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एन. रघुरामन का कॉलम:जिंदगी में कुछ भी हासिल करने के लिए कठिन डगर पर चलना होता है, इस सिद्धांत से कोई समझौता संभव नहीं

2 महीने पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

आपको सोहनलाल द्विवेदी की कविता ‘कोशिश करने वालों की हार नहीं होती’ याद होगी। इसकी अंतिम पंक्तियां हैं, संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम। कुछ किए बिना ही जय-जयकार नहीं होती। मुझे नहीं पता कि कितने लोग इन शक्तिशाली पंक्तियों में विश्वास रखते हैं, लेकिन मैं जानता हूं कि भोपाल के कोटरा सुल्तानाबाद की रहने वाली और सेंट जोसेफ कॉन्वेंट सीनियर सेकेंडरी गर्ल्स स्कूल, ईदगाह हिल्स की नौवीं की छात्रा प्राची द्विवेदी को इनपर भरोसा है। उसके घर से तीस मीटर की दूरी पर झोपड़पट्‌टी हैं।

वह हमेशा वहां के बच्चों से खुद को दूर रखती थी क्योंकि उसे लगता था कि वहां साफ-सफाई नहीं रहती। लेकिन एक दिन यूं ही उसे लगा कि वह कॉलोनी के आसपास के बच्चों को पढ़ाकर और सफाई की आदतें सिखाकर उनकी मदद कर सकती थी। इस तरह लॉकडाउन के दौरान ही पांच महीने पहले, चार बच्चों के साथ उसकी क्लास शुरू हुई, जिसमें अब 10 छात्र हो गए हैं। मशहूर हो चुकी यह क्लास रोजाना एक घंटे चलती है।

होली के दौरान जब वह नंगे पैर पवित्र आग की परिक्रमा नहीं कर पा रही थी, तब उसके छात्रों ने अपने पैर दिखाकर उसे प्रोत्साहित किया। यह देख प्राची ने नंगे पैर चल रहे बच्चों के लिए कार्डबोर्ड की मदद से चप्पलें बनाईं, जो भले ही लंबी नहीं चलीं, लेकिन गरीबों की मदद के लिए उसकी प्रतिबद्धता देखकर स्पॉन्सर आगे आए और उन्होंने चप्पलें, कॉपियां और क्लास के लिए अन्य जरूरी सामान खरीद कर दिए। धीरे-धीरे इस पहल ने अभियान का रूप ले लिया और अब वहां गरीब-अमीर के बीच मिलनसारिता देख सकते हैं।

रंजीत रामचंद्रन (28) का उदाहरण भी देखें। वह मराठी बोलने वाले जनजातीय समुदाय से है और जिंदगीभर कच्ची झोपड़ी में रहा है। उसे केरल के कासरगोड जिले में बीएसएनएल टेलीफोन एक्सचेंज में 4000 रुपए प्रतिमाह पर रात्रिकालीन चौकीदार की नौकरी मिली। छोटे भाई-बहन के पालन-पोषण के लिए पैसा जरूरी था। रंजीत ने पांच साल दिन में कॉलेज जाकर और रात में एक्सचेंज पर ड्यूटी कर ग्रैजुएशन और पोस्ट-ग्रैजुएशन किए। उसका मुख्य काम था कि पॉवर सप्लाई निर्बाध बनी रहे।

उसने कभी अपनी आरक्षित श्रेणी का उपयोग नहीं किया और फिर भी आईआईटी मद्रास में अंग्रेजी के ज्ञान के बिना प्रवेश पा लिया। उसने पीएचडी की और क्राइस्ट यूनिवर्सिटी बेंगलुरु में असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्त हुआ। लेकिन पिछले सोमवार वह आईआईएम रांची का प्रोफेसर बन गया। अब उसके पास पुराने काम पूरे कर रांची जाने के लिए 90 दिन हैं।

चेन्नई के तिरुवेंगडम के.एस. एक और योद्धा हैं, इसलिए नहीं कि वे सम्मानित कारगिल युद्ध के पूर्व सैनिक हैं। बल्कि इसलिए क्योंकि उन्होंने पार्किनसन्स डिजीज (पीडी) से लड़ने के लिए बढ़िया योजना तैयार की है, जो एक ब्रेन डिसऑर्डर है, जिसमें चलने और संतुलन बनाए रखने में परेशानी होती है। उन्हें 2020 में इसके होने का पता चला।

उन्होंने सबसे पहले रूफटॉप गार्डन बनाया, जहां वे ऑफिस जाने से पहले कुछ घंटे काम करते हैं। उनके मुताबिक इससे उन्हें मन को सकारात्मक बनाने में मदद मिलती है। फिर उन्होंने कुछ खेत खरीदे, जहां वे रविवार को खेती करते हैं। उन्होंने स्थानीय कुत्तों की ब्रीडिंग भी शुरू की है। अपनी फिजियोथेरेपी और नियमित दवाई को लेकर वे बहुत सक्रिय हैं, इससे उन्हें पीडी को जीतने का आत्मविश्वास मिलता है।

ज्यादातर डॉक्टर मानते हैं कि जल्दी पहचान, अभ्यास, फिजियोथेरेपी और सही सपोर्ट सिस्टम तथा उचित मेडिकल हस्तक्षेप आदि से पीडी पर आसानी से विजय पाई जा सकती है। लेकिन इसका सबसे जरूरी नियम है सभी चीजें नियमित करना। फंडा यह है कि जिंदगी में कुछ भी हासिल करने के लिए कठिन डगर पर चलना होता है। इस सिद्धांत से कोई समझौता संभव नहीं है।

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