• Hindi News
  • Opinion
  • The Story Of The Pain Of The Police Department, The Police Department Has To Work Within Many Pressures And Limits.

जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:पुलिस विभाग के दर्द की कथा, पुलिस विभाग को अनेक दबाव और सीमाओं के भीतर कार्य करना पड़ता है

4 महीने पहले
  • कॉपी लिंक
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

विगत तीन वर्षों में पुलिस के कार्य से प्रेरित कुछ वेब सीरीज नेटफ्लिक्स कंपनी ने बनाई हैं। इन्हीं में से एक ‘दिल्ली क्राइम’ निर्भया प्रकरण से प्रेरित है। विगत वर्ष प्रदर्शित ‘पाताल लोक’ पुलिस कर्तव्य और उनकी विवशता को अभिव्यक्त करती है। एक कहानी है जिसमें, एक महिला पुलिस सब इंस्पेक्टर उन महिलाओं से नफरत करती है, जो रोजी-रोटी कमाने के लिए अनैतिक कार्य में संलग्न हैं, परंतु एक सत्य घटना की जांच-पड़ताल के समय उसने देखा कि मजबूरी में किया जा रहा उन महिलाओं का वह काम बड़ा यातनामय है।

रूसी फिल्म ‘बेलाड ऑफ ए सोल्जर’ में भी एक सैनिक की पत्नी की ऐसी ही मजबूरी प्रदर्शित है, जो अपने पति के बूढ़े-माता पिता की जरूरतों को पूरा करने के लिए गलत रास्ते पर जाती है। गोया कि सेना में रसूखदारों के पुत्र भर्ती नहीं होते, बल्कि धरती पुत्र और भूमिहीन किसानों के घर के युवा ही भर्ती होते हैं।

गोविंद निहलानी और विजय तेंदुलकर की ओम पुरी अभिनीत ‘अर्ध सत्य’ के आखिरी हिस्से में एक पुलिस वाले से कहा जाता है कि उस पर थर्ड डिग्री यातना का आरोप लगा है और मंत्री जी से क्षमा मांगने पर ही उसकी नौकरी बच सकती है। लेकिन अपने आत्मसम्मान पर गर्व करने वाला इंस्पेक्टर पात्र अहंकारी मंत्री को ही गोली मार देता है। गौरतलब है कि पुलिस इंस्पेक्टर पात्र कई कलाकारों ने अभिनीत किए हैं।

सलीम साहब का कथन है कि ‘मृत्युदंड’ और ‘गंगाजल’ में अजय देवगन का प्रयास सर्वश्रेष्ठ रहा है। सलमान खान ने ‘दबंग’ सीरीज में इंस्पेक्टर पात्र को नया आयाम दिया है। वह हंसते-हंसाते खलनायकों को दंडित करता है। इन फिल्मों में अभिनय करने वाले सोनू सूद आजकल हिसाब-किताब दे रहे हैं।

बहरहाल, छोटे परदे पर प्रस्तुत एक क्राइम कथा में पुलिस वाले की मजबूरी यह है कि स्वयं उसका कम उम्र का पुत्र लाइलाज बीमारी से जूझ रहा है। पुत्र चार कदम चल नहीं सकता परंतु इंस्पेक्टर पिता अपराधियों को मीलों दौड़ा-दौड़ा कर गिरफ्तार करता है। एक इंस्पेक्टर का संवाद है कि वर्दी धारण करते ही उसे लगता है कि मानो उसने फौलाद धारण कर लिया है।

पुलिस विभाग को अनेक दबाव और सीमाओं के भीतर कार्य करना पड़ता है। उन्हें वार्षिक उत्सव के दिन भी अपना कार्य करना होता है। जरूरी है कि वे दबाव मुक्त हों और निरंतर तबादले की भागमभाग से बच सकें ताकि अपने शहर को लंबे समय तक अपराध मुक्त रख सकें। उन्हें क्या पता कि अपराध के मोबिल ऑयल से ही व्यवस्था की मशीन चल रही है। पुलिस वाला तो मात्र एक्सीलेटर है, जिस पर पैर किसी अन्य का ही बना रहता है।

ज्ञातव्य है कि मुंबई के दादर क्षेत्र के एक सुनसान से क्षेत्र में मुंबई पुलिस बैंड अपनी प्रैक्टिस करता है। पुलिस बैंड गरिमामय है, मुंबई पुलिस बैंड का इतिहास लगभग सौ वर्ष पुराना है। दूसरी ओर उस पुलिस वाले के दुख का अनुमान लगाना कठिन है , जिसे अपराधी व्यक्ति को चुनाव जीतने और मंत्री बनने के बाद सैल्यूट करना पड़ता है।

अक्षय कुमार अभिनीत फिल्म ‘गब्बर’ में गुमनाम रहते हुए एक व्यक्ति भ्रष्ट लोगों का कत्ल करता है। सुनील ग्रोवर अभिनीत कांस्टेबल को लगता है कि वह गब्बर नामक व्यक्ति का रहस्य सुलझा सकता है परंतु उसका सीनियर अफसर उसका अपमान करके उसकी बात नहीं सुनता और उससे छोटे-मोटे काम करवाता है।

एक अन्य ऑफिसर जब जांच के लिए नियुक्त होता है, तब वह उस कांस्टेबल की बात को महत्व देता है और कहानी आगे बढ़ती है। गौरतलब है कि पुलिस विभाग में महिलाओं को भी अपनी नौकरी में तरह-तरह के संघर्ष करने होते हैं, तब जाकर उनका सफर आगे बढ़ता है। साहिर लुधियानवी रचित गुरुदत्त की फिल्म ‘प्यासा’ के गीत की पंक्ति ‘मदद चाहती है ये हव्वा की बेटी यशोदा की हमजिंस, राधा की बेटी ...’ महिला पुलिस दर्द को बयां करती है।