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मनीष अग्रवाल का कॉलम:‘ग्रीन टी’ समस्याओं के कारण नजरअंदाज हो रहे हैं संधारणीयता के वास्तविक लक्ष्य, सौर और पवन ऊर्जा से कहीं ज्यादा व्यापक है सस्टेनिबिलिटी

2 महीने पहले
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मनीष अग्रवाल, इंफ्रास्ट्रक्चर विशेषज्ञ - Dainik Bhaskar
मनीष अग्रवाल, इंफ्रास्ट्रक्चर विशेषज्ञ

इस धरती की बेहतरी के लिए, हमारे बेहतर कल के लिए सस्टेनेबिलिटी यानी संधारणीयता ऐसा पहलू है, जिस पर जितनी चर्चा होनी चाहिए, होती नहीं है। संधारणीयता यानी हमारे पास उपलब्ध सीमित प्राकृतिक संसाधनों का इस तरह इस्तेमाल कि भविष्य में उपयोग के लिए ये खत्म न हों। अक्सर सस्टेनिबिलिटी को ‘ग्रीन’ होने यानी सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा समेत विभिन्न रिनुएबल एनर्जी स्रोतों से जोड़ा जाता है। लेकिन यह इससे कहीं ज्यादा व्यापक है।

अब इसमें ईएसजी यानी पर्यावरण, समाज (कार्यस्थल पर समानता, विविधता जैसे कारक) और सुशासन (भ्रष्टाचार रोकना और नैतिक व्यवहार जैसे कारक) का पहलू भी जुड़ गया है। कॉर्पोरेट इसमें सक्रिय हुए हैं। इसके बढ़ते महत्व का अंदाजा इसी ले लगा सकते हंै कि मॉर्निंगस्टार के मुताबिक केवल यूरोप में ही 500 से ज्यादा ईएसजी फंड शुरू हुए।

इस पर अब बोर्ड मीटिंग से लेकर निवेशकों के साथ तक चर्चा हो रही है। इधर भारत सरकार ने भी कॉर्पोरेट के लिए लाभ का 2% कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) पर खर्च करना अनिवार्य कर दिया है। दुनियाभर के कॉर्पोरेट ‘नेट जीरो’ (शून्य कार्बन उत्सर्जन) के लक्ष्य की घोषणा कर रहे हैं। जैसे भारतीय रेलवे ने 2030 तक नेट जीरो कार्बन उत्सर्जक बनने का लक्ष्य रखा है। बांग्लादेश ने कोयला आधारित बिजली संयंत्र बनाना रद्द कर दिया है।

इन सभी पहलों के पीछे मंशा अच्छी है। ये इस अहसास से प्रेरित हैं कि वैश्विक अर्थव्यवस्था जुड़ी हुई है और शेयरधारक की दौलत अधिकतम करने के लिए हितधारक का लाभ भी अधिकतम करना होगा। लेकिन मेरी चिंता यह है कि इसमें कई चरणों को समझा नहीं गया। इससे ‘ग्रीन टी’ समस्याएं हो सकती हैं। यानी जिस तरह सिर्फ ग्रीन टी पीने से अस्वस्थ व्यक्ति स्वस्थ नहीं हो सकता, उसी तरह सिर्फ प्रदूषण आदि पर्यावरण संबंधी समस्याओं पर काम करने से दुनिया की समस्याएं नहीं सुलझेंगी।

ईएसजी पर चर्चा अक्सर रिन्यूएबल एनर्जी को अपनाने और नेट जीरो पर जाने तक सीमित रह जाती है। इसमें शहरी वायु प्रदूषण, हमारी नदियों में पानी की गुणवत्ता जैसे मुद्दे नजरअंदाज हो जाते हैं, जो विकासशील देशों में खतरा बने हुए हैं। अक्सर मान लिया जाता है कि ‘संधारणीयता’ के लिए उठाए जा रहे कदम सुव्यवस्थित हैं। वास्तव में इसमें अंतर्संबंध और ट्रेडऑफ से जुड़ी जटिल समस्याएं हैं। उदाहरण के लिए भारत में खनन, मछली पकड़ने और कृषि में कार्यरत समुदायों पर विभिन्न फैसलों का अलग-अलग प्रभाव पड़ेगा।

आने वाले समय में मैं इन मुद्दों पर विस्तृत चर्चा करूंगा। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र के सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स (एसडीजी) को आधार बनाकर भारत की प्राथमिकताओं पर ध्यान देंगे। इसमें गरीबी, भूख, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, काम की परिस्थितियां, पर्यावरण आदि व्यापक विषय शामिल हैं।

इसमें भारत के लिए निहितार्थों, विराधाभासों और ट्रेड-ऑफ की (उदाहरण के लिए स्वच्छ ऊर्जा को सस्ता बनाने में), वास्तविक असर वाली और सिर्फ सुर्खियों में आने वाली पहलें (जैसे पानी बचाने के लिए आईपीएल रद्द करना), विभिन्न लक्ष्यों पर असर डालने वाले सेक्टरों की (जैसे कृषि) और ऐसे संस्थागत प्रोत्साहनों की चर्चा होगी जिन्हें वास्तविक असर के लिए संबोधित करना जरूरी है (जैसे शहरों में साफ हवा, नदियों में साफ पानी)। इस पर भी चर्चा होगी कि प्राइवेट बिजनेस एसडीजी के मामले में भारत की प्रगति को कितना प्रभावित कर सकते हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)