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एन. रघुरामन का कॉलम:जब तक पुलिस को प्रशिक्षित स्टाफ, अत्याधुनिक हार्डवेयर और लोगों को डेडिकेटेड हेल्पलाइन नहीं मिल जाती; साइबर अपराधों से तुरंत सावधान हो जाएं

एक महीने पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

सर्दी-खांसी का मौसम चल रहा है और हमें सा‌वधानी रखनी होगी! मौसम बदलने के साथ शायद ये मामले कम हो जाएं, पर साइबर अपराधों का मौसम नहीं बदलने वाला। ये अपराध जारी रहेंगे बल्कि मामले बढ़ेंगे ही और आने वाले कई सालों तक ये अनबूझे रहने वाले हैं। इसलिए इसके खिलाफ सावधानी रखना भी उतना ही जरूरी है। ऐसा क्यों है, आइए मैं आपको कुछ उदाहरण देता हूं।

1. कोई नहीं जानता कि वह 41 साल का युवराज भोसले है या राजवीर या सतीश बोरुड या वीरेंद्र क्योंकि उसने इन अलग-अलग नामों से कई वैवाहिकी वेबसाइट्स पर आईडी बनाई। वह शादी का झांसा देकर ठगी, ब्लैकमेलिंग, जबरन वसूली जैसे कई मामलों में शामिल है। सिर्फ चार पीड़ितों से उसने एक करोड़ रु. वसूल लिए। बता दें कि वह क्रिमिनल साइकोलॉजी में स्नातक है और एलएलबी की डिग्री भी है। पीड़ितों से बातचीत के दौरान उसने कभी खुद को आईपीएस का बेटा बताया तो कभी इंटेलिजेंट ब्यूरो अधिकारी, आईटी कंपनी का निदेशक, कभी एड फिल्ममेकर...ये सूची लंबी है। पुलिस ने पाया कि उसने गिरफ्तारी से बचने के लिए राजपत्रित दस्तावेजों तक में अपना नाम बदल लिया। कुलमिलाकर पुलिस ने स्वीकार किया कि वह एक स्मार्ट अपराधी है।

2. एक अन्य मामले में सुनने-बोलने में अक्षम एक व्यक्ति पुणे साइबर क्राइम पुलिस के बिछाए जाल में फंस गया, उस पर एक-दो नहीं बल्कि 550 दृष्टि-श्रवण बाधित लोगों से ठगी का आरोप है। ये पता नहीं कि अपराधी ने उन लोगों में भाई-बंधु वाली भावना जगाकर इसे अंजाम दिया या वो सिर्फ एक शातिर आदमी था, पर ये जरूर साफ हो गया है कि सिर्फ चेहरे-मोहरे से किसी पर भरोसा नहीं करना चाहिए। मल्टी लेवल चैन मार्केटिंग स्कीम से 4.5 करोड़ रु. ठगे गए, जहां देशभर के दिव्यांगों से अच्छे रिटर्न का वादा करके आरोपी सुयोग मेहता ने धोखा किया।

3. अब एक नया ट्रेंड है, जहां ठग आसानी से शिकार होने वाले अस्पताल में भर्ती लोगों के परिवार को टारगेट करते हैं। किडनी प्रत्यारोपण के लिए क्राउडफंडिंग कर रहे एक मरीज से आठ हजार रु. की ठगी का मामला लें। ऑनलाइन सर्च इंजिन डायरेक्ट्री में रूबी हॉल क्लीनिक, पुणे का पंजीकृत नंबर 7947168735 है। मरीज ने इस पर फोन किया और उसे वापस एक दूसरे नंबर 9827636084 से फोन आया और कहा कि उसे अस्पताल में रजिस्टर होने के लिए दस रु. का यूपीआई पेमेंट करना होगा। जब मरीज ने उससे फंडिंग के बारे में पूछा तो ठग ने कहा कि वह अस्पताल करेगा और शेयर की हुई लिंक पर जानकारी भरने के लिए कहा। जब पीड़ित ने जानकारी भरी, तो पैसे उसके खाते से कट गए।

आपको ताज्जुब हो रहा होगा कि साइबर अपराधों की ऐसी कहानियां सामान्य सर्दी-खांसी से ज्यादा खतरनाक कैसे हैं? यहां समरूपता है। देश में सर्वश्रेष्ठ माने जानी वाली मंुबई पुलिस इस साल 31 अक्टूबर तक रजिस्टर्ड साइबर अपराधों में से सिर्फ 15% ही सुलझा पाई हैै, 2,369 में से 657 केस में गिरफ्तारी हुई।

मुंबई के पूर्व कमिश्नर और महाराष्ट्र के डीजीपी रहे सेवानिवृत्त आईपीएस डी. शिवनंदन कहते हैं कि साइबर जांच में योग्य अधिकारी कम हैं। आईटी एक्ट के अनुसार जांच अधिकारी कम से कम इंस्पेक्टर लेवल का होना चाहिए और उनकी संख्या भी कम है। उनका मानना है कि भविष्य के सारे अपराध साइबर आधारित होंगे और थाने इससे अनभिज्ञ हैं और पुलिस अप्रशिक्षित। इसलिए पूरे पुलिस महकमे को साइबर टेक्नोलॉजी में अपग्रेड होना जरूरी है। फंडा यह है कि जब तक पुलिस को प्रशिक्षित स्टाफ, अत्याधुनिक हार्डवेयर और लोगों को डेडिकेटेड हेल्पलाइन नहीं मिल जाती, आपको और मुझे इन बढ़ते वाइट कॉलर अपराधों के प्रति सावधानी रखनी होगी।