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नवनीत गुर्जर का कॉलम:क्रिप्टो के मामले में गुरु गोरख की तरह कोई पारखी नहीं, न सरकार, न नीति नियंता

14 दिन पहले
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नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर - Dainik Bhaskar
नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर

गुरु गोरखनाथ और उनके शिष्यों की, भारतभर में कई कहानियां हैं। आज गोरखपुर में जो गोरखनाथ मंदिर है, वहां पहले घनी झाड़ियां थीं। कथा यूं है कि एक नेपाली सुंदरी ने गुरु गोरखनाथ को भोजन पर बुलाया। जानती थी योगी सिर्फ खिचड़ी खाते हैं। उसने पकवानों के थालों की तरह खिचड़ी के थाल परोसे। दूर बैठे गुरु गोरखनाथ को सुंदरी के मन में खोट नजर आई।

वे गोरखपुर के पास घनी झाड़ियों में ध्यान लगाकर बैठ गए। सुंदरी इंतजार करते-करते थक गई। रोज खिचड़ी पकाती। परोसती... पर गोरख नहीं आते। खिचड़ी पकाते-पकाते पत्थरों के बीच वह खुद भी पत्थर हो गई, पर गोरख नहीं आए। उस सुंदरी का इंतहा दर्द उन पत्थरों में एक गरम पानी का चश्मा बनकर बह निकला। जहां आज भी खिचड़ी की देगेें पकती है।

क्रिप्टो करंेसी भी उस सुंदरी की खिचड़ी की तरह है। सुंदर लगती है, लेकिन है तो आखिर खिचड़ी ही। मन में खोट कूट-कूट कर भरी है, सो अलग। हमारी सरकार कभी कहती है खुद की क्रिप्टो करेंसी लाएंगे। कभी कहती है टैक्स के दायरे में लाया जाएगा। कभी तमाम क्रिप्टो करेंसी पर प्रतिबंध की बात की जाती है। गुरु गोरख की तरह पारखी कोई नहीं है। न सरकार, न नीति नियंता।

पहले समझते हैं कि ये क्रिप्टो करंेसी है क्या? झूठ-मूठ का पैसा! यहां पैसा खर्च भी होता है। आता भी है। लेकिन दिखता नहीं। सबकुछ ऑनलाइन। हाथ में कुछ नहीं होता। हालांकि हम इस सब के आदी हो चुके हैं। हम, यानी हम मध्यम या निम्न मध्यम श्रेणी के लोग।

पहले तनख्वाह हाथ में मिलती थी। कई बार गिनते थे। तृप्ति मिलती थी। पहले ख्यालों में गिनते थे कि इतने मिलेंगे! पांच-पांच सौ के इतने, और सौ-सौ के इतने नोट। फिर कैशियर के सामने। कैशियर खुद गिनता था तो उसके हाथ देखकर हम आंखों से ताड़ते थे। एक नोट कम ही लगता था। हाथ में आते ही फिर गिनते थे। बीच में कोई कुछ बोल दे तो उसे डांटते हुए फिर गिनती करते थे।

तीन-चार बार में संतुष्टि होती थी। इस बीच कतार में लगे लोगों और कैशियर से दो-चार बार झड़प हो जाती थी। काम पर लौटकर हर दस मिनट में जेब को हाथ लगाते थे। पैसे हैं या नहीं! पूरे दिन जेब पर ही ध्यान रहता। घर जाते वक्त दोपहिया पर बैठे-बैठे भी जेब पर दो-चार बार हाथ बरबस जाता ही था। घर आकर बादशाह हो जाते थे। पत्नी के सामने इस शान से गड्डी फेंकते थे जैसे पानीपत के युद्ध में विजयी होकर लौटे हों।

भले ही दूसरे ही दिन दूध, किराना, स्कूल फीस में सारा पैसा चला जाए, लेकिन उस रात की खुशी स्वर्ग से भी सुंदर होती थी। रोज भले ही वक्त से जागें नहीं, लेकिन उस दिन जल्दी उठकर दूध वाले को 247 की बजाय पूरे ढाई सौ रु देना। फिर वो तीन रु. लौटाने लगे तो छाती फुलाकर कहना कि रखो, अगली बार देख लेंगे। किराने वाला भी समझ जाता था कि वेतन मिल गया है।

हमारे जाते ही चाय बुलवाता। ऐसा सत्कार करता जैसे पहली बार पावणे घर आए हों। हालाँंकि चुकाते पिछले महीने का कर्ज ही थे, लेकिन दुकानदार को लगता था जैसे गंगा नहा लिए। वो भी खुश। हम भी बरी। अब तो सैलरी बैंक में चली जाती है। कितनी आई, कितनी कटी, क्यों कटी, क्यों मिली, होश ही नहीं रहता! पैसे खूब हो गए। बैंक में भी भरे पड़े होंगे। लेकिन वो खुशी कहीं खो गई है। हाथ में कुछ नहीं है। न पैसे, न नोट, न सुख, न वो खुशी। क्रिप्टो तो आनी ही थी, आ गई। भावनाओं का मूल्य अब रहा ही कहां है?