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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:नक्सलवादियों से बरामद हथियार चीन में बने हैं, हमारे लिए चिंतनीय है कि यह हथियार छत्तीसगढ़ के जंगलों तक पहुंचे कैसे?

17 दिन पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

छत्तीसगढ़ में नक्सली हिंसा की वारदातें समय-समय पर होती रही हैं। वहां तैनात पुलिस और सैनिक दस्ता साहस से मुकाबला करता रहा है। गौरतलब है कि नक्सलवादियों के पास से बरामद हथियार चीन में बने पाए गए हैं। चिंतनीय है कि चीन में बने हथियार छत्तीसगढ़ के जंगलों तक पहुंचे कैसे? हमारे अपने लोगों ने रिश्वत लेकर यह कार्य किया है। मुंबई विस्फोट के लिए लाए गए आरडीएक्स में भी हमारे कुछ लोग शामिल रहे हैं।

हाल ही में एक अमीर व्यक्ति के निवास स्थान के निकट बरामद कार का रहस्य गहरा होता जा रहा है। महाराष्ट्र सरकार की सुरक्षा व्यवस्था पर शक की सुई है। एक कहानी इस तरह है कि एक राज्य के प्रमुख शहर के कलेक्टर का अपहरण नक्सलियों ने किया। नक्सल नेता ने कलेक्टर को खुला रखा। जंगल इतना घना है कि वह भाग ही नहीं सकता। सत्ता यह नहीं चाहती कि अवाम को ज्ञात हो कि वह इतनी कमजोर है कि उसने फिरौती का धन दिया। अपनी मजबूत छवि उसे बनाए रखनी है।

कलेक्टर मरे, किसान मरे, पुलिस स्टाफ, सेना के जवान मरे। इन जवानों ने देश की रक्षा के लिए प्रशिक्षण लिया है। उन्हें विदेशी सेना से लड़ने की जगह अपने देश के लोगों से टकराना है। प्रांत का उद्योगपति सहायता करता है। वह नक्सली नेता के बताए ठिकाने पर ध्यान रखता है। कलेक्टर सत्ता को धन्यवाद देता है। उसका परिवार राहत की सांस लेता है। कलेक्टर ने अपने अपहरण के दिनों में ग्रामीण जीवन की कठिनाइयां देखी हैं।

आर्थिक असमानता, अन्याय और अपने जंगलों से बेदखल किए गए लोगों के दर्द को समझा है। बहुत कम जिलाधीश अवाम का दर्द महसूस करते हैं। सच तो यह है कि अपने मंत्री का आदेश मानना पड़ता है। बहरहाल, अब कलेक्टर में परिवर्तन आ गया है। अब वह अवाम की सेवा करने लगा है। भय से मुक्त होकर काम करने लगा है। बहरहाल, हिंसा के किसी भी स्वरूप का समर्थन नहीं किया जा सकता परंतु आत्म अवलोकन कर यह सोचना चाहिए कि हम किशोर और युवा वर्ग को कैसा निजाम दे रहे हैं?

लेखक ई.एम.फोस्टर ने भारत में लंबा समय बिताया, समाज रचना को समझने का प्रयास किया। उनका उपन्यास ‘ए पैसेज टू इंडिया’ बहुत सराहा गया। उपन्यास से प्रेरित फिल्म डेविड लीन ने बनाई थी। इंदौर में जन्मीं लीना मतकर से उन्होंने विवाह किया था। इसी उपन्यास में उनकी किसी अन्य रचना में प्रस्तुत किया गया कि श्रीलंका में अमेरिकन प्रचारतंत्र की स्थापना का विरोध किया गया। कुछ लोग जान गए कि प्रचारतंत्र के स्थापित होने के बाद क्या होता है।

छत्तीसगढ़ हो श्रीलंका हो या बंगाल हो, हमें सोचना चाहिए कि कौन सी संकीर्णता की ताकत है और कहां कौन सा काम कर रही है? उनका सीक्रेट एजेंडा क्या है। स्मरण रहे कि नक्सल हिंसा बंगाल से प्रारंभ हुई। आज लोकप्रिय दल में शामिल व्यक्ति कभी नक्सलवादी रहा है। नक्सल समस्या पर गोविंद निहलानी ने जया बच्चन अभिनीत फिल्म ‘हज़ार चौरासी की मां’ बनाई थी। ताजा खबर है कि जया बच्चन ने ममता जी का साथ देने का निर्णय लिया।

पश्चिम बंगाल में जन्मे बंगाली दंपति की संतान कहीं भी रहे उसके दिल में बांग्ला संस्कृति मौजूद रहती है। रवींद्रनाथ टैगोर और काजी नजरुल इस्लाम की रचनाओं को अपने दिल में लिए रहता है। आर्थिक असमानता की खाई कभी पाटी नहीं जा सकती परंतु उसकी चौड़ाई कम की जा सकती है। हर काम के लिए व्यवस्था का मुंह ताकने की जगह, नागरिक अपने कर्तव्य का पालन करें। कोरोना महामारी से बहुत कुछ सीखा जा सकता है।

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