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सुनील कांत मुंजाल का कॉलम:इस अनिश्चित दौर में हमारी चुनौतियां भयानक हैं, लेकिन भारत को दोबारा आकार देने के अवसर भी बहुत

16 दिन पहले
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सुनील कांत मुंजाल, चेयरमैन, हीरो एंटरप्राइज और ‘हीरो की कहानी’ किताब के लेखक - Dainik Bhaskar
सुनील कांत मुंजाल, चेयरमैन, हीरो एंटरप्राइज और ‘हीरो की कहानी’ किताब के लेखक

कोरोना महामारी से एक महीने पहले, फरवरी 2020 में ऐसा लगा था कि भारत की जीडीपी 3 ट्रिलियन डॉलर के पार चली जाएगी। अब 2020-21 के अंत में राष्ट्रीय आउटपुट वहीं पहुंच गया है, जहां 2019 के अंत में था। अगले कुछ वर्षों में भारत प्रभावी रूप से तेजी से दौड़ रहा होगा, फिर भी वह वहीं रहेगा, जहां है क्योंकि वह लाखों आजीविकाओं और व्यापारों के नुकसान की भरपाई कर रहा होगा। इसलिए भारत की वृद्धि के लिए एक नहीं, कई उत्प्रेरकों की जरूरत होगी।

सरकार को ऐसे तरीके खोजने होंगे जिनसे इतना राजस्व इकट्‌ठा हो सके, जितना पहले कभी नहीं हुआ। केंद्र, राज्य और स्थानीय स्तर पर नेतृत्व को यह सुनिश्चित करना होगा कि साहसिक और अभिनव परिसंपत्ति मुद्रीकरण योजनाएं राजनीति और नौकरशाही में न उलझी रहें। साथ ही इन फंड का इस्तेमाल न सिर्फ कर्ज चुकाने में, बल्कि उत्पादक संपत्तियां बनाने में भी हो। इस दशक का उपयोग उन क्षेत्रों को मजबूत करने और विकसित करने में किया जाना चाहिए, जिनमें नौकरियों पैदा करने, नए व्यवसाय मॉडल अपनाने और वैश्विक रुझानों का दोहन करने की क्षमता है।

भारत को न केवल उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन बल्कि सार्थक भूमि और श्रम सुधारों के माध्यम से परिवर्तनकारी उद्योगों को विकसित करने की जरूरत है। जैसे सॉफ्टवेयर, फार्मास्यूटिकल्स और ऑटोमोबाइल उदारीकरण के बाद के दशक में वैश्विक चैंपियन बनकर उभरे, वैसे ही इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर खाद्य प्रसंस्करण जैसे सेक्टरों में सही सुधारों के साथ नए वैश्विक चैंपियन बनने क्षमता है।

भारत को एक ऐसी संस्कृति की जरूरत है जहां आंत्रप्रेन्योर फिर पनप सकें, गिर सकें और बढ़ सकें। इसके लिए प्रतिस्पर्धी और कुशल प्लेटफार्म चाहिए जो सभी प्रकार के फंडों का वित्तीय प्रणाली में चलना संभव बनाएं। इससे क्रेडिट आसानी से सुलभ और सस्ता होगा।

2020 के दशक का निर्माण प्रौद्योगिकी के आधार पर होना चाहिए। ‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन’ एक नारे से परे जाकर बेहतर क्रियान्वयन करे और फैसले लेने की क्षमता बढ़ाए। कोविड-19 ने बताया है कि हेल्थकेयर में यह कैसे संभव है।

प्रशिक्षण तकनीक को सर्वव्यापी बनाया जाए, जो प्रक्रियाओं को स्वचालित बनाने, डेटा प्रबंधन और नागरिकों से संवाद में मदद करे। नीति आयोग ने इन क्षेत्रों में कई उपयोगी सुझाव दिए हैं। इस दशक को अनौपचारिक क्षेत्र को मुख्यधारा में लाने के लिए याद किया जाना चाहिए।

फिलहाल, संगठित क्षेत्र के श्रमिक भारत की श्रम शक्ति के 10% से कम हैं और अनौपचारिक नौकरियों को अवशोषित करने की इसकी क्षमता सीमित है। इसलिए, अनौपचारिक क्षेत्र के सदस्यों को अपने दम पर कौशल विकास और अपग्रेड की क्षमता विकसित करनी चाहिए।

जब विकास का लाभ आबादी के छोटे हिस्से को मिलता है, जैसा कि दशकों से होता आ रहा है, तो समयसीमा और उद्देश्य के संदर्भ में लगातार होने वाला असर सीमित होता है। 2000 के दशक में आईटी बूम इसका उदाहरण है। इसके विपरीत, लोगों का गरीबी या निम्न आय वर्ग से बाहर आकर, मध्य और उच्च आय वर्ग में जाने के ज्यादा फायदे हैं।

मुझे लगता है कि अगर भारतीय किसान, नए कृषि कानूनों को एक मौका दें, तो इससे भी ऐसे ही नतीजे होंगे। जब परिवारों को अचानक अपनी आय में पर्याप्त वृद्धि दिखती है तो यह नई मांगें लाता है, जिससे कंपनियां निवेश और उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित होती हैं।

कौशलों को बेहतर बनाना मुश्किल लग सकता है, पर है नहीं। अकुशल लोगों के प्रति बस थोड़ी समानुभूति और सहयोग की जरूरत है। हमें अपने लोगों के कौशल स्तर को बहुत ज्यादा बढ़ाने की जरूरत है, लेकिन कौशल निर्माण करने वाले व्यवसायों को सम्मानित करने की भी आवश्यकता है। दक्षिण कोरिया का उदाहरण देखें, जहां सबसे हुनरमंद लोगों को शिक्षण में लाया जाता है और स्कूल शिक्षक देश के सबसे अमीर लोगों में शामिल हैं।

आखिरी और सबसे जरूरी बिंदु है समानता। भारत को सिर्फ कुछ हिस्सों के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए तत्काल विकास के एक ज्वार की आवश्यकता है। अगर हम कानपुर से हैदराबाद तक, नक्शे पर एक रेखा खींचते हैं, तो दाईं ओर भारी आबादी वाले जिलों की तुलना में बाईं ओर के अधिकांश जिले आर्थिक और सामाजिक रूप से बहुत आगे हैं।

यदि अकुशल छोड़ दिया जाए, तो भारी आबादी वाले क्षेत्र विकास में पीछे रह जाते हैं। शायद इसीलिए कर्नाटक की जीडीपी उत्तर प्रदेश के बराबर है, जिसमें यूपी की आबादी के 30% लोग हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि ज्यादा आबादी वाले राज्य अभिशप्त हैं। उदाहरण के लिए शंघाई की 2.7 करोड़ की आबादी चीन की जीडीपी में 20% का योगदान देती है, जिसके पीछे उसका दशकों पुराना कौशल विकास कार्यक्रम है।

ऐसे अनिश्चित दौर में, हमारी चुनौतियां भयानक हैं, फिर भी परिवर्तनकारी नीतियों और व्यावहारिक क्रियान्वयन के माध्यम से भारत को फिर आकार देने के अवसर बहुत सारे हैं। नेतृत्व की सही बैंडविथ के साथ, हम सही दिशा में बढ़ रहे हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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