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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:आज का युवा काल्पनिक और गलत अनुवाद की शिकार माइथोलॉजी को ध्वस्त कर नया सच्चा गणतंत्र सामने लाएगा

3 महीने पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

स्वरा भास्कर ने एक सत्य घटना प्रस्तुत की है कि महानगर में उसकी सेविका निष्ठा से घर के काम करती है। वह स्वादिष्ट भोजन बनाती है। उसे यह पसंद नहीं कि मालिक बाजार से फास्ट फूड बुला लेता है। आस-पड़ोस में किसी के बीमार होने की बात जानते ही वह दादी-नानी से सुने नुस्खे से घरेलू दवा बनाकर मरीज को पिलाती है।

दुःख-दर्द और पड़ोस से घरेलू उपचार द्वारा इलाज करने का उसे जुनून है। स्वरा भास्कर और पास पड़ोस के लोग मन ही मन उसके जुनून पर हंसते हैं परंतु कोई उसका दिल नहीं तोड़ता। हल्दी, दालचीनी और प्याज का रस उसकी इलाज प्रक्रिया के अंग हैं। सोते समय नाक में सरसों का तेल डालती है। मालिक उल्टी करवट सोने का स्वांग करता है।

नेट पर प्रस्तुत एक अन्य कार्यक्रम में इसी तरह की महानगर में काम करने वाली सेविका नौकरी छोड़कर अपने गांव में पंचायत का चुनाव लड़ने जाती है। वह मालिक से निवेदन करती है कि पंचायत का चुनाव जीतने पर शपथ लेते समय वे गांव आएं। अरसे पहले ग्राम पंचायत में एक महिला चुनाव लड़ी परंतु जीतने के बाद उसका पति ही सारे निर्णय लेता था। वह डमी बन कर रह जाती है। विकास फंड में घपला उजागर होने पर बेचारी पत्नी जेल जाती है।

स्वरा भास्कर के विवरण में संकेत बंगाल में हो रहे चुनाव का हो सकता है। क्या यह संभव है कि ऐसा शिक्षा संस्थान बनाया जाए जहां राजनीति में जाने की इच्छा रखने वाले छात्र पढ़ें। हर विधा की तरह यहां भी सीखा और सिखाया जाए। इस उपाय में भी कठिनाई यह है कि शिक्षक कहां मिलेंगे और पाठ्यक्रम कौन बनाएगा? प्रेमचंद्र जी की कथा ‘पंच परमेश्वर’ में धर्मनिरपेक्षता के मूल्य की बात प्रस्तुत हुई है।

वर्तमान में तो प्रायोजित आस्था का जोर है। कोरोना वायरस पहले ही रोकने की दवा और वैक्सीनेशन में भी कोटा देने का मानदंड रहस्यमय लगता है। एक निराधार शंका है कि कहीं चुनाव मतगणना के गहरे अध्ययन से ज्ञात किया गया हो कि किस क्षेत्र में क्या झुकाव रहा हो और इसी के अनुरूप अस्पतालों को दवा उपलब्ध कराई जाए। दवा वितरण पर व्यवस्था का संपूर्ण नियंत्रण बना हुआ है।

आज कुछ भी सप्रमाण नहीं प्रस्तुत किया जा सकता। नेट पर प्रस्तुत कार्यक्रम ‘सर’ में नौकरानी का पात्र महानगर में घर की सफाई करती है। भोजन भी पकाती है। गांव से आई सेविका का पात्र अभिनीत करने वाली कलाकार प्रारंभ में अत्यंत साधारण दिखती है। कथा प्रवाह में मालिक उससे प्रेम करने लगता है। वह फ्रेम दर फ्रेम सुंदर होते हुए इच्छा जगाने वाली महिला दिखने लगती है।

राजनैतिक स्वतंत्रता मिलने के बाद सीमित धन के कारण विकास कार्यक्रम में शहरों का प्राथमिकता दी गई। रोजी-रोटी की तलाश में ग्रामीण क्षेत्र के लोग महानगरों की ओर आए। गगनचुंबी इमारतों के पास झुग्गी झोपड़ी विकसित हुईं। मुंबई में एशिया का सबसे बड़ा स्लम एरिया बना। साधन संपन्न को सेवकों की आवश्यकता पड़ी। गरीबी को प्रोडक्ट की तरह बनाया गया।

राज कपूर की ‘आवारा’, ‘श्री 420’ और ‘जागते रहो’ में गांव से पलायन करके महानगर आए लोगों की कथा प्रस्तुत की गई। गुरुदत्त ने ‘साहब बीवी और गुलाम’ के अंतिम सीन में दिखाया कि पढ़ने वाले युवा इंजीनियर बनकर सामंतवादी महल के मलबे में नर कंकाल के रूप मिलता है। ध्वस्त महल का मलबा साफ करके आम रास्ता बनाया जाएगा। गोयाकि सामंतवाद की जगह गणतंत्र आ गया।

वर्तमान समय में महामारी के प्रथम चरण में उद्योग बंद हुए। कर्मचारी गांव लौटने लगे। कुछ की मृत्यु हो गई। पहले मलेरिया, माता, पोलियो इत्यादि के बचपन में टीके लगाए जाते थे। आज कोरोना वैक्सीनेशन कार्यक्रम तीव्र गति से चल रहा है। संभव है कि गर्भ में पनप रहे शिशु को भी निरोधक दवा या इंजेक्शन दिया जाए। आज का युवा कंप्यूटर, विज्ञान का अध्ययन करते हुए भविष्य में काल्पनिक तथा गलत अनुवाद का शिकार माइथोलॉजी को ध्वस्त करके तर्क सम्मत विचार वाली नई धारा का विकास करके पूरा जीवन बदल देगा। नया सच्चा गणतंत्र सामने आएगा।

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