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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:लोगों की मदद में बड़ा आनंद है, हमें उन लोगों की मदद करना चाहिए जो जीवन के कठिन परिस्थितियों से गुजर रहे हैं

4 दिन पहले
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पं. विजयशंकर मेहता - Dainik Bhaskar
पं. विजयशंकर मेहता

पागलखाना इसलिए बनाया जाता है कि पागल को उसमें पहुंचाया जा सके, रखा जा सके। लेकिन, इससे भी बड़ा सच यह है कि हर पागल पागलखाने में नहीं होता। कई हमारे आसपास घूम रहे होते हैं, और एक बड़ा गजब का पागल तो हमारे भीतर ही होता है। हम खुद बहुत बड़े पागल हैं। यदि अपने भीतर के चिंतन, अपनी आंतरिक गतिविधियों का, जिन्हें कोई दूसरा नहीं जान पाता, आकलन करें और बाहर के किसी पागल को देखें तो लगेगा हममें और इसमें कोई बहुत अधिक फर्क नहीं है। अंतर बस इतना है कि वह बाहर, सबके सामने कर रहा होता है और हम भीतर कर गुजर रहे हैं।

यहां यह भी समझ लें कि कोई पागल होता कैसे है। विचार और बुद्धि का जब सांस से रिदम बिगड़ जाए तो व्यक्ति पागल हो जाता है। इस दौर में कई परिवारों ने अपने प्रियजन खोए हैं और उनकी पीड़ा वे ही जानते हैं। कुछ तो ऐसे चले गए कि पीछे बचे लोग लावारिस से हो गए। उनके लिए तो स्थिति ऐसी हो गई कि- ‘कई गम पास आ बैठे, इक तेरे दूर जाने के बाद।’ ऐसी स्थितियां अच्छे-अच्छों को पागल बना देती हैं। इसलिए जिन्हें थोड़ा भी होश है, समझ है, सेवा का भाव है और समर्थ हैं, उन्हें अब उन लोगों की मदद करना चाहिए जो कठिन परिस्थितियों से गुजर रहे हैं। इसमें भी जीवन का बड़ा आनंद है।