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एन. रघुरामन का कॉलम:हमें बतौर पैरेंट और स्कूलों को बतौर संचालनकर्ता ‘गुरुओं’ की और सिस्टम की देखभाल करनी होगी

13 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

तीन दिन पहले ही हमने शिक्षक दिवस मनाया और ‘गुरुओं’ का गुणगान किया। लेकिन इस जश्न को लेकर मेरी मिली-जुली भावना है। मुझे इससे जुड़ा उत्साह तो पसंद है लेकिन मैं इस बात से क्षुब्ध हूं कि हमने लॉकडाउन के बाद से उनकी वैसी परवाह नहीं की, जैसी एक समाज को करनी चाहिए। मेरे तर्क यह हैं।

1. मैं दसवीं कक्षा के एक विज्ञान शिक्षक को जानता हूं जो उनके ज्ञान और पढ़ाने की क्षमता के लिए बहुत सम्मानित थे। लॉकडाउन के बाद उनका वेतन प्रभावित हुआ और नियमित फीस देने की बात कहने पर माता-पिता ने उनसे बुरा व्यवहार किया। इन दो कारणों से उन्होंने शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह छोड़ दिया और ज्यादा वेतन के लिए एक वेंडर के साथ बतौर फ्लोर मैनेजर काम करने लगे, जो एमेजॉन को सेवाएं देता है।

2. मेरी पहचान की एक अन्य शिक्षक मुस्कान वलवानी भी इसी नाव में सवार हैं। उन्होंने भी स्कूल छोड़कर ‘एजु-क्रिएट’ नाम से वेंचर शुरू किया, जो रचनात्मक तरीके से घर पर कोचिंग देता है। वे लोगों का साक्षात्कार करती हैं और यूट्यूबर भी बन गई हैं। यानी वे भी संरचित शिक्षा व्यवस्था से बाहर हो गई हैं।

3. मैं उज्जैन के एक समूह को जानता हूं जो दूसरे लॉकडाउन में वेतन न पाने वाले शिक्षकों की कुछ नकद मदद करना और घर चलाने के प्रबंध करना चाहता था। दिलचस्प है कि समूह को ऐसे 20 से भी कम शिक्षक मिले, जबकि वे 400 शिक्षकों की मदद करना चाहते थे। समूह को लगा कि समस्याएं होने के बावजूद शिक्षक मुश्किलें बताने आगे नहीं आते हैं।

4. पिछले 6 महीनों से मैं एक क्लाइंट के लिए सामाजिक अध्ययन का प्रशिक्षित शिक्षक तलाश रहा हूं। वे 30,000 रुपए से ज्यादा वेतन देने और दूसरे शहर से आने वाले शिक्षक को रहने के लिए घर तक देने तैयार हैं। लेकिन मैं अब तक वैसा शिक्षक नहीं तलाश पाया जिसमें मेरे मन मुताबिक क्षमता हो।

ऐसा नहीं है कि उच्च कुशाग्रता वाले लोग समाज में नहीं हैं। हैं, लेकिन वे ऐसी व्यवस्था का हिस्सा बनना नहीं चाहते जिसने महामारी में घोर अनिश्चितता दिखाई हो। इस अनिश्चितता ने सिर्फ प्रबुद्ध लोगों को नहीं, बल्कि व्यवस्था चलाने वाले अन्य लोगों को भी प्रभावित किया है। परिवहन का ही उदाहरण देखें। मार्च 2020 की तुलना में डीज़ल की कीमतें 50% तक बढ़ गई हैं।

जिन इलाकों में बच्चों के प्रभावित होने की आशंका ज्यादा है, वहां तीसरी लहर के डर से कक्षाएं 50% उपस्थिति के साथ चलेंगी। इस परिस्थिति में न तो बस और न ही कक्षाएं पूरी क्षमता से चल पाएंगी, जिसका मतलब है कि संचालन की लागत भी बढ़ेगी। एक तरफ माता-पिता तर्क दे सकते हैं कि स्कूल अमीर हैं और सिस्टम संभाल सकते हैं।

वहीं, स्कूल कह सकते हैं कि जबतक माता-पिता लागत का भार नहीं उठाएंगे, वे स्कूल कैसे चलाएंगे। इस तकरार में अच्छे शिक्षक व्यवस्था से बाहर हो रहे हैं, जबकि नियोक्ता ऐसे छात्रों को चुनने में आनाकानी कर रहे हैं, जिनकी शिक्षा महामारी के दौरान पूरी हुई है। चूंकि इससे छात्र सबसे ज्यादा पीड़ित होंगे, इसलिए सभी पक्षों को साथ बैठकर ऐसा समाधान सोचना होगा जो बच्चों के हित में हो।

फंडा यह है कि उत्पाद के रूप में शिक्षा मोलभाव वाली सोच से नहीं मिल सकती। हमें बतौर पैरेंट और स्कूलों को बतौर संचालनकर्ता ‘गुरुओं’ की और सिस्टम की देखभाल करनी होगी। वर्ना आज नहीं तो कल, एक पूरी पीढ़ी इसकी कीमत चुकाएगी।