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मकरंद परांजपे का कॉलम:हैदराबाद के स्याह अतीत की रोशनी में हमें असदुद्दीन ओवैसी की राजनीति को देखना चाहिए

2 दिन पहले
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मकरंद परांजपे लेखक, चिंतक, जेएनयू में प्राध्यापक - Dainik Bhaskar
मकरंद परांजपे लेखक, चिंतक, जेएनयू में प्राध्यापक

विगत 17 सितम्बर को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपना जन्मदिन मना रहे थे, उसी दिन हैदराबाद लिबरेशन डे भी मनाया जा रहा था। 1948 में हैदराबाद रियासत के भारतीय संघ में विलय की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर गृहमंत्री अमित शाह ने सिकंदराबाद परेड ग्राउंड में सभा को सम्बोधित किया, जो कि भारतीय सेना के नियंत्रण में है, तेलंगाना राज्य के नहीं।

ऑपरेशन पोलो के तहत चली पांच दिनी कार्रवाई के बाद हैदराबाद को भारत में मिला गया था। वह एक पुलिस कार्रवाई थी, जिसे युद्ध की औपचारिक घोषणा के बिना एक सैन्य ऑपरेशन भी कहा जा सकता है। अविभाजित भारत की जिन 565 रियासतों में उस समय देश की 23% आबादी थी और कुल 40% क्षेत्र उनके पास था, उनमें से हैदराबाद सबसे अमीर और जम्मू-कश्मीर के बाद दूसरी सबसे बड़ी रियासत था।

82 हजार वर्गमील का यह इलाका लगभग ब्रिटेन के बराबर था। इस पर निजाम का राज था। तत्कालीन हैदराबाद की 80% से ज्यादा आबादी हिंदू थी। ये लोग जिस इलाके में रहते थे, वह आज तेलंगाना, कर्नाटक, महाराष्ट्र में फैला है। वहां तेलुगु, मराठी, कन्नड़, दक्खनी उर्दू बोली जाती थी।

अंग्रेजों ने रियासतों के अस्तित्व की रक्षा की गारंटी दी थी, लेकिन भारत की आजादी के बाद वे उन्हें अपने हाल पर छोड़कर चलते बने। इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट 1947 के तहत उनके पास तीन ही विकल्प थे, या तो भारत या पाकिस्तान में सम्मिलित हो जाएं या स्वतंत्र हो जाएं। मुस्लिम कुलीनों के एक वर्ग ने निजाम को उकसाया कि वह भारत में शामिल न हो।

इन कुलीनों की अगुवाई इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन (एमआईएम) द्वारा की जा रही थी। जून 1947 में निजाम ने फरमान जारी कर दिया कि हैदराबाद भारत में सम्मिलित नहीं होकर स्वतंत्र होगा। फिर एमआईएम के संस्थापक काजिम रिजवी के नेतृत्व में रजाकारों ने राज्य के हिंदुओं के दमन के लिए आतंकी अभियान छेड़ दिया।

भारत सरकार ने निजाम के फरमान को नकार दिया। इसके बाद निजाम ने विशेष प्रावधानों की मांग की, जिसमें यह भी शामिल था कि अगर भारत-पाकिस्तान में युद्ध होता है तो हैदराबाद तटस्थ रहेगा। भारत सरकार ने इसे भी मानने से इनकार कर दिया और हैदराबाद की नाकेबंदी कर दी। अब निजाम यूएन सुरक्षा परिषद और इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में गुहार लगाने चला गया।

तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल ने समझ लिया कि अगर अभी कार्रवाई नहीं की तो हालात काबू के बाहर हो जाएंगे। उन्होंने 13 सितम्बर को ऑपरेशन पोलो का आदेश दिया और पांच दिन के भीतर हैदराबाद को घुटनों पर ला दिया। इससे पहले वहां भड़के साम्प्रदायिक दंगों में एक अनुमान के मुताबिक 27 हजार से 40 हजार तक लोगों की जान जा चुकी थी।

सितम्बर 1948 : सरदार पटेल ने समझ लिया कि अगर तुरंत कार्रवाई नहीं की तो हालात काबू के बाहर हो जाएंगे। उन्होंने ऑपरेशन पोलो का आदेश दिया और पांच दिन के भीतर हैदराबाद को घुटनों पर ला दिया।

हैदराबाद के इस इतिहास के मद्देनजर यह आश्चर्यजनक नहीं था कि जब अमित शाह ने सिकंदराबाद कैंटोनमेंट परेड ग्राउंड में हैदराबाद स्टेट लिबरेशन डे मनाते हुए तिरंगा फहराया, तो तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर ने तेलंगाना नेशनल यूनिटी डे मनाया। आज की एआईएमआईएम कासिम रिजवी की मुस्लिम अलगाववादी पार्टी का ही नया रूप है।

भाजपा तेलंगाना प्रमुख बांदी संजय कुमार का कहना है कि केंद्र द्वारा लिबरेशन डे मनाने की घोषणा करने के बाद ही राज्य की सरकार ने भी इसे मनाने का निर्णय लिया। उससे पहले तक टीआरएस, कांग्रेस और एआईएमआईएम ने इसमें दिलचस्पी नहीं ली थी।

भाजपा कई सालों से मांग कर रही है कि इसे तेलंगाना लिबरेशन डे के रूप में मनाया जाए। एमआईएम आज टीआरएस की गठबंधन सहयोगी है और उस पर आरोप लगाए जाते हैं कि वह अपने स्याह अतीत को छुपाने की कोशिश करती है। उसका समर्थक वर्ग तत्कालीन हैदराबाद के उन मुस्लिम इलाकों का है, जिन पर कभी निजाम का राज था।

इसी रोशनी में हमें असदुद्दीन ओवैसी की राजनीति को देखना चाहिए, क्योंकि जब भी हिंदुओं की आस्था से जुड़ा कोई प्रश्न आता है- चाहे अयोध्या हो या ज्ञानवापी- एमआईएम के द्वारा कहा जाता है कि भारत आस्था से नहीं संविधान से संचालित होता है। लेकिन साथ ही उसके द्वारा मस्जिद बाकयामत वाली बात भी कही जाती है। यही पार्टी सर तन से जुदा वाले नारों से भी जुड़ी हुई थी। हमें इन अलगाववादी तत्वों के खतरों के प्रति सचेत रहना चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)