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थाॅमस एल. फ्रीडमैन का कॉलम:अमेरिकी-इजरायली इस सवाल में उलझे हैं कि ‘देश किसका है?', नागरिकों को यह पूछना चाहिए कि हम मिलकर क्या कर सकते हैं

3 महीने पहले
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थाॅमस एल. फ्रीडमैन, तीन बार पुलित्ज़र अवॉर्ड 
विजेता एवं ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ में नियमित स्तंभकार - Dainik Bhaskar
थाॅमस एल. फ्रीडमैन, तीन बार पुलित्ज़र अवॉर्ड विजेता एवं ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ में नियमित स्तंभकार

इस समय इजरायल सत्ताधारी गठबंधन को बनाए रखने में संघर्ष कर रहा है। इस बीच मैंने एक टीवी रिपोर्ट देखी, जिसमें अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स (हरेदी यहूदी) धर्मगुरु और यूनाइडेट तोरह ज्यूडाइज्म के आध्यात्मिक नेता ने कहा कि वे दक्षिणपंथी यहूदी पार्टियों की तुलना में इजरायल की इस्लामी राम पार्टी के समर्थन वाली सरकार ज्यादा पसंद करेंगे क्योंकि इजरायली अरब विधिनिर्माताओं की सभी को धर्मनिरपेक्ष बनाने की कम संभावना है।

यह बताता है कि आज इजरायली राजनीति कितनी ध्रुवीकृत है और क्यों इजरायल ने दो साल के अंदर चौथा अनिर्णायक चुनाव आयोजित किया और जल्द 5वां चुनाव भी हो सकता है। जो इजरायल में हो रहा है, वैसे ही राजनीतिक ध्रुवीकरण में अमेरिका फंसा है। जहां एक साझा राष्ट्रीय कथानक की कमी है, जो 21वीं सदी की यात्रा के लिए देश को प्रेरित करे।

मशहूर लेखक डॉव सीडमैन कहते हैं, ‘इजरायल और अमेरिका दोनों ऐसे राष्ट्र हैं, जिन्होंने स्व-घोषित विचारों और आदर्शों के नाम पर खुद को जन्म दिया। जब आपका देश एक महत्वाकांक्षी मानव परियोजना है, तो इसके लिए कुछ गहरी चीजें साझा करना जरूरी है, जैसे स्वतंत्रता और न्याय के मूलभूत सिद्धांत। अभी, दोनों देशों में, उन गहरी चीजों को न केवल खंडित किया गया, बल्कि ध्रुवीकरण उद्योग द्वारा तोड़ा जा रहा है, जो इन परियोजनाओं के फलने-फूलने के लिए जरूरी सच्चाई और विश्वास पर हमला कर रहा है। ऐसे में इजरायली और अमेरिकी सवाल कर रहे हैं कि आगे उनके साझा जुड़ाव का आधार क्या होगा?’

दोनों लोकतंत्रों के सामने कुछ चुनौतियां हैं। अमेरिका के लिए शीत युद्ध और इजरायल के लिए अरब-इजरायल संघर्ष के खतरे के कारण दोनों देश जुड़े रहते थे। यह जुड़ाव अब लगभग गायब है। दोनों समाजों में काफी सोशल नेटवर्क हैं, जिससे उन पर शासन मुश्किल होता जा रहा है, क्योंकि जिस तरह इन नेटवर्कों ने पारंपरिक सूचना प्रदाताओं को खत्म कर दिया है, इससे सत्य और विश्वास के मापदंड भी खत्म हो गए हैं।

दोनों समाजों में ध्रुवीकरण करने वाले, मीडिया मित्र लोकप्रिय नेता हैं, जो सभी नियमों को तोड़ने और न्यायाकि व्यवस्था कमजोर करने के लिए तैयार हैं। वास्तव में नेतन्याहू और ट्रम्प, दोनों इतना ध्रुवीकरण करने वाले थे कि अपनी ही पार्टी में फूट डाल दी। अंत में दोनों समाजों में लंबे समय से हो रहे जनसांख्यिकीय बदलाव तेजी पर हैं। अनुमान है कि अमेरिका 2045 तक ‘बहुसंख्यक अल्पसंख्यक’ देश हो जाएगा, जहां श्वेतों की आबादी में 49.9% हिस्सेदारी हो जाएगी।

नए बहुसंख्यकों में हिस्पेनिक, अश्वेत और एशियाई शामिल होंगे। इससे ध्रुवीकरण और बढ़ेगा। ट्रम्प की पार्टी ने इसी डर का फायदा उठाने की कोशिश की। उधर दक्षिणपंथियों ने विपरीत दिशा में अति की। वे लगातार लोगों को उनकी नस्ल, हैसियत आदि से परिभाषित करते रहे, अमेरिकियों के साझा गुण से नहीं।

उधर इजरायल में जनसांख्यिकीय बदलाव में हरेदी यहूदी आबादी का बढ़ना शामिल है। तेल अवीव यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री डैन बेन-डेविड कहते हैं, ‘इजरायल के आधे बच्चों, मुख्यत: हरेदी यहूदी, इजरायली और गैर-हरेदी यहूदी, को तीसरी दुनिया के स्तर की शिक्षा मिल रही है और वे सबसे तेजी से बढ़ती आबादी का हिस्सा हैं। उनके लिए शिक्षा कानूनी रूप से अनिवार्य भी नहीं है और गरीबी इतनी है कि वहां की आधी वयस्क आबादी कर नहीं चुकाती। ऐसा जारी रहा था यह धरती का सबसे ज्यादा हिंसा वाला क्षेत्र बन जाएगा।’

बेन-डेविड कहते हैं कि ऐसा न हो, इसके लिए जरूरी है कि हरेदी समुदाय पर भी वहीं नियम लागू हों जो बाकी इजरायली समाज पर होते हैं। और ऐसा करने के लिए जरूरी है कि सभी गैर-हरेदी पार्टियां, जिन्होंने पिछले चुनाव में सीटें जीतीं, वे ऐसी सरकार बनाएं, जो ‘नेतन्याहू को हटाए, साथ ही हरेदी पार्टियों को भी, जिनपर नेतन्याहू निर्भर हैं।’ उनको आधारभूत संवैधानिक सुधारों पर सहमत होना होगा जो राजनीतिक तंत्र को बदलें, ताकि भविष्य की सरकारें क्षणिक राजनीतिक लाभ के लिए इजरायल के भविष्य को हरेदियों के पास गिरवी न रख सकें।

कुल मिलाकर 21वीं सदी के अमेरिका और इजरायल को नए सिरे से परिभाषित करना होगा कि बहुलवादी लोकतंत्र का क्या अर्थ है, वह भी ऐसे समय में जब उनकी आबादियां और अधिक विविध हो रही हैं। अभी, अमेरिकियों और इजरायलियों को पूछना चाहिए कि ‘हम मिलकर क्या कर सकते हैं।’ पर वे तो पूछ रहे हैं, ‘आखिर ये देश किसका है?’ दोनों परेशान रहेंगे, जब तक इस सवाल पर अटके रहेंगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)