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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:आज कोयले की कमी के कारण बहुत बड़ा ऊर्जा संकट हमारे सामने आ गया है, हर प्रकार के संकट में प्रकृति द्वारा ही हम बचाए जा सकते हैं

15 दिन पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

सलीम जावेद और यश राज चोपड़ा की बहुसितारा फिल्म ‘काला पत्थर’ कोयले की खदान में काम करने वालों की कथा थी। गौरतलब है कि फिल्म में अमिताभ बच्चन द्वारा अभिनीत पात्र कुछ समय पूर्व पानी के जहाज में काम करता था, परंतु एक बार खतरे की घंटी सुनकर वह लाइफ बोट से भागकर सुरक्षित जगह पहुंचता है। लेकिन वह दुर्घटना घटी नहीं, इसलिए उसे भगोड़ा घोषित कर दिया गया। गोया कि अब वह नई पहचान के साथ कोयला खदान में काम करने लगता है। यह पात्र उपन्यास ‘लॉर्ड जिम’ की प्रेरणा से रचा गया है।

अमिताभ बच्चन अभिनीत पात्र अपने माथे पर लगे भगोड़े के कलंक को धोना चाहता है। फिल्म के अंतिम भाग में कोयले की खदान में पानी भरने लगता है और मजदूरों की जान को खतरा हो जाता है। अमिताभ अभिनीत पात्र जिस पर भगोड़ा होने का कलंक था वह अन्य पात्रों के साथ मजदूरों को बचाता है। इस तरह मुख्य पात्र कलंक से मुक्ति पाता है ।

इस फिल्म में अमिताभ बच्चन, शत्रुघ्न सिन्हा और शशि कपूर अभिनीत पात्रों को समान महत्व दिया गया है। यह प्रस्तुत किया गया है कि बच्चन और सिन्हा अभिनीत पात्रों के बीच आपसी रंजिश है और शशि कपूर अभिनीत पात्र दोनों के बीच शांति बनाए रखने का प्रयास करता है।

इस फिल्म की अधिकांश शूटिंग राज कपूर के ग्राम लोनी स्थित फार्म हाउस में की गई है। राज कपूर की फिल्म ‘संगम’ का पार्श्व संगीत, लोनी में ही रचा गया और मुंबई में रिकॉर्ड किया गया। ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ में बाढ़ के सीन यहीं पर फिल्माए गए थे। बहरहाल, आज कोयले की कमी के कारण बहुत बड़ा ऊर्जा संकट हमारे सामने आ गया है।

सूर्य के ताप से ऊर्जा उत्पादन के कार्य पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। इसी तरह पवन चक्कियां नहीं बनाई गईं। हर प्रकार के संकट में प्रकृति द्वारा ही हम बचाए जा सकते हैं। हमने धरती को इतना अधिक लूटा कि प्रकृति हमसे खफा हो गई। प्रकृति को मनाने के लिए हमें पेड़ लगाना चाहिए। जीवन शैली में सादगी लाने से भी प्रकृति प्रसन्न हो सकती है। हमें अपनी विचार शैली में तर्क और विज्ञान को महत्व देना चाहिए। सारांश यही है कि गांधीजी के आदर्श पर और कुशल व योग्य लोगों की वैज्ञानिक सोच के साथ हमें लक्ष्य तक पहुंचना चाहिए।

किसी अन्य गोले पर नई व्यवस्था खड़ी करने के प्रयास से प्रेरित विज्ञान फंतासी रची जाती हैं। धरती को संवारना ही अधिक आवश्यक है, क्योंकि हम अपनी कमजोरी से अन्य गोले को भी नष्ट कर देंगे। मनुष्य की विचार प्रक्रिया से ही प्रकृति को समझकर मनुष्य के पक्ष में लाना होगा। कोयला संकट को अन्य कमतरियों से अलग करके उसका हल नहीं निकलेगा। सोच-विचार में समग्रता आवश्यक है। कोयले के संकट से अनुमान लगता है कि धरती के भीतर अब हीरे भी नहीं हैं। हीरे तो पहले ही हड़प लिए गए हैं।

विश्व का तापमान एक डिग्री बढ़ा है और सब बेहाल हो गए हैं। जलवायु परिवर्तन तरह-तरह के रोग दे रहे हैं। हम जितनी दफा दवा दे रहे हैं, उससे मर्ज बढ़ता ही जा रहा है। प्रकृति की किताब को प्रकृति द्वारा सुझाए ढंग से पढ़े जाने का प्रयास करना चाहिए। हमने स्वयं ही बातों को पेचीदा कर दिया है। घर में लगाए गए बोनसाई से प्रकृति संवरण नहीं होगा। धीरे-धीरे सारा सोच-विचार ही बोनसाई होता जा रहा है। अपने बौनेपन से हम सब विराट चीजों को छोटा कर रहे हैं। बोनसाई महज सजावट नहीं रहते हुए हमारे भीतर संसार में दूर तक जा बसे हैं।

नीम और पीपल के वृक्ष लगाने से लाभ हो सकता है। ऑर्गेनिक शैली से की गई खेती हमें निरोगी रख सकती है। ज्ञातव्य है कि कोयला संकट से जुड़ी बातों पर फंतासी ‘द टॉवरिंग इनफर्नो’ और ‘जर्नी टू द सेंटर ऑफ अर्थ’ नामक फिल्में पहले ही बन चुकी हैं।