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एन. रघुरामन का कॉलम:मौजूदा जिंदगी को सुखद बनाने के लिए गौरवशाली इतिहास और डिजिटल संपत्ति की रक्षा के लिए भविष्य के ज्ञान का सही अनुपात जरूरी है

9 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

अ गर आप डिजिटली स्मार्ट नहीं हैं, तो कभी भी अपनी डिजिटल संपत्ति गंवा सकते हैं और इससे आपको कभी भरपाई न होने वाला भारी नुकसान भी हो सकता है, यह इस पर निर्भर करता है कि डिजिटल संपत्ति के रूप में आपके पास क्या है। बिजली का काम करने वाले पुणे के 26 वर्षीय अंशू प्रताप सिंह का उदाहरण लीजिए। उसने खाड़ी देश में तीन साल बिताए और उसकी मासिक कमाई की क्षमता 40 हजार रुपए थी।

लॉकडाउन नेे उसके सफल कॅरिअर को पटरी से उतार दिया। इस दौरान उसने बड़ी मेहनत से उन सभी नए नियोक्ताओं के नंबर सेव किए थे, जो उसे खाड़ी देशों में नौकरी दिलाने में मदद कर सकते थे। यह एक जटिल प्रक्रिया थी, जिसमें कुछ समय लगा। पिछले चंद नियोक्ताओं के जरिए अंशू कुछ लोगों सेे संपर्क कर पाया, जिन्होंने हाल ही में उसे वर्क वीजा दिलाया।

पिछले रविवार को भाग्य ने निष्ठुर खेल खेला। जब वह शेयरिंग ऑटो में सफर कर रहा था, तब साथ बैठे दो यात्रियों-ड्राइवर ने उसकी आंखों में मिर्ची पाउडर झोंककर उसे लूट लिया। उन लोगों ने न सिर्फ उसका पर्स व सामान चुराया बल्कि मोबाइल भी ले गए। पुलिस ने दो लोगों को गिरफ्तार किया है, पर मेरे यह आर्टिकल लिखने तक वह मोबाइल चुराने वाले को नहीं पकड़ पाए थे।

फोन के साथ सिर्फ उसके पूरे संपर्क ही नहीं बल्कि बड़े जतन से मोबाइल में सेव किए गए उसके भविष्य की संभावनाओं से जुड़े सारे दस्तावेज भी चले गए थे। चूंकि वह तकनीक का जानकार नहीं है, उसे नहीं मालूम कि डिजिटल संपत्ति वापस कैसे हासिल की जाए। इसलिए कीमती दस्तावेज व संपर्क सिर्फ मोबाइल में ही न रखें और रखना ही है तो उसकी प्रतियां क्लाउड या डिजिटल लॉक के साथ मेल में रखें।

‌भविष्य के ऐसे खतरों से अनजान, ठीक उसी सप्ताह पारंपरिक भारतीय लिबास- धोती कुर्ता, माथे पर त्रिपुंड लगाए लड़कों की छह टीमें दंडकंदुक क्रीड़ा (क्रिकेट) खेल रही थीं। वाराणसी के संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय मैदान पर चल रहे इस मैच ने लोगों का ध्यान खींचा। शास्त्रार्थ महाविद्यालय के स्थापना दिवस पर कुर्ता पहने बटुकों (वैदिक छात्र)ने दंड (बल्ला) उठाया और कंदुक (गेंद) पर प्रहार किया। क्रिकेट के इस संस्कृत संस्करण की शुरुआत निर्णायक: (अंपायर्स) की अनुमति के साथ हुई और संस्कृत में शुरू हुई कमेंट्री ने सबका ध्यान खींचा। इसमें भाग ले रहे विभिन्न संस्कृत महाविद्यालयों के छात्रों को दर्शक, विस्मय और गर्व के साथ देख रहे थे।

कुछ ही लोगों को शायद पता हो कि 21 फरवरी यूनाइटेड नेशन (यूएन) ने साल 2000 से अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में घोषित किया है। तब यूएन ने देखा कि ‘जब भाषाएं फीकी पड़ने लगती हैं, तब दुनिया की समृद्ध सांस्कृतिक विविधता की चमक भी धुंधली पड़ने लगती है।’ इसलिए जब एक भाषा खत्म होती है, पूरी की पूरी संस्कृति खत्म हो जाती है। और भारत के लिए हमारी संस्कृृति आध्यात्मिक ज्ञान का लगभग पर्याय है।

निसंदेह, संस्कृत की संस्कृति से पोषित हमारी अधिकांश भाषाएं बच्चों के व्यक्तित्व विकास और विचारों की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाती हैं और जीवन व दुनिया का बड़ा परिदृश्य दिखाती हैं। इसलिए हम सबको ना सिर्फ अपनी मातृभाषा की रक्षा के लिए काम करना चाहिए, बल्कि अपनी संस्कृति को मजबूत करने के लिए भाषाओं की ‘जननी’ संस्कृत को भी महत्व देना चाहिए।

फंडा यह है कि अपनी मौजूदा जिंदगी को सुखद बनाने के लिए गौरवशाली इतिहास और डिजिटल संपत्ति की रक्षा के लिए भविष्य के ज्ञान का सही अनुपात जरूरी है।

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