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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:वॉल्ट डिज्नी का परिवार मनोरंजन संसार में अनोखी रचना, वे अवाम के सामूहिक मनोविज्ञान को बखूबी समझते हैं

20 दिन पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

गौरतलब है कि अमेरिका में वॉल्ट डिज़्नी ने कथा फिल्म बनाते समय कलाकारों के नाज-नखरे और तुनकमिजाजी देखी और उन्होंने कथा फिल्म बनाने का विचार ही रद्द कर दिया। इस कड़वे अनुभव के 5 वर्ष पश्चात उन्होंने 1928 में कार्टून फिल्म बनाना शुरू की। पहली फिल्म ‘स्टीम बोट’ बनाई। कार्टून पात्र मिकी माउस, डोनल्ड डक, डक वुड इत्यादि की रचना करके 1930 में व्यापक प्रदर्शन किया।

कुछ दिनों में ये पात्र अमेरिका में चर्चित हो गए। उन्होंने 45 वर्ष तक स्वयं का अखबार भी प्रकाशित किया। प्रारंभ में टेक्नोलॉजी विकसित नहीं हुई थी तो एनिमेशन फिल्म बनाना बड़ा कठिन काम रहा। परंतु समय के साथ यहां विकास होता गया। प्लूटो नामक श्वान का फिल्मी पात्र बहुत लोकप्रिय हुआ था और श्वान को मनुष्य का सबसे अधिक विश्वासपात्र साथी माना जाने लगा। इसी कड़ी में एनिमल स्टूडियो की स्थापना भी हुई, जिसमें फिल्मकार की आवश्यकता अनुरूप कार्यों के लिए श्वान प्रशिक्षण दिया गया।

ज्ञातव्य है कि संजीव कुमार अभिनीत पात्र एक फिल्म में रोजी-रोटी कमाने के लिए श्वान प्रशिक्षण संस्थान में काम भी करता है। गोया की जाने कैसे यह बात भी स्वीकार कर ली गई है कि श्वान, आती हुई मृत्यु की पदचाप भी सुनने की क्षमता रखते हैं और जब उन्हें किसी घर में कुछ ऐसा अनिष्ट होने का आभास होता है, तो कहा जाता है कि गली-मोहल्ले के या पालतू श्वान जोर-जोर से रोने लगते हैं। इनकी सूंघने की शक्ति तो अब किंवदंती बन चुकी है।

डिज़्नी की एक अत्यंत सफल फिल्म सीरीज ‘मिकी माउस’ में चूहे और बिल्ली पात्रों की कथा है जिसमें चूहे-बिल्ली के बीच मजेदार भाग-दौड़ चलती है। चूहा, बड़ी चतुराई बिल्ली को धोखा देता है पर पकड़ में नहीं आता और बच्चों सहित सभी ने इनके खेल को खूब पसंद किया। इस तथ्य से मुहावरा बना कि हमारे साथ ‘चूहे-बिल्ली का खेल मत खेलो।’ गोया की इसी तरह राजनीति में भी वादा करने और उसे नहीं निभाने का खेल ना जाने कब से खेला जा रहा है? अवाम इसमें गफलत में रहती है।

वादों और नारों की खोज अब एक कला बन चुकी है। ज्ञातव्य है कि कमाल अमरोही निर्देशित अशोक कुमार और मधुबाला अभिनीत फिल्म ‘महल’ में अशोक कुमार अभिनीत पात्र को मधुबाला झूले पर दिखाई देती है पर नजदीक जाने पर वहां कोई नजर नहीं आता। परंतु झूला ऐसे हिलता है मानो कोई अभी उठ कर गया हो ! फिल्म के अंत में दिखाया है कि उस पुराने महल में सुरंग है और गुप्त रास्ते हैं। सारा षड्यंत्र, मात्र जायदाद हड़पने के लिए अशोक कुमार के लालची मित्र ने रचा है।

राजस्थान में जन्मे खेमचंद प्रकाश ने फिल्म में संगीत दिया था। ‘आएगा आनेवाला, दीपक बगैर कैसे परवाने जल रहे हैं, कोई नहीं चलाता और तीर चल रहे हैं।’ यह गीत फिल्म में अनेक बार उपयोग किया गया। बहरहाल, वॉल्ट डिज़्नी ने अपने स्टूडियो में क्रिसमस स्ट्रीट बनाई है, जिसमें वर्ष भर क्रिसमस उत्सव का वातावरण बनाया गया है। इसी तर्ज पर हम दीपावली गली का निर्माण कर सकते हैं। आंखों को सुकून भर देने वाले दीए हमें ऊर्जा प्रदान कर सकते हैं।

बहरहाल, वॉल्ट डिज्नी का परिवार मनोरंजन संसार में अनोखी रचना है। वॉल्ट डिज़्नी अवाम के सामूहिक मनोविज्ञान को बखूबी समझते हैं। एक अमेरिकन फिल्म में कुछ चूहे एक इमारत को खोखला करके दो लोभी भाईयों का खेल बिगाड़ देते हैं। वह इमारत उस दिन भरभराकर गिर जाती है, जब वे लोगों को लूटने वाले थे।

वे उस इमारत के बारे में लोगों को गलत जानकारी देकर उसकी नीलामी करने वाले थे, ताकि पैसा बना सकें। गोया की चूहों के कारण उनका सारा खेल बिगड़ जाता है। गौरतलब है कि फिल्मकार सईद मिर्जा एक किताब लिख रहे हैं, जिसका नाम है ‘आई नो द साइकोलॉजी आफ रेट्स’ अर्थात मैं चूहों के मनोविज्ञान को जानता हूं।