एन. रघुरामन का कॉलम:हर चीज से कमाने का लालच हमेशा उल्टा पड़ेगा

एक महीने पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

बुधवार को जब आप यह लेख पढ़ रहे होंगे, मुंबई में पहली से लेकर सारी कक्षाओं के सभी स्कूल खुल गए होंगे। पर सिर्फ 40% अभिभावकों ही बच्चों को स्कूल भेजने पर सहमत हैं, 60% कुछ दिन और रुककर वायरस की प्रवृत्ति देखेंगे, तब तक बच्चे ऑनलाइन क्लास करेंगे। स्कूल प्रबंधन चिंतित है, इसलिए नहीं कि उनके शिक्षकों को ऑनलाइन-ऑफलाइन दोनों बच्चे संभालने होंगे बल्कि इसलिए क्योंकि इससे उनकी परिवहन लागत में भारी अंतर आ रहा है।

कोविड से पहले के दिनों में बस संचालक स्कूल से हर बच्चे के हिसाब से पैसे मांगते थे जैसे अमूमन ट्रांसपोर्ट बिजनेस में होता है, जहां यात्री टिकट लेता है, पर स्कूल इंकार कर देता था क्योंकि ट्रांसपोर्ट हमेशा घाटे का क्षेत्र रहा और स्कूल उन्हें ट्रिप के हिसाब से पैसा देते थे। पर कुछ स्मार्ट पेशेवरों ने इस बिजनेस में हुए घाटे को कुछ हद तक भरने के लिए उसी बस में बैठाने की क्षमता बढ़ा ली और ट्राफिक हवलदार भी मैनेज कर लिए। आज जब सिर्फ 40% अभिभावक उसी बस सुविधा के इस्तेमाल के लिए तैयार हैं, स्कूल प्रबंधन चाहता है कि सीट के हिसाब से भुगतान हो, पर बस संचालक इससे इंकार कर रहे हैं।

चूंकि स्कूल दूसरी चीजों जैसे यूनिफॉर्म, किताबें, स्टेशनरी बेचने में भी लालची थे, जो करिकुलम का हिस्सा नहीं था। ऐसे में बस संचालकों और अभिभावकों को लगा कि ट्रांसपोर्ट भी इसी में आता है। स्कूलों को सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान देना था ना कि इन अतिरिक्त सेवाओं पर। उन्हें शुरुआत से ही ये चीजें आउटसोर्स करनी चाहिए थीं और इसकी कीमतें उपयोगकर्ताओं-सुविधा देने वालों पर छोड़ देनी चाहिए थी। स्टेशनरी-यूनिफॉर्म के बीच गर्दन फंसाकर अब उन्हें ट्रांसपोर्ट सर्विस में भी खींच लिया गया है, जिससे कोई मुनाफा नहीं आ रहा।

एक और उदाहरण लें- रेस्तरां बिजनेस। रेस्तरां आने वालों को पानी देना पुण्य का काम माना जाता था। यहां तक कि कुछ साल पहले रेस्तरां में कुछ नहीं खाने वाले भी आकर पानी पी लेते थे। आज रेस्तरां आने वालों को बोतलबंद पानी लेने का दबाव डालकर अतिरिक्त कमाई की जा रही है, वो भी प्रीमियम रेट पर बोतल देकर।

किसी भी लोकप्रिय रेस्तरां में जाएं और सादा पानी मांगें। वहां से कोई बाहर से भी गीली स्टील की गिलास में पानी लाएगा। इसका मतलब है कि स्टील के गिलास को किसी बर्तन में डुबोकर पानी भरा गया है। और जब आप उन्हें बोतलबंद पानी लाने के लिए कहेंगे, वही आदमी साफ-सुथरी और सूखी कांच की गिलास के साथ बिना खुली बोतल लाएगा।

चूंकि पानी की बोतलें प्रिंटेड से ज्यादा दाम पर बिकती हैं, रेस्तरां वाले परोक्ष रूप से ग्राहकों को सादे पानी के लिए हतोत्साहित करते हैं, जिससे उन्हें कोई लाभ नहीं होता। याद रखें ये बोतलें न वे बनाते और न पैक करते हैं, यहां तक कि खाली बोतलें भी नगर निगम इकट्‌ठी करता है। इसे आप ‘लालच’ के अलावा और क्या कहेंगे? लोग चंद पैसों के लिए प्यासे को पानी पिलाने का ‘धर्म’ भूल गए हैं।

ये मैंने पिछले हफ्ते भोपाल में एमपी नगर के एक तिमंजिला रेस्तरां में अनुभव किया, जहांं खाने के लिए अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है। यकीन करें, एक दिन प्लास्टिक कचरा कम करने के लिए कोई नया नियम आ सकता है, जिससे हॉस्पिटेलिटी का व्यवसाय बुरी तरह प्रभावित होगा, क्योंकि ये इंडस्ट्री ही सबसे ज्यादा प्लास्टिक की बोतलें इस्तेमाल करती है।

फंडा यह है कि अपने मुख्य व्यवसाय को प्रपंचों से दूर सुगमतापूर्वक चलाना चाहते हैं, तो ऐसी कई सहायक सेवाएं नो प्रॉफिट नो लॉस के आधार पर देनी चाहिए। नहीं तो ये लालच किसी दिन मुख्य व्यवसाय पर ही उल्टा पड़ जाएगा।