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  • The Time Has Come For The Leaders Of The Country To Take A Lesson From The Story Of Baba Bharti And Kharag Singh, The People Suffering The Consequences Of The Government's Disobedience.

डॉ. चन्द्रकांत लहारिया का कॉलम:वक्त आ गया है कि देश के नेता बाबा भारती और खड़ग सिंह की कहानी से सबक लें, सरकारों की वादाखिलाफी का नतीजा भुगत रही जनता

11 दिन पहले
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डॉ. चन्द्रकांत लहारिया, जन नीति और स्वास्थ्य तंत्र विशेषज्ञ - Dainik Bhaskar
डॉ. चन्द्रकांत लहारिया, जन नीति और स्वास्थ्य तंत्र विशेषज्ञ

कोविड की दूसरी लहर में देश के लोगों को इलाज कराने में संघर्ष करना पड़ा था। भारत दुनिया की फार्मेसी है, लेकिन यहां जरूरी दवाओं की कमी रही। दुनिया की वैक्सीन राजधानी होने के बावजूद लोगों को कोरोना के टीके लगवाने के लिए दर-बदर भटकना पड़ रहा है। सवाल उठता है कि महामारी से लड़ने के लिए जो भी कुछ जरूरी था, भारत उसके लगभग हर कदम पर क्यों लड़खड़ाया? दरअसल सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के जितने भी वादे किए जाते हैं उनको जल्द ही भुला दिया जाता है और उनका क्रियान्वयन लगभग न के बराबर होता है।

भारत की अब तक तीन राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीतियां आ चुकी हैं। अगर पहली दो स्वास्थ्य नीति के घोषणाएं ही पूरी कर दी जाती तो आज स्वास्थ्य तंत्र और नागरिकों की सेहत अलग होती। सिर्फ महामारी के समय पर ही नज़र डालते हैं। राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के बाद नेताओं में भारत के स्वास्थ्य तंत्र को मजबूत करने पर काफी चर्चा हुई। फिर भी एक साल बाद स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता में बढ़ोतरी नहीं हुई।

सरकारों की वादाखिलाफी का यह इकलौता उदाहरण नहीं है। वैक्सीन उपलब्ध होने से काफी पहले कई भारतीय राज्यों ने, खासतौर पर जहां चुनाव हो रहे थे, नागरिकों को मुफ्त टीके लगवाने का वादा किया। आम बजट 2021-22 में भी कोरोना टीके के लिए 35 हजार करोड़ रुपए आबंटित किए गए। फिर भी केंद्र व राज्य सरकारों ने वादे तोड़ने के तरीके निकाल लिए।

राज्य सरकारों ने घोषणा की कि सिर्फ सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में टीका मुफ्त रहेगा। वहां तो वैसे भी स्वास्थ्य सेवाएं मुफ्त होती हैं, तो क्या राज्य पहले पैसे लेने की सोच रहे थे और फिर इसे मुफ्त किया? केंद्र ने कहा कि वह सिर्फ 45 वर्ष से ऊपर वालों के टीके का खर्च उठाएगी, बाकी का नहीं।

केंद्र और राज्यों के अधूरे वादों की फेहरिस्त लंबी है और इससे लोगों का स्वास्थ्य सेवाओं पर से भरोसा उठता है। लोग सरकारों को इसलिए चुनते हैं कि जब ऐसी मुसीबत की घड़ी और आपदा आएगी तो सरकारें उनके लिए जरूरी इंतजाम करेंगी। लेकिन महामारी की दूसरी लहर में बिस्तरों, वेंटिलेटर, दवाइयों, वैक्सीन और यहां तक कि ऑक्सीजन के लिए लोगों को खुद व्यवस्था करनी पड़ी। साथ ही, ‘कथनी और करनी ’ में अंतर रहा है, जहां नेताओं ने खुद उन बातों का पालन नहीं किया, जिसका पालन वे लोगों से चाहते थे। इससे स्वास्थ्य अधिकारियों और लोगों का विश्वास बना नहीं रह सका। लेकिन यह पहली बार नहीं है, जब भरोसा टूटा है। फिर बात आती है, आखिर यह सिलसिला कब रुकेगा?

यह नेताओं को बाबा भारती और खड़ग सिंह की कहानी याद दिलाने का वक्त है, जिसे प्रतिष्ठित लेखक यशपाल ने लिखा था। कहानी में, बाबा भारती का प्रिय घोड़ा हड़पने के लिए, डाकू खड़ग सिंह एक लाचार और असहाय बुजुर्ग का वेश धारण करके सड़क किनारे बैठ जाता है। जब बाबा वहां से अपने घोड़े सुल्तान के साथ गुजरते हैं तो छद्म रूप में खड़ग सिंह मदद की गुहार करता है।

जब बाबा मदद करने के लिए रुकते हैं तो खड़ग सिंह घोड़ा लेकर भागने लगता है। भागने से पहले वह अपनी असली पहचान बताता है। तब बाबा उससे कहते हैं कि वह लोगों को न बताए कि उसने धोखा देकर घोड़ा छीना है। खड़ग सिंह पूछता है कि ऐसा क्यों? तब वह कहते हैं कि अगर लोगों को इसका पता चलेगा, तो वे गरीबों पर भरोसा करना बंद कर देंगे। खड़ग सिंह घोड़ा लौटा देता है। अब यह देखना है कि भारतीय नेता लोगों के खोए हुए विश्वास को वापस पाने के लिए कब और क्या करेंगे?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)