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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:हम दो तरह के नियमों से चलते हैं, कुछ कायदे आंतरिक होते हैं, कुछ बाहर के रहते हैं

6 दिन पहले
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पं. विजयशंकर मेहता - Dainik Bhaskar
पं. विजयशंकर मेहता

हम लोग जीवन में दो तरह के नियमों से चलते हैं। कुछ कायदे आंतरिक होते हैं, कुछ बाहर के रहते हैं। भीतर के हमारे जो नियम होते हैं, हमें उनका पता भी नहीं चलता। जैसे ईमानदार होना एक आंतरिक नियम है। यह जन्म के साथ ही ईश्वर ने सबको दिया है। ऐसे ही वफादार होना बाहरी नियम है। इसे हम साधते हैं। लेकिन, एक रिश्ता ऐसा होता है जिसमें ईमानदारी और वफादारी दोनों को एक साथ चलाना पड़ता है और यदि नहीं चलाया तो इस रिश्ते के साथ धोखा होगा। यह रिश्ता होता है पति-पत्नी का। इसे और गहराई से समझने के लिए कर्ण और कृष्ण का उदाहरण लिया जा सकता है।

कर्ण दुर्योधन के प्रति वफादार था। इसीलिए कृष्ण द्वारा समझाने के बाद भी वह पांडवों के पक्ष में आने को तैयार नहीं हुआ। लेकिन, कृष्ण मूल रूप से ईमानदार थे। वे पांडवों के पक्ष में इसलिए नहीं खड़े थे कि उन्हें उनके प्रति वफादारी दिखाना थी। वे पूरी मानवता और सत्य के प्रति ईमानदार थे। चूंकि वफादारी शरीर से जुड़ा मामला है, ईमानदारी बिलकुल भीतर से आती है, इसीलिए नैतिकता और चरित्र का आधार ईमानदारी है, आचरण का प्रदर्शन वफादारी है। कई बार पति-पत्नी एक-दूसरे के प्रति वफादारी तो दिखाते हैं, लेकिन ईमानदारी में चूक जाते हैं। जिन्हें इस रिश्ते को गरिमा देना हो, उन्हें ईमानदारी और वफादारी का संयुक्त रूप इसमें उतारना चाहिए।