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डॉ. वेदप्रताप वैदिक का कॉलम:सऊदी अरब के हालिया फैसले बताते हैं कि इस्लामी राज में कई आयाम जुड़ रहे हैं

एक महीने पहले
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डॉ. वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष - Dainik Bhaskar
डॉ. वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष

पिछले 1400 साल के इतिहास में इस्लाम ने कई उतार-चढ़ाव देखे, उसमें कई परस्पर विरोधी फ़िरके उभरे और वह सऊदी अरब के मक्का-मदीना से उठकर दुनिया के कई महाद्वीपों में फैल गया। अपने अनुयायियों के हिसाब से वह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मजहब है। उसे दुनिया का सबसे ज्यादा कट्टर मजहब माना जाता है, लेकिन इधर पिछले कुछ वर्षों में उसमें इतने बदलाव आ रहे हैं कि सौ-पचास साल पहले इसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था।

मजहब के नाम पर दुनिया के इतिहास में कोई पहला राष्ट्र बना तो वह पाकिस्तान है। लेकिन 1971 में बांग्लादेश के निर्माण ने यह सिद्ध कर दिया कि मजहब के नाम पर किसी राष्ट्र को टिकाए रखना संभव नहीं है। जिन राष्ट्रों को हम आज ईसाई या मुस्लिम या यहूदी या हिंदू राष्ट्र के नाम से जानते हैं, वे अपने मजहबों के आधार पर नहीं बने हैं।

उन्हें हम वैसा इसलिए कहते हैं क्योंकि उन मजहबों को मानने वाले वहां बहुसंख्या में रहते हैं। दुनिया के लगभग 50 मुस्लिम राष्ट्रों में सबसे महत्वपूर्ण राष्ट्र सऊदी अरब है। सिर्फ सऊदी अरब में ही नहीं, हम अफगानिस्तान, पाकिस्तान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे मुस्लिम राष्ट्रों में भी आजकल देश और काल के मुताबिक मौलिक परिवर्तन की लहरें देख रहे हैं।

सऊदी अरब के शासक शहजादा मोहम्मद बिन सलमान ने वहां महिलाओं पर लगे कई बंधनों को हटवा दिया है। उन्होंने मस्जिदों से होने वाली अजान के शोर को भी घटवा दिया है। महिलाओं को कार चलाने की भी छूट दे दी है। और अब तो वहां एक ऐसी जबर्दस्त घोषणा कर दी गई है कि विश्वास ही नहीं होता कि कोई इस्लामी देश ऐसा कदम भी उठा सकता है।

सऊदी अरब के इस्लामी मामलों के मंत्री डाॅ. अब्दुल लतीफ-अल-शेख ने हर शुक्रवार को मस्जिदों में होने वाले जलसों में तबलीगी जमात और दावा की तकरीरों पर रोक लगा दी है। सऊदी सरकार का मानना है कि इन दोनों संगठनों से जन्मा ‘अल अहबाब’ नामक गिरोह और कुछ नहीं, बस एक आतंकवादी संगठन है।

वह आतंकवाद का द्वार है। तबलीगी जमात इस वक्त दुनिया के 150 मुल्कों में सक्रिय है। इस जमाते-तबलीग को अब से लगभग सौ साल पहले भारत में ही शुरू किया गया था। उन दिनों आर्यसमाजी नेता स्वामी श्रद्धानंद के नेतृत्व में मुसलमानों के धर्म-परिवर्तन (घर वापसी) का अभियान चल पड़ा था।

उसी की टक्कर में मोहम्मद इलियास कांधलवी ने यह तबलीगी जमात खड़ी की थी। यह भारत से फैलती-फैलती अब सारे विश्व में पहुंच गई है। इसे फैलाने में सऊदी अरब के प्रोत्साहन और पैसे की बड़ी भूमिका रही है। लेकिन अब सऊदी अरब के वहाबी मौलाना मानने लगे हैं कि जमाती लोग दरगाहपूजक (बुतपरस्त) और धर्मद्रोही (काफिर) हैं। भारत के ज्यादातर मुसलमान इस्लाम कुबूल करने के बावजूद अपनी पुरानी हिंदू परंपराओं को जाने-अनजाने निभाते रहते हैं। वे अपने जातीय संस्कारों से भी मुक्त नहीं हो पाते हैं।

जमात के भारतीय नेताओं का कहना है कि उन ‘गुमराह’ मुसलमानों को सच्चा मुसलमान बनाना ही इस तबलीग का मुख्य उद्देश्य है। इसी आधार पर देवबंद के दारुल उलूम ने सऊदी अरब की उक्त घोषणा को बिल्कुल अनुचित बताया है और यहां तक कहा है कि सऊदी अरब ने यह कदम पश्चिम के मलाईदार ईसाई राष्ट्रों को खुश करने के लिए ही उठाया है। तबलीगी जमात पर सऊदी अरब में लगे प्रतिबंधों का अनुकरण अन्य कई मुस्लिम देश भी कर सकते हैं लेकिन पाकिस्तान, बांग्लादेश, तुर्की, मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे राष्ट्र उन्हें मान लेंगे, इसमें मुझे संदेह है।

