुप्रीम कोर्ट के वकील

महाराष्ट्र के जलगांव के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बोबडे ने आरोपी युवक से पूछा कि क्या वह पीड़िता से शादी करेगा? जज ने कहा कि ऐसा नहीं होने पर आरोपी को सरकारी नौकरी गंवाने के साथ जेल भी जाना पड़ सकता है। निचली अदालत और हाईकोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट में आए मामले में बचाव पक्ष ने आरोपी युवक के शादीशुदा होने का विवरण याचिका में दिया होता तो शायद ऐसा सवाल मीडिया की सुर्खियां नहीं बनता।

सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी युवक की गिरफ्तारी पर चार हफ्ते की रोक लगाई है। लेकिन जज के सवालों से मीडिया में सरगर्मी बढ़ने के साथ जनता के जेहन में भी कई सवाल खड़े हो गए हैं। निर्भया मामले के बाद जस्टिस जेएस वर्मा की रिपोर्ट पर अमल करते हुए महिलाओं के अधिकांश मामलों में सख्त कानूनी व्यवस्था बन गई। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार में हुई हालिया कई घटनाओं पर गौर किया जाए तो यह लगता है कि सिर्फ सख्त कानूनों से ही अपराधों को रोकना मुश्किल है।

सख्त कानूनों का एक खराब पहलू यह भी है कि इसकी आड़ में कई बार बेबुनियाद और गलत मामले भी दर्ज हो जाते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के 2019 के आंकड़ों के अनुसार भारत में दुष्कर्म के औसतन 88 मामले प्रतिदिन दर्ज होते हैं। लेकिन ऐसे मुकदमों में सिर्फ 27.8% मामलों में ही आरोपियों को सजा होती है। अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करने की मांग के साथ पूरे सिस्टम में यह बड़ा सवाल भी खड़ा हो रहा है कि निर्दोष लोगों के खिलाफ यदि केस दर्ज हो जाए तो फिर लचर अदालती सिस्टम में कमजोर व्यक्ति को कैसे राहत मिले?

तमिलनाडु में DGP रैंक के अधिकारी के खिलाफ महिला IPS अधिकारी की शिकायत पर कार्रवाई नहीं होने पर मद्रास हाईकोर्ट को दखल देना पड़ा। अधिकांश बड़े मामलों पर राजनेताओं के इशारे पर पुलिस चुप्पी या कार्रवाई का फैसला करती है। राजनेताओं को ऐसे मामलों में ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री से सीख लेनी चाहिए। पीड़ित महिला ब्रिटनी की शिकायत पर दो साल तक कार्रवाई नहीं होने पर उन्होंने अफसोस जाहिर करते हुए पूरी जांच कराने का वादा किया।

प्रधानमंत्री मॉरिसन का दिलचस्प वक्तव्य अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियां बना है। मॉरिसन की पत्नी ने उनसे कहा कि यदि प्रधानमंत्री की बेटियों के साथ ऐसा होता, तो वे क्या करते? प्रधानमंत्री की माफी के बावजूद ऑस्ट्रेलिया की जनता में गुस्सा है। लोगों का कहना है कि न्याय दिलाने के लिए पिता के दृष्टिकोण के साथ नेता के सर्वोच्च पद के कर्तव्य निर्वहन की ज्यादा जरूरत है।

सितंबर 2020 में मध्य प्रदेश के एक जज के खिलाफ यौन प्रताड़ना मामले की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस बोबडे ने कहा था कि प्रमोशन को रोकने के लिए जजों के खिलाफ शिकायत का प्रचलन बढ़ गया है। लेकिन पिछले हफ्ते जज के मामले में चीफ जस्टिस बोबडे ने कोई राहत देने से इनकार कर दिया। दो साल पहले सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस गोगोई के खिलाफ भी यौन प्रताड़ना के आरोप लगे थे।

व्यक्तिगत शिकायत के उस मामले को न्यायिक व्यवस्था को अस्थिर बनाने वाला संगीन मामला बताते हुए, पूर्व जज पटनायक को उसकी जांच सौंप दी गई। जबकि ललिता कुमारी मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार ऐसे मामलों में पीड़ित महिला की शिकायत पर पुलिस द्वारा FIR दर्ज करना जरूरी है। एक ही तरह के अपराधों में अलग तरह के अदालती फैसलों से जाहिर है कि पुलिस और जज अपने विशेषाधिकारों का इस्तेमाल कानून के दमन या व्यापक लोक हित में कर सकते हैं।

स्मार्टफोन के युग में बच्चे, बूढ़े और जवान सब एक समान हैं। लेकिन बालिग और नाबालिग की उम्र पर भारत के कानून में कई सारे झोल हैं। प्रधानमंत्री मोदी के अनुसार लड़के और लड़की दोनों के लिए विवाह की न्यूनतम उम्र 21 साल करने पर विचार हो रहा है। फिलहाल सोशल मीडिया ज्वाइन करने के लिए 13 साल तो बाल मजदूरी के लिए न्यूनतम उम्र 14 साल की है। 18 साल से कम उम्र के लड़के या लड़की के साथ सहमति से भी बनाए गए शारीरिक संबंध अपराध की श्रेणी में आते हैं।

लड़कियों की शादी की उम्र 18 साल तो लड़कों की शादी की उम्र 21 साल है। जबकि देश के कई राज्यों में शराब पीने के लिए न्यूनतम उम्र 25 साल है। जलगांव मामले में नाबालिग लड़की से संबंध बनाने के लिए शादी के विकल्प की बजाए, आरोपी को पॉक्सो और आईपीसी कानून के तहत दंडित किया जाना चाहिए।

पर इसी कानूनी व्यवस्था में मानवीय रुख अपनाते हुए बिहार के नालंदा में किशोर न्यायालय के जज ने नाबालिग की शादी के साथ 4 महीने के बच्चे को भी कानूनी वैधता प्रदान कर दी। इस फैसले से सबक लेते हुए पुलिस और अदालतों को ‘सब धान बाईस पसेरी’ मानसिकता के न्याय से बचना चाहिए। इसके लिए पुलिस की मुस्तैदी के साथ जजों के मानवीय दृष्टिकोण की पूरे समाज और देश को जरूरत है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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