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विराग गुप्ता का कॉलम:बेवजह की गिरफ्तारियां स्वतंत्रता पर हमला हैं, गलत गिरफ्तारियों और पुलिस उत्पीड़न पर सुप्रीम कोर्ट पहल करे

8 दिन पहले
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विराग गुप्ता, सुप्रीम कोर्ट के वकील और ‘अनमास्किंग वीआईपी’ पुस्तक के लेखक - Dainik Bhaskar
विराग गुप्ता, सुप्रीम कोर्ट के वकील और ‘अनमास्किंग वीआईपी’ पुस्तक के लेखक

पश्चिम बंगाल में टीएमसी के मंत्री और विधायकों की गिरफ्तारी मामले पर हाईकोर्ट के 5 जजों की बेंच कई दिनों से सुनवाई कर रही है। भीमा कोरेगांव मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सीआरपीसी कानून की धारा 167 के तहत हाउस अरेस्ट की व्यवस्था पर मजबूत मुहर लगाई है। इसके बावजूद टीएमसी के नेताओं को हिरासत में लेने के लिए सीबीआई की बेचैनी कानून के लिहाज से खतरनाक है।

जमानत के मामलों का फैसला सामान्यतः हाईकोर्ट के एक जज की बेंच द्वारा हो जाता है, लेकिन पश्चिम बंगाल के नारद कांड में फंसे टीएमसी नेताओं की बेल के मामले में हाईकोर्ट को 5 जजों की बेंच बनानी पड़ी। जजों ने सॉलिसिटर जनरल से पूछा कि पिछले 7 सालों से चल रही जांच के दौरान इन नेताओं को गिरफ्तार नहीं किया गया तो अब गिरफ्तारी पर इतना जोर क्यों है? इसका सीधा जवाब देने की बजाय, केंद्र सरकार ने इस मामले की सुनवाई को दूसरे राज्य में करवाने की अजब मांग कर डाली।

सीबीआई केंद्र सरकार के अधीन आती है, लेकिन पुलिस तो राज्यों का विषय है। देश के अधिकांश राज्यों में अलग-अलग पार्टियों की सरकारों के दौर में बेवजह अरेस्ट के मामलों में इजाफा होना, कोरोनावायरस से भी ज्यादा घातक है। जवाबी हमले में ममता बनर्जी ने भाजपा नेताओं के खिलाफ चोरी जैसे मामलों में एफआईआर दर्ज करवा दी।

धुर दक्षिण के केरल में कम्युनिस्ट सरकार ने भी भाजपा नेताओं पर पुलिस का डंडा भांजना शुरू कर दिया है। शिवसेना और कांग्रेस शासित महाराष्ट्र में गिरफ्तारी से बचने के लिए सीनियर आईपीएस अधिकारी परमबीर सिंह हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की शरण में पहुंच गए हैं। मध्य प्रदेश में पुलिस के डंडे से कांग्रेसी नेताओं को बचाने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने पेनड्राइव का सफल जवाबी दांव चल दिया। कानपुर में राजनेता से माफिया बने विकास दुबे के एनकाउंटर के बाद उसके परिवार की 4 महिलाएं पिछले 10 महीने से जेल में बंद हैं।

सत्तारूढ़ भाजपा के एमएलसी उमेश द्विवेदी ने यूपी के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर कहा है कि निर्दोष महिलाओं पर जबरन केस थोपकर उनपर अंग्रेजों के जमाने से ज्यादा जुल्म हो रहे हैं। भाजपा विधायक की चिट्ठी से साफ है कि आजादी के 75वें साल के लोकतांत्रिक भारत में पुलिस का सिस्टम अभी भी अंग्रेजी हुकूमत की तरह दमनकारी है। अंग्रेजों ने पुलिसिया खाकी के डंडे के जोर पर भारत में 200 साल राज्य किया। आजादी के बाद खाकी ने खादी के साथ हाथ मिला लिया जो अब लोकतंत्र और कानून के शासन के लिए सबसे बड़ा नासूर बन गया है।

टीवी मीडिया और राजनीतिक विरोधियों के लिए गिरफ्तारी एक खेल है, लेकिन निरीह आम जनता के लिए गिरफ्तारी जीवन भर का नासूर। इस समस्या के कई पहलुओं पर विधि आयोग और सुप्रीम कोर्ट ने लाखों पन्ने रंग दिए, लेकिन अभी तक कोई सुधार नहीं हुआ।

पुलिस का मानना है कि गंभीर अपराध के आरोप या शिकायतों पर एफआईआर और उसके बाद गिरफ्तार करना पूरी तरह से कानून सम्मत है। लेकिन राजनेताओं के इशारों पर कारवाई या चुप्पी साधने के बढ़ते प्रचलन के बाद कानून की दुहाई का तर्क बेहद बौना और घिनौना नजर आता है। सीआरपीसी के तहत पुलिस के सामने दिए गए बयान की कानूनी अहमियत नहीं है।

सबूत इकठ्ठा करने की बजाय हिरासत में लेकर जांच करने पर पुलिस के रवैये को जजों का रोबोटिया अनुमोदन मिलने से यह समस्या विकराल हो गयी है। सन 2014 में अर्नेश कुमार मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के अनुसार आरोपी यदि नया अपराध करने की फिराक में हो, सबूतों को नष्ट कर सकता हो या गिरफ्तारी के बगैर उसे अदालत के सामने पेश करना मुश्किल हो। उन्हीं मामलों में गिरफ्तारी पर जोर दिया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने 2020 के नवीनतम फैसले से फिर साफ किया है कि जेल भेजने के मामलों में मजिस्ट्रेट और जजों को विस्तृत और कानून सम्मत आदेश पारित करना चाहिए। लेकिन ऐसे फैसले लाइब्रेरी की किताबों में ही कैद रहते हैं। इसलिए अब 2016 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार गलत गिरफ्तारी के लिए जिम्मेदार हर पुलिस अधिकारी से हर्जाना वसूलने की परिपाटी शुरू करनी चाहिए। पुलिस यदि बेवजह गिरफ्तार कर भी ले तो सुप्रीम कोर्ट के 1978 के फैसले के अनुसार आरोपी को जेल की बजाए बेल मिलनी चाहिए।

संविधान के तहत सुप्रीम कोर्ट का फैसला देश का कानून माना जाता है। इसलिए गलत गिरफ्तारी के हर मामले में जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट को अवमानना मामला शुरू करने की पहल करनी चाहिए। बेवजह और गलत गिरफ्तारी जीवन की स्वतंत्रता के संवैधानिक हक पर सबसे बड़ा और संगठित हमला है। गलत गिरफ्तारी रोकने के लिए कानून के चक्के को पूरे देश में सही रास्ते पर चलाने की जरूरत है। इससे आम जनता को पुलिस के उत्पीड़न से और अदालतों को मुकदमों के बोझ से बड़ी राहत मिल सकती है।

बेल नियम जेल अपवाद
सुप्रीम कोर्ट ने 2020 के फैसले में साफ किया है कि जेल भेजने के मामलों में जजों को कानून सम्मत आदेश पारित करना चाहिए। 2016 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार गलत गिरफ्तारी के लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारी से हर्जाना वसूलने की परिपाटी शुरू करनी चाहिए। बेवजह गिरफ्तारी हो तो सुप्रीम कोर्ट के 1978 के फैसले के अनुसार आरोपी को जेल की बजाए बेल मिलनी चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)