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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:त्रिभंगा: मां बेटी के रिश्ते की फिल्म, पुरुष शासित समाज में मां और बेटी के रिश्ते पर अपेक्षाकृत कम काम हुआ

2 वर्ष पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

‘त्रिभंगा’ नामक फिल्म में काजोल ने मां और बेटी की दोहरी भूमिकाएं अभिनीत की हैं। यह हाल ही में बनी फिल्म है। ज्ञातव्य है कि शोभना समर्थ की बेटी नूतन ने बड़ा प्रभावोत्पादक अभिनय किया है। बिमल रॉय की ‘सुजाता’ और ‘बंदिनी’ नूतन की श्रेष्ठ फिल्में मानी जाती हैं। शोभना समर्थ अत्यंत लोकप्रिय कलाकार रही हैं।

उन्होंने ‘राम राज्य’ में सीता की भूमिका अभिनीत की थी। ज्ञातव्य है कि काजोल की मां तनुजा ने अजय देवगन अभिनीत ‘सन ऑफ सरदार’ में महत्वपूर्ण चरित्र भूमिका अभिनीत की थी। तनुजा ने राज कपूर की फिल्म ‘प्रेम रोग’ में नायिका पद्मिनी की मां की भूमिका की थी। ‘त्रिभंगा’ मां और बेटी की कथा है। पिता-पुत्र और माता-पुत्र, रिश्ते पर बहुत फिल्में बनी हैं। परंतु, पुरुष शासित समाज में मां और बेटी के रिश्ते पर अपेक्षाकृत कम काम हुआ है। इस कारण ‘त्रिभंगा’ का महत्व बढ़ जाता है। ज्ञातव्य है कि सुचित्रा सेन की बेटी मुनमुन सेन ने भी अभिनय किया है।

सुचित्रा सेन ने ‘सरहद’, ‘मुंबई का बाबू’ ‘ममता’ और गुलजार की कमलेश्वर के उपन्यास से प्रेरित फिल्म ‘आंधी’ में अभिनय किया था। सुचित्रा ने अभिनय छोड़ने के बाद अपनी निजता की रक्षा हॉलीवुड की इंग्रिड बर्गमैन की तरह की है। खाकसार की लिखी एक फिल्म में मां और बेटी के रिश्ते की कथा थी।

निर्माता रमेश बहल के साथ मुनमुन के कहने पर खाकसार कोलकाता गया था। मुनमुन के बहुत प्रयास के बाद भी सुचित्रा सेन ने हम लोगों से मिलना स्वीकार नहीं किया। उस कथा का सारांश यह है कि मां एक सुपरस्टार रही है। पुत्री भी अभिनय क्षेत्र में है। मां को दादा फाल्के पुरस्कार देने की घोषणा हुई है, परंतु वह अपनी निजता के कारण दिल्ली जाकर पुरस्कार लेना नहीं चाहती।

पुत्री का प्रेमी योजना बनाता है कि युवा पुत्री का मेकअप करके उसे मां की तरह बनाया जा सकता है, क्योंकि उनके चेहरे-मोहरे में कुछ समानता तो है। इस तरह पुत्री, मां जैसी दिखने का मेकअप करके दिल्ली जाती और पुरस्कार ग्रहण करती है। मां अखबार नहीं पढ़ती, टेलीविजन नहीं देखती। अतः वह सत्य नहीं जानती।

पुत्री का मां के रूप में गेटअप इतना लोकप्रिय होता है कि उसे मां की भूमिकाएं मिलने लगती हैं। वह एक ‘मदर इंडिया नुमा’ फिल्म में अभिनय करके राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त कर लेती है। वह अपने इसी स्वरूप की सफलता और ग्लैमर से चिपके रहना चाहती है। इस कारण उसका प्रेमी नाराज है कि उनका विवाह जाने कब होगा। वह तो अपनी सितारा प्रेमिका का सचिव बनकर रह गया है। इस आकल्पन में यह भी संभव है कि मां अपनी बेटी की पुत्री की भूमिका अभिनीत करे। वह प्रोस्थेटिक मेकअप विद्या का सहारा ले सकती है।

इस कथा में यह नाटकीय मोड़ भी दिया जाता है कि अपने सचिव बने प्रेमी की नाराजगी देखकर भी अपने सच्चे रूप में आना चाहती है परंतु लोकप्रिय मां की छवि रचने में एक पात्र गढ़ा गया है। ज्ञातव्य है कि संजीव कुमार और जीनत अमान अभिनीत शम्मी कपूर द्वारा निर्देशित फिल्म ‘मनोरंजन’ में संजीव कुमार एक उम्रदराज नवाब का रूप धारण करके जीनत अमान से मिलने जाता है।

फिल्म में जीनत का पात्र एक तवायफ का है। उसी मोहल्ले में संजीव अभिनीत पात्र का एक पुलिस सब इंस्पेक्टर है। तवायफ और पुलिस वाले की प्रेमकथा शांताराम जी ने ‘आदमी’ के नाम से 1940 में बनाई थी। हॉलीवुड में शर्ले मैकलीन अभिनीत फिल्म ‘इरमा लॉ डूज’ 1963 में प्रदर्शित हुई। शम्मी कपूर द्वारा निर्देशित फिल्म ‘मनोरंजन’ 1973 में बनी।

मनोरंजन क्षेत्र भी पृथ्वी की तरह अपनी धुरी पर घूमते हुए अंतरिक्ष में भी सूर्य के गिर्द घूमता है। इसी तरह ‘आदमी’ ‘इर्मा ला डूस’ और ‘मनोरंजन’ नामक फिल्में बनी हैं। काजोल अभिनीत ‘त्रिभंगा’ मां और बेटी के रिश्ते से प्रेरित है। शोभना समर्थ से प्रारंभ में प्रतिभा का सिलसिला तनुजा से होते हुए काजोल तक जा पहुंचा है।