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चेतन भगत का कॉलम:भारत को मैन्युफैक्चरिंग बिल की सख्त जरूरत, इसका विरोध होगा लेकिन सरकार को यह कदम उठाना चाहिए

3 महीने पहले
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चेतन भगत, अंग्रेजी के उपन्यासकार - Dainik Bhaskar
चेतन भगत, अंग्रेजी के उपन्यासकार

कभी-कभी जो चीजें हमारे लिए अच्छी होती हैं, लोग उन्हीं का सबसे ज्यादा विरोध करते हैं। मसलन डाइट और एक्सरसाइज। या बच्चों से भरी क्लास में पेस्ट्री बांटने वाला बेकर, कड़वी दवा देने वाले डॉक्टर से ज्यादा मशहूर होगा। और राहत देने वाली सरकार, सख्त फैसले लेने वाली सरकार से ज्यादा मशहूर होती है।

बेकर से ज्यादा जरूरी एक डॉक्टर है। और एक सरकार को सख्त फैसले लेने ही चाहिए। मुझे लगता है कि दशकों खुद को और दुनिया को निराश करने के बाद समय आ गया है कि भारत खुद को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने के लिए कुछ सख्त कदम उठाए। यह सही समय है, क्योंकि इस बार सरकार इस लक्ष्य को पाने के लिए वास्तविक मंशा और इच्छा दिखा रही है।

मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर जैसी व्यापक पहलों से लेकर प्रोडक्शन लिंक्ड इनसेंटिव तक, भारतीय विनिर्माण को बढ़ाने की मंशा और प्रयास दिखते हैं। ये जरूर बदलाव लाएंगे। हालांकि, हमें ज्यादा की जरूरत है। मैन्युफैक्चरर की रक्षा के लिए हमें विस्तृत भारतीय विनिर्माण विधेयक की जरूरत है।

भारत को ‌वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने के लिए हमें उन मुख्य बाधाओं को लेकर ईमानदारी बरतनी होगी, जो वैश्विक मैन्युफैक्चरर को बड़ी संख्या में भारत आने से रोकती हैं। हमें स्वीकारना होगा कि चीन ने इस दिशा में कहीं बेहतर काम किया है। चीनी ऐप कॉपी करने की बजाय हमें वे तरीके अपनाने चाहिए जिन्होंने उसे वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनाया। हम भी ऐसा कर सकते हैं।

हालांकि, इसके लिए डॉक्टर की जरूरत है, बेकर की नहीं। इसके लिए एक विधेयक की जरूरत है, जो भारतीय मैन्युफैक्चरर की समस्याएं हल करे। जी हां, इसका विरोध भी होगा। सरकार पर ज्यादा नौकरियों के लिए दबाव बनाने वाले वामपंथी ही मैन्युफैक्चरिंग बिल का विरोध करेंगे, जो नौकरियां पैदा करेगा।

शानदार अंग्रेजी जानने वाले लोग, जिनकी अर्थव्यवस्था में कोई वास्तविक हिस्सेदारी नहीं होती, वे लेख लिखेंगे कि इससे कैसे ‘गरीब किसान’और ‘गरीब मजदूर’ पीड़ित होंगे। पर वे यह नहीं बताएंगे कि किसानों और मजदूरों के आगे से यह गरीब शब्द कैसे हटाया जाए। कुछ इसे लोकतंत्र की हत्या बताएंगे (भले की चुनी हुई सरकार बिल पास करे)।

कुछ पश्चिमी प्रकाशन भारी शब्द इस्तेमाल करेंगे, जैसे- ‘ड्रेकोनियन’ (बेरहम) भारतीय सरकार कामगारों के अधिकार ‘कुचल’ रही है। यह सरकार के लिए दु:स्वप्न की तरह होगा क्योंकि विपक्षी पार्टियां गरीबों को इकट्‌ठा कर उन्हें डराएंगी। उनसे कहेंगी कि उनका ‘सबकुछ छीना’ जा रहा है, अमीर पूंजीवादियों की सेवा हो रही है, सरकार तुम्हारी ‘परवाह नहीं’ करती।

वे लोगों से कहेंगे कि सरकार को आपको पेस्ट्री देनी चाहिए (क्योंकि सरकार के पास अनंत पैसा है) और वह कड़वी दवाई नहीं जो देश की और पैसा कमाने में मदद करे। और फिर भी यह डॉक्टर बनने का समय है, बेकर नहीं। कृषि विधेयकों की ही तरह, मैन्युफैक्चरिंग बिल लाने की जरूरत है। इसके बिना भारतीय विनिर्माण कभी फलेगा-फूलेगा नहीं, लाखों युवा बेरोजगार रहेंगे और हम वह आर्थिक रिकवरी नहीं देख पाएंगे, जो चाहते हैं।

भारत में मैन्युफैक्चरर 5 समस्याओं का सामना कर रहे हैं। पहली, जमीन। आप जमीन के लिए पैसा देते हैं। फिर कोई पड़ोसी, ग्रामीण, पंचायत या स्थानीय एनजीओ, कोई भी आपके खिलाफ केस कर सकता है। या तो आप केस हारेंगे या कई साल बर्बाद हो जाएंगे। जमीन अधिग्रहण में कोई गलती नहीं होनी चाहिए। दूसरी, मजदूर प्रबंधन। मजदूर या कामगार यानी लोग, लोग यानी वोट और वोट यानी राजनीति।

राजनीति और दक्ष मैन्युफैक्चरिंग की आपस में नहीं बनती। बेशक लेबर के लिए उदार, न्यूनतम मानक स्थापित किए जाएं। उसके बाद फैक्टरी मालिक को हर हफ्ते नई लेबर का सिरदर्द नहीं होना चाहिए। आदर्श रूप से लेबर एजेंसियों से लेबर मिलनी चाहिए, ताकि फैक्टरी मालिक पर उनके प्रबंधन की जिम्मेदारी न हो।

तीसरी, मशीनरी और तैयार उत्पादों का आयात-निर्यात। ‌‌‌‌वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग के लिए सीमाओं पर सामान के आवागमन की जरूरत होती है। कस्टम में देरी मैन्युफैक्चरिंग को काफी नुकसान पहुंचाती है। मशीनरी का मुफ्त आयात जरूरी है। चौथी, कर निर्धारण व अनुपालन।

सरकार ने खुद स्वीकार किया है कि अनुपालन का बहुत बोझ है और यह काम की गति धीमी करता है, लगातार ऊबाऊ फाइलिंग की समस्या तो है ही। 5वीं, परिवहन इंफ्रास्ट्रक्टर, जो वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए कंपनियों के लिए बहुत जरूरी है।

अगर हम कुछ करना चाहते हैं तो ऊपर दी गईं पांचों समस्याओं का हल जरूरी है। इसीलिए हमें विस्तृत भारतीय मैन्युफैक्चरिंग बिल की जरूरत है, जो हर उस व्यक्ति को सुरक्षा प्रदान करे, जो भारत में विनिर्माण करना चाहता है। मैन्युफैक्चरिंग से पैसा और नौकरियां पैदा होती हैं। यह राष्ट्र निर्माण करती है।

हमारे कारखाने हमारे नए मंदिर हैं। हमें उनकी रक्षा करनी चाहिए और उसी पवित्रता के साथ उन्हें काम करने देना चाहिए। तभी हम भारत को ‌वैश्विक मैन्यूफैक्चरिंग हब बनाने का लक्ष्य पूरा कर पाएंगे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)