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लेफ्टि. जनरल शौकिन चौहान का कॉलम:वे बेस्ट थे; सेना में एक जैसे प्रोटोकाॅल के पक्षधर, हमेशा उत्साह से लबरेज रहने वाले शख्स

7 महीने पहले
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लेफ्टि. जनरल शौकिन चौहान, पूर्व डीजी, असम राइफल्स - Dainik Bhaskar
लेफ्टि. जनरल शौकिन चौहान, पूर्व डीजी, असम राइफल्स

जनरल बिपिन रावत के जाने से देश ने अपना एक अनमोल हीरा खोया है, तो मैंने अपना एक खास दोस्त। 11 गोरखा राइफल्स के सेंटर (तब क्लेमेंटाउन-देहरादून) में हम साथ जन्मे। हमारे पिता भी इसी गोरखा राइफल्स में थे। इसी 11 गोरखा राइफल्स से उन्होंंने सेना में अपना कॅरिअर शुरू किया। वह राष्ट्रीय रक्षा एकेडमी में मुझसे डेढ़ साल सीनियर थे।

जनरल रावत भारतीय सेना को 21वीं सदी में आगे ले जाने के सपने देखते थे। पुरुष प्रधान सेना में महिलाओं की संख्या बढ़ाने और उन्हें बराबरी का हक दिलाने को लेकर प्रयासरत थे। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) के तौर पर उनका सबसे महात्वाकांक्षी काम ‘थिएटराइजेशन’ पर थोड़ा विराम लग गया है। अगर वे होते तो अप्रैल 2022 में देश को पहला थिएटर कमांड मिल जाता।

जनरल रावत दिसंबर 2019 में सीडीएस बने। ‘थिएटराइजेशन’ उनका सपना था। अभी देश में कमांड के हिसाब से सेनाओं के प्रमुख अलग-अलग जगह बैठते हैं। जैसे सेना का साउथ वेस्टर्न कमांड का हेडक्वार्टर जयपुर में है, वेस्टर्न नेवल कमांड का हेडक्वार्टर मुंबई है, ‌‌वेस्टर्न एयर कमांड का ऑफिस दिल्ली है।

जनरल रावत का ख्वाब था कि इन्हें अगर देशहित में एक साथ निर्णय लेने हैं, तो एक साथ बैठना चाहिए और कमांड किसी एक से आनी चाहिए। इसी पर चर्चा करने के लिए वह घूम-घूमकर बातें करते, नए अधिकारियों को इस बारे में समझाते। वह चाहते थे कि भारतीय सेना एक सेना या एक इकाई के तौर पर आगे बढ़े, ना कि अलग-अलग सेना के तौर पर।

जनरल रावत निर्णय लेने में बहुत तेज-तर्रार और स्पष्टवादी थे। और चीज़ों को टालते नहीं थे। कश्मीर के सोपोर में 2007-08 का समय बेहद चुनौतीपूर्ण था, उस समय वह सोपोर में ब्रिगेड कमांडर थे। और मैं सोपिया में ब्रिगेड कमांडर था। उस दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण ऑपरेशंस को अंजाम दिया। युनाइटेड नेशंस की पीसकीपिंग फोर्स का हिस्सा रहे। उन्हें कांगो में बिग्रेड संभालने की जिम्मेदारी मिल गई। संयुक्त राष्ट्र के अंतर्गत कंबाइंड आर्म्ड ब्रिगेड संभाली।

आईएमए से उन्हें ‘स्वॉर्ड ऑफ ऑनर’ सम्मान प्राप्त हुआ था। वह शुरुआत से बेस्ट थे। ‘प्रोफेशनलिज्म’ उनका हॉलमार्क था, स्पष्ट निर्णय लेने और आदेश देने में भी शुरुआत से ही स्पष्ट थे। वह चाहते थे कि तीनों सेनाओं के अधिकारी-सैनिक सीखने और आगे लड़ने के लिए एक साथ आएं। वह चाहते थे कि सेना में टीचिंग एक-सी हो, प्रोटोकॉल्स एक से हों।

ऊर्जा से लबरेज
अपनी कई तस्वीरों में वह गोरखा सैनिकों से मिलते हुए दिखाई देते हैं। वे नेपाली में पारंगत थे। एक बार हम नेशनल डिफेंस कॉलेज के फॉरेन कंट्री टूर पर गए, रेस्ट करने के बजाय उन्होंने कहा कि चलो वॉक पर चलते हैं। हाइकिंग के शौकीन जनरल रावत का फ्री टाइम भी सिर्फ काम था।

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