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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:मनोचिकित्सक से परामर्श करने वाले को हम पागल समझने की भूल करते हैं

17 दिन पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

महामारी के कारण कई लोग मानसिक बीमारी से त्रस्त हैं। युवा वर्ग सबसे अधिक विचलित है। यह लोकप्रिय शिगूफा है कि मनोचिकित्सक से परामर्श करने वाले को हम पागल समझने की भूल करते हैं। दरअसल हम लोगों में अधिकांश को मनोचिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए। सामूहिक अवचेतन के बीहड़ में बड़ा अंधकार छाया रहता है। एक बार अमेरिका के सुप्रसिद्ध कवि एजरा पाऊंड से मामूली कार दुर्घटना में कानूनी रूप से अपराध हुआ था।

कोई गंभीर बात नहीं थी नतीजतन महान कवि को दंड के स्वांग स्वरूप कुछ दिन पागलखाने में रखकर आजाद कर दिया गया। यूरोप लौटने पर उन्होंने कहा कि पूरा अमेरिका एक पागलखाना है। ज्ञातव्य है कि एजरा पाउंड को ही टी.एस एलियट ने अपनी कृति ‘वेस्टलैंड’ भेजी थी कि उनके विचार जानें जाएं और पांडुलिपि में आवश्यक संशोधन किया जा सके।

अमिताभ बच्चन, अमजद खान और नीतू सिंह अभिनीत फिल्म ‘याराना’ की बहुत दिनों तक शूटिंग हो चुकी थी। उन दिनों अमजद खान ‘वन फ्ल्यू ओवर द कुकूस नेस्ट’ से बहुत ज्यादा प्रभावित थे। उन्होंने फिल्मकार पर दबाव बनाया और ‘याराना’ में पागलखाने के सीन ठूंस दिए गए।

फिल्मकार रमेश तलवार की फिल्म ‘बसेरा’ में शशि कपूर अभिनीत पात्र की राखी अभिनीत पत्नी पात्र दिमागी कैमिकल लोचे से पागलखाने भेज दी जाती है। रेखा अभिनीत उसकी छोटी बहन उसके पति और बच्चों की सेवा के लिए आती है। कालांतर में बच्चे और पति को उससे सेवा करने के कारण प्रेम हो जाता है। रेखा और शशि कपूर विवाह कर लेते हैं। सब खुश हैं।

कुछ दिनों बाद राखी को डॉक्टर का परीक्षण पत्र मिलने के बाद घर वापस जाने का मौका मिलता है। वह देखती है कि मौजूदा व्यवस्था से सभी खुश हैं। हम प्राय: सुविधा को खुशी मान लेते हैं। बहरहाल, राखी पागलपन का अभिनय करके इस बसेरे से दूर पागलखाने वापस चली जाती है। इसी तरह सलमान खान अभिनीत फिल्म ‘तेरे नाम’ में भी सलमान अभिनीत पात्र की पिटाई उस कन्या के रिश्तेदार करते हैं, जिससे उसे एकतरफा प्रेम हुआ था।

फिल्म में पागलखाने के सीन भयभीत कर देते हैं। इस फिल्म में भी पूरी तरह सेहतमंद होकर नायक लौटता है। वह देखता है कि वह जिस लड़की से एकतरफा प्रेम करता था, वह अपने पति के साथ सुखी जीवन जी रही है। सलमान भी पागलपन का स्वांग करके पागलखाने लौटता है। सलमान, करीना अभिनीत फिल्म ‘क्योंकि’ में भी कुछ ऐसा ही प्रस्तुत है।

वहीदा रहमान, राजेश खन्ना और धर्मेंद्र अभिनीत फिल्म ‘खामोशी’ में वहीदा के स्नेहमय व्यवहार से मरीज ठीक हो जाते हैं परंतु सेहतमंद होते ही वे सब भूल जाते हैं। इस फिल्म के अंत में प्रस्तुत किया गया कि वहीदा रहमान अभिनीत नर्स अपना दिमागी संतुलन खो देती है। इस विषय पर हास्य दृष्टिकोण से बनी ‘इट्स ए मैड मैड वर्ल्ड’ भी सराही गई थी। इस बात पर गहरा दुख होता है कि हमारे देश में मनोचिकित्सकों की संख्या बहुत कम है और हालातों ने पागलों की संख्या बढ़ा दी है।

याद आती है श्रीदेवी और कमल हासन की फिल्म ‘सदमा’ जिसमें दिमागी लोचे की शिकार श्री देवी को कमल हासन दिमागी संतुलन देने में सफल होता है। श्री देवी विगत का सब कुछ भूल जाती है। उसके ठीक होने का समाचार मिलते ही रिश्तेदार उसे वापस लेने आते हैं। वह रिश्तेदार के साथ ट्रेन में बैठी है। कमल हासन प्लेटफार्म पर गुलांटियां खाते हुए श्रीदेवी को याद दिलाने का प्रयास करता है। इस सीन में कमल ने बड़ा प्रभावोत्पादक अभिनय किया था।

वर्तमान में संतुलन बनाए रखना कठिन होता जा रहा है। आभास होता है मानो आम सड़क पर पागल घोड़ा सरपट भाग रहा है और राहगीर पागल घोड़े से बचने के लिए संभवत: इधर-उधर दौड़ रहे हैं। संभवत: घोड़े को आभास होता है कि पागल अवाम अकारण भाग रहा है। तर्क सम्मत विचारधारा के लोप से यह बताना कठिन हो रहा है कि अवाम पगला गया है या घोड़ा ही पागल है।