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थॉमस एल. फ्रीडमैन का कॉलम:जब आप हार रहे हों, तो कम बोलें; जब जीत रहे हों, तो बोलने की जरूरत ही क्या है?

17 दिन पहले
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थॉमस एल. फ्रीडमैन, तीन बार पुलित्ज़र अवॉर्ड विजेता एवं ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ में स्तंभकार - Dainik Bhaskar
थॉमस एल. फ्रीडमैन, तीन बार पुलित्ज़र अवॉर्ड विजेता एवं ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ में स्तंभकार

एनएचएल टीम नॉर्थ स्टार्स के स्पोर्ट्सकास्टर एल शैवर ने मुझे मेरे जीवन का पहला रणनीतिक सबक सिखाया था। वे कहते थे- जब आप हार रहे हों, तो कम बोलें। और जब आप जीत रहे हों, तब कुछ बोलने की जरूरत ही क्या है? स्कोरकार्ड खुद हकीकत बयां कर देगा। प्रेसिडेंट बाइडेन और उनकी टीम इस बुद्धिमत्ता से कुछ लाभ पा सके तो बेहतर होगा।

बीते सप्ताह पोलैंड में यूक्रेन की सीमा के निकट अमेरिकी रक्षामंत्री लॉयड ऑस्टिन ने मेरा ध्यान खींचा। व्लादीमीर पुतिन की नजरों से भी वे छुपे नहीं होंगे। लॉयड ने कहा- अमेरिका का मकसद यूक्रेन की मदद करना भर नहीं, रूस को कमजोर करना भी है, ताकि आगे से वह फिर किसी देश पर हमला बोलने की हिमाकत न कर सके। लॉयड यहीं नहीं रुके। उन्होंने आगे कहा- रूस पहले ही अपनी सैन्य क्षमता का बड़ा हिस्सा गंवा चुका है और हम देख सकते हैं कि वह जल्द ही इसकी भरपाई नहीं कर सकेगा।

प्लीज, मुझे बताइए कि क्या यह बयान प्रेसिडेंट की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक का नतीजा था? क्या उन्होंने तमाम सम्भावित परिणामों पर गम्भीरता से विचार करने के बाद निर्णय लिया था कि ऐसा बयान देना है और क्या वह हमारे हित में होगा? क्या इस बारे में भी सोचा गया था कि कहीं पुतिन को जलील करना अमेरिका पर न्यूक्लियर हमले के खतरे को न्योता देना तो नहीं है? मुझे गलत मत समझिए।

मैं यही उम्मीद करता हूं कि जब युद्ध खत्म हो तब रूस की फौजें पस्त हो चुकी हों और पुतिन सत्ता गंवा चुके हों। लेकिन अगर मैं किसी देश का नेता हूं तो मैं इस बात को कभी सार्वजनिक रूप से नहीं कहूंगा। क्योंकि इससे कुछ मिलने नहीं वाला है, इससे नुकसान जरूर हो सकता है। वो कहते हैं ना कि बहकी-बहकी बातों से बना-बनाया खेल बिगड़ जाता है। बाइडेन की टीम की तरफ से बहकी बातें जरूरत से ज्यादा कही जा रही हैं।

मिसाल के तौर पर, लॉयड के उपरोक्त बयान के कुछ समय बाद राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के एक प्रवक्ता ने सीएनएन के हवाले से कहा कि अमेरिकी रक्षामंत्री के कथन ने अमेरिका के लक्ष्यों को ही प्रदर्शित किया है और वो है यूक्रेन पर हमले को रूस की रणनीतिक विफलता बना देना। अच्छी कोशिश है। लेकिन इसे लॉयड के बयान पर लीपापोती ही मानी जाएगी। रूस को यूक्रेन से कूच करने पर मजबूर कर देना एक बात है और खुलेआम यह घोषणा करना दूसरी बात कि हम उसे कमजोर होते देखना चाहते हैं।

कोई भी टकराव इस तरह के लक्ष्यों को सामने रखकर नहीं होता। क्योंकि हम कब यह लक्ष्य अर्जित करने जा रहे हैं? और क्या यह कोई पहले से चल रही प्रक्रिया है? मार्च में पोलैंड में दी गई एक स्पीच में बाइडेन ने कहा था कि पुतिन एक तानाशाह हैं और वे एक साम्राज्य को फिर से खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। आगे हमारे प्रेसिडेंट महाशय बोल पड़े- यह आदमी सत्ता में बना नहीं रह सकता।

इसके बाद फिर व्हाइट हाउस को सफाई देना पड़ी कि बाइडेन रूस में सत्ता-परिवर्तन के बारे में बात नहीं कर रहे थे, वे इतना ही संकेत कर रहे थे कि पुतिन को अपने पड़ोसी देशों पर ताकत की आजमाइश की इजाजत नहीं दी जा सकती। एक और लीपापोती। और यह इस बात को ही साबित करती है कि राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक में इस पर कोई चर्चा नहीं हुई थी कि अमेरिका किस सीमा से यूक्रेन की मदद शुरू करता है और किस सीमा पर खत्म करता है।

जिस तरह के बयान आ रहे हैं, उन्हें देखकर तो यही लग रहा है कि जिसके जो मन में आ रहा है बोल रहा है, और यह अच्छी बात नहीं है। हमारा लक्ष्य सरल है और सरल ही रहना चाहिए। हम इस युद्ध में तब तक यूक्रेनवासियों की मदद करना चाहते हैं, जब तक उनके भीतर प्रतिरोध का जज्बा है। जब उचित समय आए, तब रूस से संवाद करने में भी हम उनकी मदद करना चाहते हैं, ताकि वे अपनी सम्प्रभुता फिर से पा सकें।

हम इस सिद्धांत का समर्थन करते हैं कि कोई भी बड़ा देश अपने समीप मौजूद छोटे देश को निगल नहीं सकता। इससे ज्यादा की बातें करेंगे तो अपने लिए मुसीबतों को ही न्योता देंगे। हम नहीं चाहते कि रूस में जो हो, उसके लिए अमेरिका जिम्मेदार बने। क्योंकि सम्भव है पुतिन की जगह कोई उनसे भी बदतर नेता आ जाए। अरब में हमने देखा था कि जरूरी नहीं तानाशाही का अंत लोकतंत्र में हो, वह अराजकता में भी हो सकता है। और 6 हजार न्यूक्लियर वॉरहेड्स वाले मुल्क में अराजकता का होना दुनिया के लिए खतरा है।

अगर रूस में पुतिन से बेहतर कोई नेता सत्ता में आता भी है तो यह संदेश नहीं जाना चाहिए कि उसे अमेरिका ने वहां बिठाया है। दुनिया की हमदर्दी यूक्रेन के लिए है, पर वह अमेरिका की दादागिरी नहीं चाहती।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)