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विराग गुप्ता का कॉलम:अंग्रेजों के जमाने से चल रही आउट-डेटेड कानूनी व्यवस्था से आज के समय में इंस्टैंट जस्टिस संभव नहीं

20 दिन पहले
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विराग गुप्ता, लेखक और वकील - Dainik Bhaskar
विराग गुप्ता, लेखक और वकील

लंबे अर्से बाद प्रधानमंत्री, कानून मंत्री, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के सभी चीफ जस्टिस के साथ राज्यों के मुख्यमंत्री एक मंच पर एकत्र हुए। प्रधानमंत्री ने आमजन के मनोभावों को व्यक्त करते हुए कहा कि लोगों को जल्द न्याय मिले तभी स्वराज आएगा। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने इस मर्ज के तीन पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की। पहला, अंग्रेजों के जमाने से चल रही जटिल कानूनी व्यवस्था से आज के समय में इंस्टैंट जस्टिस संभव नहीं है।

दूसरा, अदालतों में जजों की कमी के साथ जरूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं है। तीसरा, सरकारें जिम्मेदारियों का पालन नहीं करतीं, जिससे अदालतों को नीतिगत मामलों में हस्तक्षेप करना पड़ता है। संसद, सरकार या सुप्रीम कोर्ट- कोई भी लक्ष्मण रेखा लांघे, यह संवैधानिक दृष्टि से ठीक नहीं। लेकिन पहले लक्ष्मण रेखा को समझना जरूरी है। एक लाइन में कहें तो लक्ष्मण रेखा का निर्धारण संसद द्वारा बनाए कानून और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से होता है।

पुरानी कानूनी व्यवस्था की वजह से आमजन 4.5 करोड़ से ज्यादा मुकदमों के साथ जेलों में बंदी हैं। 2014 में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि वे रोजाना एक कानून को रद्द करेंगे। शुरुआती 5 साल के कार्यकाल में सरकार ने पंद्रह सौ कानूनों को रद्द किया, इस लिहाज से कमोबेश उन्होंने अपने वचन को पूरा किया। लेकिन जमीनी हकीकत भयावह है।

ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार देश में 69233 रेगुलटरी कानूनों में 26134 का पालन नहीं होने पर जेल जाने का खतरा होता है। इससे भ्रष्टाचार के साथ लोगों का दमन भी बढ़ता है। रिजर्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार कोरोना के पिछले तीन सालों में भारत में लगभग 50 लाख करोड़ मूल्य के उत्पादन का घाटा हुआ। पुराने कानून जिन पर लागू होते हैं, उनमें से 80 करोड़ से ज्यादा कोरोना काल में सरकारी राशन पर निर्भर रहे।

अब एक नजर नई डिजिटल अर्थव्यवस्था पर भी डालना जरूरी है। 2014 में देश में लगभग 400 स्टार्टअप थे, जिनकी संख्या अब 68 हजार हो गई है। डिजिटल पेमेंट में 40 फीसदी हिस्सेदारी की वजह से भारत विश्व में सिरमौर है। ऑनलाइन गेम मार्केट ने देश के 40 करोड़ से ज्यादा लोगों को गिरफ्त में ले लिया है। ई-कॉमर्स, क्रिप्टो और फिनटेक जैसे अनेक सेक्टर के लिए कानून, नियम या गाइडलाइंस की कोई लक्ष्मण रेखा नहीं है।

इसको ऐसे समझें कि पुरानी सड़क जो धीरे-धीरे बेकार होने के बाद प्रचलन में नहीं है, उस पर सफर कर रहे लाचार लोगों पर सभी तरह के कानूनों की मार और टैक्स की वसूली होती है। दूसरी तरफ सरकारी अनुदान से बने राजमार्ग पर डिजिटल का काफिला स्वच्छंद विचरण कर रहा है। कानून को अपडेट रखने यानी विधायी मोर्चे पर विफलता को इन 12 बिंदुओं से समझा जा सकता है-

