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रुक्मिणी बनर्जी का कॉलम:महामारी से बढ़ी परेशानी, किस उम्र में मिले कैसी शिक्षा, बच्चों के विकास की बुनियाद पर ध्यान दें

एक महीने पहले
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रुक्मिणी बनर्जी, ‘प्रथम’ एजुकेशन फाउंडेशन से संबद्ध - Dainik Bhaskar
रुक्मिणी बनर्जी, ‘प्रथम’ एजुकेशन फाउंडेशन से संबद्ध

अन्य देशों की तरह, हमारे देश में भी शिक्षा व्यवस्था का गठन कई पूर्वधारणाओं के आधार पर हुआ है। निर्धारित आयु के बच्चे निर्धारित कक्षा में नामांकित होते हैं। उन्हें उसी कक्षा के पाठ्यक्रम के आधार पर पाठ्यपुस्तक से पढ़ाता जाता है। एक साल बाद बच्चे अगली कक्षा में चले जाते हैं। निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा विधेयक (आरटीई एक्ट) के तहत ये सिलसिला छह साल से शुरू होता है।

इसके अनुसार, बच्चा छह साल में पहली, 10 साल में पांचवी और 14 साल तक आठवीं कक्षा में पहुंचते हैं। 14 साल तक प्राथमिक व उच्च प्राथमिक शिक्षा का चरण पूरा हो जाता है। महामारी सेे पहले भी, क्या ये अवधारणा सही थी? अगर ठीक थी तो किसके लिए? 2020 या पहले की ज़मीनी स्थिति को देखा जाए तो कई धारणाओं को बदलने की जरूरत दिख रही थी। जैसे, आरटीई एक्ट के बावजूद, काफी संख्या में बच्चे छह साल के होने से पहले ही पहली कक्षा में पहुंच रहे थे।

2018 सर्वेक्षण के मुताबिक गांवों में सरकारी विद्यालय में पहली कक्षा के 28.5 प्रतिशत बच्चे छह साल से कम उम्र के थे और निजी विद्यालयों में आंकड़ा करीब 20 प्रतिशत के आसपास था। वहीं, कक्षा 1 में 8 साल या बड़े बच्चों की संख्या सरकारी स्कूल में 9% थी पर प्राइवेट स्कूल में अनुपात 22.5 प्रतिशत के करीब था। आंकड़ों का विश्लेषण करने से साफ दिखता है कि जो बच्चे बड़े हैं उनका लिखने-पढ़ने का स्तर बाकी बच्चों से बेहतर है। प्राइवेट विद्यालयों में अक्सर बच्चों का दाखिला पहली में नहीं बल्कि एलकेजी-यूकेजी में होता है।

पहली कक्षा में आते-आते वे पढ़ाई के स्कूली तौर तरीकों से वाकिफ और उम्र से भी कई साल बड़े हो जाते हैं। इसलिए वे पहली के पाठ्यक्रम से जूझ पाते हैं। कम उम्र में औपचारिक शिक्षा शुरू करना बच्चों के हित में नहीं है। जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं, उनका संज्ञानात्मक विकास होता है। उपलब्ध पहली कक्षा का पाठ्यक्रम छह साल के बच्चे की क्षमता की संकल्पना सामने रखकर बनाया गया होगा।

अगर बच्चे छोटे हों, तो इस पाठ्यक्रम का फायदा उन्हें नहीं होता। इस हकीकत को स्वीकारते हुए नई शिक्षा नीति 2020 में कहा गया है कि 3-8 साल तक के चरण को बुनियादी अवस्था या फाउंडेशन स्टेज माना जाए। तीन साल पूर्व प्राथमिक व 2 साल प्राथमिक शिक्षा सभी बच्चों को उपलब्ध हो।

अब कोरोना के दौर में परेशानी बढ़ी हैं। अगस्त का महीना खत्म होने वाला है। साधारण वर्ष में अब तक कुछ महीनों की पढ़ाई हो गई होती। पर डेढ़ साल स्कूल बंद होने से परिवार में और स्कूल में लोग उलझन में हैं। आज जिस बच्चे का नाम कक्षा दो में लिखा है, वो कभी स्कूल गया ही नहीं है।

जब स्कूल खुलेंगे, उसे किस पाठ्यक्रम, किस पाठ्यपुस्तक से पढ़ाएंगे? क्या पाठ्यपुस्तक इस्तेमाल करना उचित भी होगा? इसी तरह पहली के बच्चों को तो आंगनवाड़ी या किसी भी प्रकार की पूर्व प्राथमिक शिक्षा प्राप्त नहीं हुई। उनकी औपचारिक शिक्षा का आरंभ कहां से और कैसे किया जाए?

आज की असलियत को देखते हुए अब हमें कई महत्वपूर्ण निर्णय लेने होंगे। पहला, पूर्व प्राथमिक शिक्षा में सर्वांगीण विकास पर केंद्रित गतिविधियों का नियोजन जाए। बुनियाद सही बनेगी तभी इमारत मजबूत बनेेगी। इस साल हम पहली व दूसरी के मौजूदा पाठ्यक्रम को फिलहाल अलग रख दें और पूर्व प्राथमिक शिक्षा के लक्ष्य और सीखने के तरीके अपनाएं।

‘निपुण भारत’ के निर्देश घोषित कर दिए गए हैं। पर इस साल हर राज्य में, स्थिति समझकर, शिक्षा व्यवस्था में पूर्व तयारी देखते हुए उपयुक्त योजना बनाएं। दूसरी, महामारी में हर घर में परिवार के सदस्यों ने बच्चों के पढ़ाई में मदद की है। अभिभावकों को साथ लेकर चलना ज़रूरी है, तभी वे घर में बच्चों को सहयोग दे सकेंगे। तीसरी बात, कोरोना अभी गया नहीं है।

स्कूल खुल भी गए तो कल अचानक बंद होने की आशंका है। इसलिए घर-विद्यालय के संबंध और निकट बनाना और एक-दूसरे पर विश्वास बढ़ाना अनिवार्य है। पहली-दूसरी के बच्चों के लिए कक्षावार चिंता न करके उनके विकास की बुनियाद पर ध्यान दें, घर में और पाठशाला में भी। साथ-साथ चलने से ये सफर सफल होगा।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)