पाकिस्तान में पिछले दिनों श्रीलंका के एक बौद्ध नागरिक की इसलिए हत्या कर दी गई थी कि उसने अपनी कंपनी की दीवार पुतवाने के लिए उस पर लगा एक पोस्टर हटवा दिया था। उस पोस्टर पर कुरान की कुछ आयतें लिखी थीं। अल्लाह या पैगंबर मोहम्मद या कुरान-शरीफ के अपमान का इल्जाम लगाकर सैकड़ों लोगों को सजा दी जाती है या उनकी हत्या कर दी जाती है। पंजाब (पाकिस्तान) के राज्यपाल और भुट्टो के मित्र सलमान तासीर की भी इसीलिए हत्या कर दी गई थी कि उन्होंने आसिया बीबी नामक एक ईसाई महिला के प्रति सहानुभूति दिखा दी थी।

अब पाकिस्तान में भी यह मांग उठ रही है कि ‘सब्ब अल रसूल’ या ‘तौहीन-ए-अल्लाह’ या ईश-निंदा के कानून में सुधार किया जाए। इस तरह के कानून की इजाजत खुद कुरान-शरीफ नहीं देती। पैगंबर मोहम्मद तो उनका अपमान करने वालों को भी न केवल बर्दाश्त करते थे बल्कि उनके प्रति दरियादिली भी दिखा देते थे।

अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद सबको यह डर था कि इस्लामी राज के नाम पर वे बहुत जुल्म ढाएंगे। लेकिन कुछ शुरुआती घटनाओं के बाद हाल-फिलहाल ऐसी खबरें सामने नहीं आ रहीं। तालिबानी सरकार के प्रवक्ताओं के मिजाज़ भी जरा नर्म समझ आते हैं। भले ही यह नरमी दुनिया को दिखाने के लिए हो या आर्थिक जरूरतों का दबाव, लेकिन तालिबान कुछ बदला-बदला नजर आ रहा है।

तालिबान शासन अपने आप को इस्लामी कहता है लेकिन कितने इस्लामी राष्ट्र उसकी मदद के लिए आगे आ रहे हैं? भारत ने उसके लोगों के लिए 50 हजार टन अनाज और डेढ़ टन दवाइयां भिजवाई हैं। यूरोप के ईसाई राष्ट्र भी उसकी मदद खुलकर कर रहे हैं। इस्लामी राज में ये नए आयाम जुड़ रहे हैं।

जहां तक इजराइल का सवाल है, सारे इस्लामी देश उसे अपना दुश्मन नम्बर एक समझते थे लेकिन अब बहरीन, सूडान, मोरक्को और संयुक्त अरब अमीरात ने उसके साथ कूटनीतिक संबंध भी स्थापित कर लिए हैं। उसके प्रति मिस्र और सऊदी अरब का रवैया भी बदला है।

ऐसा लगता है कि धीरे-धीरे अरबों और यहूदियों के संबंध बाइबिल के ‘दोदानिम’ यानी भाई-भाई जैसे होने लगे हैं। इस वक्त इजराइल के प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट यूएई की यात्रा कर रहे हैं। तेल अवीव और दुबई के बीच व्यापार और यात्राओं में भी काफी बढ़ोतरी हो गई है। ये दोनों देश ईरान के परमाणु-कार्यक्रम से चिंतित हैं।

इन्हें अमेरिका का पूरा समर्थन मिल रहा है। अमेरिका ने इन दोनों देशों के साथ भारत को भी जोड़कर पश्चिम एशिया में प्रशांत-क्षेत्र की तरह एक नया चौगुटा खड़ा कर लिया है। फलस्तीनी लोगों ने इस पर चिंता व्यक्त की है लेकिन इस्लामी देशों में आ रहे इन बदलावों को सारी दुनिया बहुत ही आश्चर्य, आनंद और जिज्ञासापूर्वक देख रही है।

सऊदी में हो रहा बदलाव
दुनिया के लगभग 50 मुस्लिम राष्ट्रों में सबसे महत्वपूर्ण सऊदी अरब है। सिर्फ सऊदी में ही नहीं, हम अफगानिस्तान, पाकिस्तान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे मुस्लिम राष्ट्रों में भी आजकल देश और काल के मुताबिक मौलिक परिवर्तन की लहरें देख रहे हैं। सऊदी अरब के शासक शहजादा मोहम्मद बिन सलमान ने वहां महिलाओं पर लगे कई बंधनों को हटवा दिया है। उन्होंने मस्जिदों से होने वाली अजान के शोर को भी घटवा दिया है। अब सऊदी अरब के इस्लामी मामलों के मंत्री डाॅ. अब्दुल लतीफ-अल-शेख का एक फैसला चर्चित हो रहा है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
● dr.vaidik@gmail.com

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