1. समान नागरिक संहिता पर संसद से ही कानून बन सकता है। संविधान के अनुच्छेद 44 में दी गई इस जिम्मेदारी को पूरा करने में पिछले 72 सालों में केंद्र सरकार विफल रही। इसकी वजह से उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्य संविधान-उल्लंघन कर रहे हैं।

2. सुप्रीम कोर्ट ने आईटी एक्ट की धारा 66-ए को रद्द कर दिया, पर सरकार ने नया कानून नहीं बनाया। फलस्वरूप सोशल मीडिया पोस्ट पर राज्यों की पुलिस आईपीसी के तहत मामले दर्ज करके मनमानी कर रही है।

3. 150 साल पहले अंग्रेजों ने राजद्रोह का जो कानून बनाया था। उसके दुरुपयोग पर चिंता जताने के बावजूद संसद से 124-ए को निरस्त करने की प्रक्रिया नहीं हुई।

4. डेटा सुरक्षा और प्राइवेसी पर सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों के पांच साल पुराने फैसले के बावजूद केंद्र सरकार ने डाटा सुरक्षा कानून नहीं बनाया।

5. लिव-इन रिलेशनशिप, समलैंगिक विवाह आदि के बारे में केंद्रीय स्तर पर कानून नहीं होने से लक्ष्मणरेखा पार करने का नैतिक आधार मिल गया है।

6. चेक बाउंस जैसे सिविल अपराध के मामलों को आपराधिक दायरे में लाने से 33 लाख से ज्यादा मुकदमे कारोबारियों और अदालतों के गले की फांस बन गए। डिजिटल पेमेंट का सिस्टम शुरू हो गया, पर पुराने मामलों को खत्म करने के लिए कानून में बदलाव नहीं हुए।

7. श्रम कानूनों पर बहस के बाद बड़े मसौदे बने। लेकिन डिजिटल अर्थव्यवस्था में काम कर रहे लाखों गिग वर्कर्स के हितों के लिए कोई नियम-कानून नहीं बना।

8. विपक्ष शासित पांच राज्यों में सहमति नहीं मिलने से बैंकिंग फ्रॉड के 21 हजार करोड़ से ज्यादा के मामलों की सही जांच नहीं हो पा रही। हाईकोर्ट ने सीबीआई की वैधता पर सवाल खड़े किए, पर विशेष कानून नहीं बना।

9. ऑटो और टैक्सी वालों के लिए पुराने नियम बने हैं। एप आधारित कंपनियां डाटा चोरी के साथ ग्राहकों की जेब पर डकैती डाल रही हैं। उनके लिए कानून नहीं बना।

10. सोशल मीडिया और साइबर के लाखों अपराध मामले दर्ज नहीं होने की वजह से एनसीआरबी के आंकड़ों में नहीं दिखते। सीईआरटी के अनुसार साइबर अपराध के मामलों में 6 घंटे के भीतर रिपोर्टिंग जरूरी है। इसके बावजूद आईटी एक्ट में समयानुकूल बदलाव नहीं हुए।

11. सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस के अनुसार आधे से ज्यादा मुकदमों में सरकार पक्षकार है। देश में राष्ट्रीय मुकदमा नीति बनी थी, जिसे अपडेट और लागू नहीं करने से मुकदमों का बोझ दिन दूना रात चौगुना बढ़ रहा है।

12. सुप्रीम कोर्ट ने 7 साल पहले जो फैसला दिया था, उसके अनुसार सरकार को एमओपी में बदलाव करना था। इसमें टालमटोल से जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में विलंब के साथ न्याय की गाड़ी पटरी से उतर रही है।

रोडमैप और एक्शन-प्लान नहीं है
प्रधानमंत्री, कानून मंत्री और सुप्रीम कोर्ट-हाईकोर्ट के जजों के बयानों से साफ है कि पुराने कानूनों से बनी लक्ष्मण रेखा आज पूरी तरह से बेमानी हो गई है और नई लक्ष्मण रेखा के निर्धारण में संसद और सरकार अभी तक विफल रही हैं। इस बढ़ती खाई को पाटने का रोडमैप और एक्शन-प्लान सामने नहीं आने से ही सबका साथ सबका विकास नहीं हो पा रहा है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)