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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:वस्त्रनुमा इस देह को ही खुद समझ लेना जीवन को और अधिक जटिल बनाता है

15 दिन पहले
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पं. विजयशंकर मेहता - Dainik Bhaskar
पं. विजयशंकर मेहता

मनुष्य का जीवन बड़ा जटिल है। इसे सरल बनाना पड़ता है। खास तौर पर शरीर को लेकर वह कुछ ऐसे प्रयोग करता है कि जीवन और जटिल हो जाता है। अपनी ही देह के प्रति स्वार्थी बनना और दूसरे के शरीर के प्रति भोगी हो जाना इंसान की फितरत है। चूंकि हम पूरी जिंदगी ज्यादातर मौकों पर शरीर पर ही टिके रहते हैं, इसलिए आगे जाकर आत्मा का महत्व समझ नहीं पाते।

हमारी आत्मा ने शरीर को वस्त्र की तरह पहन रखा है। वस्त्रनुमा इस देह को ही खुद समझ लेना जीवन को और अधिक जटिल बनाना है। रामजी ने वानर-भालुओं को विभीषण द्वारा विमान से बरसाए कपड़े पहनते हुए देखा और जो दृश्य उपस्थित हुआ, उस पर तुलसीदासजी नेे लिखा- ‘भालु कपिन्ह पट भूषन पाए। पहिरि पहिरि रघुपति पहिं आए।। नाना जिनस देखि सब कीसा। पुनि पुनि हंसत कोसलाधीसा।। सारे वानर-भालू कपड़े-गहने पहनकर रामजी के सामने आए तो उनको देखकर भगवान बार-बार खूब हंसे।

राम उन वानरों पर ही नहीं हंसे थे, आज हमारे ऊपर भी हंस रहे हैं। जब हम अपनी देह के प्रति समझ नहीं रखते तो ऊपर वाला हंसता है कि इन्होंने शरीर को ही सबकुछ मान लिया है, जबकि ये आत्मा हैं। जिसने देह के प्रति होश जगा लिया, उसे जीवन में क्या पकड़ना और क्या छोड़ना है, यह अच्छे से समझ में आ जाएगा। शरीर की सही समझ का दूसरा नाम स्वास्थ्य है..।